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Hair tips

फेस स्किन के लिए चावल का पानी (Rice Water)सबसे ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि चावल का मास्क आपकी हेयर हेल्थ के लिए भी काफी बेहतरीन काम कर सकता है। चावल में कई ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो आपके बालों के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। पर अगर आप चावल के साथ मेथी के दानों को भी मिक्स करके इस मास्क को तैयार करेंगे तो ये आपके लिए जबरदस्त काम करेगा। अक्सर लोग चावल और मेथी के पानी को अलग अलग प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर आप इन्हें साथ मिलाकर एक मास्क को रूप दें देंगे तो ये कई तरह की बालों से जुड़ी परेशानियों से आपको छुटकारा दिला सकता है। ये बालों में डैंड्रफ, फिजी हेयर, बालों में शाइन औ हेयर फॉल की समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।

चावल और मेथी आपको आराम से घर में मिल जाएंगे। इसके लिए आपको ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है। बालों को धोने के लिए प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करने से स्कैल्प और बालों का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। अगर आपको भी अपने बालों को झड़ने से रोकना है या बालों को मजबूत बनाना है तो आप इस मास्क को अपने घर पर तैयार कर सकते है।

बालों के लिए मेथी के बीज के फायदे

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मेथी के बीज बालों के झड़ने को रोकने और बालों को बढ़ा कर लंबा करने के लिए काफी प्रसिद्ध है। मेथी के बीज आयरन और प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत हैं ये बालों को बढ़ाने के लिए काफी अच्छे पोषक तत्व है। इसके अलावा, मेथी के बीज फोलिक एसिड, विटामिन ए, के और सी से भरपूर होते हैं, इसमें पोटेशियम और कैल्शियम जैसे खनिज भी आपको काफी अच्छी मात्रा में मिल सकते है। इसलिए, यह मेथी का मास्क आपके उलझे बाल, चिपचिपे बाल और बालों को झड़ने से रोकने में मदद कर सकता है।

चावल बालों के लिए कैसे फायदेमंद है

Hair Style

बालों की कई समस्या को चावल का पीन हल कर सकता है। चावल में विटामिन, अमीनो एसिड और जिंक, मैग्नीशियम, विटामिन बी और सी जैसे अमिनरल्स से भरपूर होता है। साथ ही, इसमें एंटीऑक्सीडेंट भी भरपूर मात्रा में होते हैं। चावल का पानी बालों की लोच में सुधार हो सकता है।

चावल के पानी का उपयोग करने से आपके बालों को सुलझाना बहुत आसान हो जाता है। चावल के पानी से आप घने, घने और ज़्यादा व्यवस्थित बाल पाने का सपना पूरा कर सकते हैं। चावल का पानी आपके लिए कंडिशनर का कम कर सकता है जिससे आपके बाल काफी स्मूद दिखने लगते है।

कैसे करें चावल और मेथी के बीज का मास्क तैयार और मास्क बनाने के लिए सामान-

चावल 2 बड़े चम्मच
मेथी के बीज 1 बड़ा चम्मच
पानी

ऐसे बनाएं चावल और मेथी का मास्क

  • 2 बड़े चम्मच चावल और 1 बड़ा चम्मच मेथी के बीज को रात भर पानी के अलग-अलग कटोरे में भिगोएं।
  • भिगोए हुए चावल और मेथी के बीजों को अलग-अलग तब तक मिलाएं जब तक आपको चिकना पेस्ट न मिल जाए।
  • चावल के पेस्ट और मेथी के पेस्ट को एक कटोरे में मिलाएं। एक समान पेस्ट बनाने के लिए उन्हें अच्छी तरह मिलाएं।
  • इस मास्क को अपने बालों पर स्कैल्प से लेकर बालों के आखिर तक अच्छी तरह से लगा लेंं। बालों में 20 से 30 मिनट के लिए मास्क को रहने दें।
  • अपने बालों को धोने के लिए गर्म पानी का इस्तेमाल करें, क्योंकि इससे सिर के रोमछिद्रों को खोलने में मदद मिलेगी, जिससे बालों में मास्क का बेहतर अवशोषण हो सकता है।

फाइल फोटो- गूगल

why social media addiction is increasing among children and teenagers

जरा सोचे आप अपने फोन में फेसबुक, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम डाउनलोड करना चाह रहे हों और आपको डाउनलोड करने से पहले वैधानिक चेतावनी दिखाई दे कि Social Media आपकी सेहत के लिए नुकसानदेह है। डॉक्टर्स का कहना है कि सोशल माीडिया बचपन छीन रहा है और किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य पर खासा गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

एक्सपर्ट बता रहे हैं क्यों बच्चों और किशोरों में बढ़ती जा रही है Social Media एडिक्शन (लत)

दुनिया भर के होनहार और बुद्धिमान कम्प्यूटर इंजीनियर सोशल मीडिया के अलगोरिदम इस तरह सेट करते हैं कि भूले-भटके साइट पर आया बच्चा बाकी काम छोड़ कर सोशल मीडिया की भूल-भुलैया की दुनिया में खो जाता है।

पिछले दशक में सोशल मीडिया की लत किसी संक्रमण की तरह फैली है। लगभग हर जगह बच्चे और युवा इसका प्रयोग कर रहे हैं। 13-17 की उम्र के बीच के 95 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। जिनमें से एक तिहाई इस पर लगातार बने रहते हैं।

मेंटल हेल्थ के लिए घातक है सोशल मीडिया

साल 2019 में एक पत्रिका JAMA में एक लेख छपा। इस लेख में जानने की कोशिश की गई कि सोशल मीडिया पर व्यतीत किए समय का सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर कितना है। इसमें पाया गया कि जो बच्चे किशोरावस्था में तीन घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं वे ख़ास तौर पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी तकलीफों का सामना करते हैं।

इसका असर नींद पर भी होता है। सोशल मीडिया पर बने रहना अवसाद की ओर ठेलता है और लोगों के फेक और प्रोजेक्टड जीवन की गाथा नेगेटिव बॉडी इमेज के विकास को बढ़ावा देती है। ज़्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताने से साइबर बुलीयिंग की घटनाएं भी बढ़ती हैं। भावनाओं का संतुलन डावांडोल हो जाता है और मन लगातार उत्कंठाओं से जूझता रहता है।

डॉक्टर विवेक मूर्ति ने यह बात किशोरों और बच्चों को ध्यान में रखकर कही थी। उन्होंने हाल ही में US कांग्रेस में एक एडवाइजरी जारी की। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि सोशल मीडिया का असर बच्चों और किशोरों में वयस्क लोगों से अलग है। क्या इसकी कोई ख़ास वजह है?

1. इसी उम्र में होता है प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स का विकास

why social media addiction is increasing among children and teenagers

साइंस हमें बताता है कि दिमाग़ का विकास बचपन के शुरुआती तीन सालो में ही बहुत तेज़ी से होता है। किंतु एक ख़ास हिस्से का विकास किशोरावस्था के पूरा होने तक नहीं हो पाता है। इस हिस्से को प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं। प्री फ्रंटल कॉर्टेक्स कई चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार होता है इसमें सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात होती है ‘न करने की इच्छाशक्ति’।

2. उत्साह अधिक और समझ कम

किशोरावस्था में दिमाग़ तेज़ दौड़ता है, कई मुश्किल सवाल आसानी से हल करने की क्षमता होती है और हर नई और ख़तरनाक चीज़ को करने के लिए मन उत्साहित होता है। वहीं दिमाग ठीक से ख़तरे भाँप नहीं पाता, आंक नहीं पाता। ऐसी स्थिति में, इस उम्र के बच्चे बहुत ही असुरक्षित होते हैं। खुद पर मंडराते ख़तरों से अनभिज्ञ और एक अजीब ओवरकॉन्फिडेन्स से भरे हुए।

3. एंगेजमेंट ओरिएंटेड प्रोग्राम

सोशल मीडिया का रोमांच उन्हें आकर्षित करता है और वे अपना रुख़ उसकी तरफ़ कर देते हैं। यह एक लत की तरह बढ़ती हुई प्रवृत्ति बन जाता है। दुनिया भर के होनहार और बुद्धिमान कम्प्यूटर इंजीनियर सोशल मीडिया के प्रोग्राम को बनाते हैं कि भूले- भटके जो बच्चा या किशोर यहां पहुंचे उसे एक ख़ास थ्रिल और रिवार्ड सिस्टम से बांध कर रख दें। इसके पीछे का लक्ष्य होता है इनके ऑडियंस का अधिकतम एंगेजमेंट।

4. सोशल मीडिया के लगातार इस्तेमाल पर डोपामीन होता है रिलीज़

सोशल मीडिया का रिवार्ड सिस्टम इस तरह डिज़ाइन किया गया हैं कि छोटा सा छोटा हासिल भी ख़ुशी का अहसास देता है। इस ख़ुशी का आधार डोपामीन रिलीज़ होने से है। डोपामीन रिलीज़ होने पर आनंद की अनुभूति होती है। लेकिन डोपामीन एक ऐसा न्यूरो-ट्रांसमीटर है जो लत लगने के लिए और नशा चढ़ने के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है।

5. बढ़ जाती है लत

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पहली बार जिस काम को करने पर ख़ुशी मिलती है उसमें जितना डोपामीन रिलीज़ होता है अगली बार उतनी ही ख़ुशी पाने के लिए उतना ही काम दोगुनी बार करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर– जो बच्चा या किशोर पहले एक लाइक से ख़ुश होता था, उसे उतनी ख़ुशी पाने के लिए बीसियों लाइक की ज़रूरत पड़ती है। यह भूख बढ़ती ही जाती है। फिर उसे एक भरेपूरे ऑडियंस और फ़ॉलोवर की लिस्ट की दरकार होती है। इस तरह सोशल मीडिया पर जब पहले-पहल जो बच्चा पांच मिनट के लिए आया होता है वही बच्चा घंटों वहीं गुज़ारने लगता है।

भद्दे कंटेंट के सबसे बड़े उपभोक्ता और क्रिएटर हैं किशोर-युवा

पिछले कुछ बरसों में सोशल मीडिया, रील्स, इन्स्टाग्राम वगैरह पैसे कमाने का एक उम्दा ज़रिया भी बनकर सामने आये हैं। बेरोज़गारी भी आसमान चूम रही है। सही-सीधे रास्ते से पैसा कमाना बहुत मुश्किल है। समाज के मूल्य जिस गति से गिरे हैं वह भी इससे पहले कभी नहीं हुआ। कोविड के समय से हर किशोर-किशोरी के पास स्मार्ट फ़ोन आ गया है।

ये ज़रा आसान रास्ता है

पढ़-लिखकर कुछ हासिल करना, परीक्षा में उत्तीर्ण होकर प्रोफेशनल कॉलेज में दाख़िला पाना, फिर नौकरी पाना…कुछ भी तो आसान नहीं रहा है। हर जगह पैसों, राजनीति और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। किशोर-किशोरी ही सबसे अधिक उदासीन हैं। इंटरनेट के तमाम उटपटांग, गंदे और अश्लील कंटेंट के एक बड़े उपभोक्ता भी यही हैं। कंटेंट क्रियेटर भी। दुख की बात है कि शोषण करते और सहते बच्चों और किशोरों को इसका ज़रा भी भान नहीं है।

गाइडलाइंस ही प्रेरित करती हैं

यू- ट्यूब, टिक-टॉक, रील्स के कंटेंट कई बार वाहियात क़िस्म के होते हैं। पोर्न, सेक्सुअल कंटेंट, हिंसा यह सब आम बातें हैं। और तो और कंटेंट क्रिएशन के गाइडलाइन खुद सिखाते हैं कि हिंसा और सेक्सुअल कंटेंट का समझदार इस्तेमाल किस तरह आपकी विडियोज़ की क्लिक्स बढ़ा सकता है। ( क्यों ना आप थोड़ी तकलीफ़ उठाकर इन साइट्स के मोनेटाइज़ेशन के गाइडलाइन्स पर एक नज़र डालें?)

डोपामीन उसे वापस खींचता है

क्या असर होता है जब बचपन और किशोरावस्था में कोई ऐसी बातें देखे और सुने? इस उम्र की उत्सुकता उसे इस ओर और खींचती है। वह इस कंटेंट से बंधता है। वीडियो के विज्ञापनों के साथ लोगों का एंगेजमेंट बढ़ता है। ऐड कंपनी और प्लेटफ़ॉर्म की रेवेन्यू बढ़ती है। किशोर वहीं अटक जाता है। उसके दिमाग़ का डोपामीन सर्ज उसे फिर वहीं लौटने के लिए बाध्य करते हैं।

देखने से करने तक

एक वीडियो देखना उसके लिए कम पड़ने लगता है। वो एक के बाद एक वीडियो देखता चला जाता है। जब सिर्फ वीडियो देखना उसे तृप्त नहीं करता, तब वह कृत्य पर पहुंच जाता है। यही एडिक्शन का विज्ञान है। यही पोर्न देखने की सबसे बड़ी मुश्किल भी। थोड़े में आनन्द अनुभव करने पर, दिमाग और की मांग करता है। फिर और से भी तृप्त नहीं होता।

धीरे-धीरे व्यक्ति इन आदतों का गुलाम हो जाता है। जो देखता है वह एडिक्ट हो जाता है। बनाने वाले पर भी इस तरह के व्यवहार से पैसे कमाने का नशा हावी होता चला जाता है। फायदा एड कम्पनी को होता है और उस प्लेटफ़ॉर्म को जो यह सहूलियत मुहैया करवाती हैं।

डॉक्टर के मुताबिक ज़रूरी है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ माता पिता पर न लादी जाए। सोशल मीडिया कम्पनी पर दबाव डाला जाना चाहिए कि वे अपने प्रोग्राम और एल्गोरिदम बच्चों को फंसाने के लिए विकसित न करें। ऐसा करने पर दंड का प्रावधान होना चाहिए।

बच्चों और युवाओं के भविष्य के लिए जरूरी है सोशल मीडिया पर नकेल कसना

1.उपलब्धता जटिल बनााएं

नीतिनिर्माता ऐसे क़दम उठाए कि सोशल मीडिया बच्चों को इतनी आसानी से उपलब्ध ना हो। एक न्यूनतम उम्र दर्ज हो जिससे छोटी उम्र के बच्चे सोशल मीडिया में एकाउंट नहीं खोल सकें। सोशल मीडिया पर सुरक्षा का ध्यान रखा जाए, बच्चों की निजता का सम्मान किया जाए और सोशल मीडिया डिजिटल और मीडिया लिटरेसी को बढ़ावा दे।

2. प्रभाव का आकलन करें

टेक्नोलॉजी कंपनी को सोशल मीडिया का असर बच्चों पर किस तरह हो रहा है उस पर नज़र रखनी चाहिए न कि उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को ख़तरे में डालना चाहिए।

3. निजी जानकारियों को निजी रखें

बच्चों और किशोरों को डिवाइसेस पर समय कम बिताने का इरादा बनाना चाहिए और अपनी निजी जीवन की जानकारी सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए।

4. इंगेजमेंट रिसर्च हो

सोशल मीडिया पर इंगेजमेंट को लेकर और रिसर्च किया जाना चाहिए ताकि हम अपने बच्चों के लिए बेहतरीन प्रैक्टिस को अपना सके।

5. घर को टेक फ्री जोन बनाएं

माता-पिता को घर में टेक फ़्री ज़ोन बनाना चाहिए । उन्हें अपने बच्चों के साथ खेलने और समय व्यतीत करने का समय निकालना चाहिए। ज़रूरी है कि उनके बीच रिश्ते और मज़बूत हों और उनका साथ होना बच्चों के विकास में कारगर सिद्ध हो।

फोटो सौजन्य- गूगल

Foods For Pregnant Woman

Foods in Pregnancy: आप ने ये जरूर सुना होगा कि प्रेगनेंसी के समय आपकी खाने की आदतें बदल सकती हैं। आपको ऐसे खाद्य पदार्थ मिलेंगे जो आपके फेवेरिट होंगे और जो आपके और आपके बच्चे दोनों के लिए हेल्दी होंगे। पौष्टिक आहार खाने से आपको अपनी प्रेगनेंसी और अपने शरीर में होने वाले नए बदलावों को समर्थन करने में सहाता मिलेगी। प्रेगनेंसी के वक्त हेल्थी खाने में यह जानना आवश्यक है कि कितना खाना है और कौन सा आहार जरूरी है।

इसमें आपके बच्चे के विकास के लिए पर्याप्त पोषक तत्व लेने और आपके साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखने के लिए बैलेंस बनाना भी शामिल है। पोषक तत्व शरीर के निर्माण खंड हैं जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा। आइये जानते हैं कि आपको प्रेगनेंसी में कौन से खाद्य आहार लेने चाहिए-

प्रेगनेंसी में किन खाद्य पदार्थों का सेवन करना है जरूरी, जानते हैं एक्सपर्ट से-

सबसे पहले जाने प्रेगनेंसी के दौरान लिए जाने वाले जरूरी पोषक तत्व

Why the demand for this new process increased to prevent unwanted pregnancy

फोलिक एसिड– फोलिक एसिड मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के कुछ जन्म दोषों को रोकने में मदद करता है।

आयरन– आयरन आपके बच्चे के विकास में मदद करता है और कई महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त आयरन नहीं मिलता है। इसके लिए डॉक्टर आपको कुछ दवाई भी देते है।

आयोडीन– आयोडीन आपके बच्चे के मस्तिष्क के लिए अहम है। अगर आप घर पर नमक का इस्तेमाल करते हैं, तो सुनिश्चित करें कि यह आयोडीन युक्त नमक हो।

कोलीन– कोलीन आपके बच्चे के मस्तिष्क के लिए भी महत्वपूर्ण है। कोलीन युक्त खाद्य पदार्थ चुनें – जैसे कम वसा और वसा रहित डेयरी, अंडे, लीन मांस, सी फूड, बीन्स और दालें।

प्रेगनेंसी में करें इन खाद्य पदार्थों का सेवन

These symptoms of pregnancy start appearing only 3 to 4 days after conceiving, pregnancy is confirmed even before the period is missed

दालें

अगर आप नॉनवेज खाते है या नहीं आपको दालों से प्रोटीन जरूर लेना चाहिए। एक कप पकी हुई दाल में लगभग 17 ग्राम प्रोटीन और लगभग 7 मिलीग्राम आयरन होता है।

दालें बी विटामिन होता हैं, जो आपके बच्चे के मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है और स्पाइना बिफिडा जैसे न्यूरल-ट्यूब डिफेक्ट के खिलाफ एक शक्तिशाली सुरक्षात्मक प्रभाव है, एक जन्म विकार जिसमें रीढ़ ठीक से नहीं बनती है।

नट्स

नट्स छोटे जरूर दिख सकते है लेकिन ये बहुत ताकतवर होचे है। इसमें मैग्नीशियम, जिंक, पोटैशियम और विटामिन ई जैसे महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं, साथ ही प्रोटीन, फाइबर और स्वस्थ वसा भी होते हैं। इन्हें आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे ये गर्भावस्था के दौरान खाने के लिए आदर्श स्नैक बन जाते हैं।

एवोकाडो

क्रीम जैसा हरा फल फोलेट से भरपूर होता है, साथ ही इसमें विटामिन बी6 भी होता है, जो बच्चे के लिए स्वस्थ ऊतक और मस्तिष्क के विकास को बढ़ावा देता है और ये आपको मॉर्निंग सिकनेस से निजात दिलाने में भी सहायक हो सकता है।

यह स्वस्थ मोनोअनसैचुरेटेड फैट का भी एक स्वादिष्ट स्रोत है, जो आपके शरीर को फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले कई विटामिनों को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में मदद करता है।

अंडे
आप शायद जानते होंगे कि अंडे प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत है। ये पकाने में आसान में आसान होते है और एक बड़ा अंडा 6 ग्राम प्रोटीन देता है। अंडे विटामिन डी के कुछ खाद्य स्रोतों में से एक हैं। विटामिन डी आपके बच्चे की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में मदद करने के साथ-साथ आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाए रखने में बहुत मदद करते है।

ओट्स

फाइबर आपको लंबे समय भूख महसूस होने नहीं देता है और गर्भावस्था के दौरान होने वाली असहज कब्ज से बचने में मदद मिल सकती है। ओट्स फाइबर का बेहतरीन स्रोत है। फाइबर के साथ साथ एक कप ओट्स आपके रोजाना मैग्नीशियम का 30 फीसदी से ज़्यादा प्रदान करता है, ये आपके बच्चे को स्वस्थ हड्डियों और दांतों के निर्माण में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Some special tips about female orgasm

Female Orgasm: महिलाओं में भी सेक्स को लेकर असीम डिजायर होता है लेकिन वो अपने पार्टनर से ऑर्गेज्म के बारे में खुलकर बात नहीं कर पातीं। कुछ ऐसी भी महिलाएं हैं जिन्होंने कभी ऑर्गेज्म का अनुभव नहीं किया। हालांकि, महिलाओं को पहले अपनी बॉडी से जुड़ी हर जानकारी होना अहम है, तब वे अपने पार्टनर को अपनी बॉडी एक्सप्लोर करते समय अपना प्लेजर प्वाइंट से अवगत करा सकती हैं। वहीं, कई बार महिलाओं के काफी प्रयास के बाद भी उन्हें ऑर्गेज्म नहीं आता, या फिर उन्हें ऑर्गेज्म तक पहुंचने में लंबा वक्त लग सकता है। बतां दें कि ऐसा क्यों होता है, क्योंकि महिलाएं अपना प्लेजर प्वाइंट नहीं जानती।

क्या आप जानते हैं ऑर्गेज्म भी अलग-अलग तरह के हो सकते हैं। महिलाओें के ऑर्गेज्म तक पहुंचने का तरीका अलग-अलग हो सकता है। एक्सपर्ट से जानेंगे कि महिलाएं में कितने प्रकार के ऑर्गेज्म हासिल कर सकती हैं।

यहां जानें अलग अलग प्रकार के फीमेल ऑर्गेज्म

1. G-स्पॉट ऑर्गेज्म

Some special tips about female orgasm

जी स्पॉट वेजिनल वॉल में अंदर की तरफ होता है। यह आपकी वेजाइनल ओपनिंग और सर्विक्स के बीच होता है। कुछ शोधकर्ताओं का तर्क है कि यह एक यौन अंग है, जबकि अन्य मानते हैं, कि यह क्लीटोरिस के नर्व एंडिंग के नेटवर्क का हिस्सा है। जी-स्पॉट सेक्स अन्य तरह के सेक्स की तुलना में काफी तीव्र महसूस होते हैं।

2. ब्लेंडेड ऑर्गेज्म

ब्लेंडेड ऑर्गेज्म वे क्लाइमैक्स है, जो एक समय में एक से अधिक एरोजेनस जोन के उत्तेजित होने पर प्राप्त होती है। क्लिटोरिस, जी-स्पॉट, निप्पल जैसे कामुक क्षेत्रों का कोई भी संयोजन मिश्रित ऑर्गेज्म की ओर ले जा सकता है।

3. वेजाइनल ऑर्गेज्म

क्लिटोरिस के अलावा, योनि में अतिरिक्त उत्तेजक जोन होते हैं। ए-स्पॉट, या एंटीरियर फोर्निक्स, सर्विक्स के ठीक नीचे योनि की उच्च सामने दीवार पर स्थित है। इस क्षेत्र को सही तरीके से छूने पर एक डीप वेजाइनल सेक्स ट्रिगर हो सकता है। कुछ महिलाएं सर्विक्स के स्टिम्युलेट होने से भी ऑर्गेज्म प्राप्त कर लेती हैं। क्योंकि इन क्षेत्रों में नर्वस के साथ लिगामेंट होते हैं, जो अत्यधिक संवेदनशील हो सकते हैं।

4. निप्पल ऑर्गेज्म

Some special tips about female orgasm

आपके ब्रेस्ट और निप्पल ज्यादातर महिलाओं के एरोजेनस जोन होते हैं, इसलिए उन क्षेत्रों को उत्तेजित करके ऑर्गेज्म प्राप्त करना संभव है। निप्पल विशेष रूप से छूने पर प्रतिक्रिया करती है, क्योंकि उनमें कई नर्व एंडिंग होती हैं।

5. क्लिटोरल ऑर्गेज्म

क्लिटोरिस एक यौन अंग है, जो योनि के बाहरी भाग पर एक छोटे से उभरे हुए टिशु की तरह दिखती है, लेकिन यह आपकी योनि में भी आंतरिक रूप से फैली हुई होती है। यह लाखों नर्व एंडिंग से बनी होती है, जो इसे उत्तेजना के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील बनाते हैं। क्लिटोरिस को सीधे उत्तेजित करने या क्लिटोरिस के आस-पास के लेबिया को छूने से उस क्षेत्र में ब्लड फ्लो बढ़ जाता है, जिससे क्लिटोरिस फूल जाता है और उसे ऑर्गेज्म की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आप अपनी क्लिटोरी को स्टिमुलेट कर आर्जेम प्राप्त कर सकती हैं।

6. मल्टीपल ऑर्गेज्म

महिलाएं मल्टीपल ऑर्गेज्म का अनुभव कर सकती हैं, क्योंकि उन्हें ऑर्गेज्म और उत्तेजना के बीच बहुत अधिक समय की आवश्यकता नहीं होती है।

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

Electronic Gadget का इस्तेमाल और देर रात तक जगे रहने से सुबह उठना काफी मुश्किल हो जाता है। नींद की कमी आलस की मुख्य वजह होती है जिसका कुप्रभाव वर्कआउट रूटीन पर भी पड़ता है। ऐसे में ज्यादातर लोग वर्कआउट रूटीन को स्किप करने लगते हैं जिसका निगेटिव असर उनके स्वास्थ्य पर भी दिखने लगता है। ऐसे में बॉडी को हेल्दी और एक्टिव बनाए रखने के लिए वर्कआउट से पहले महसूस होने वाले आलस्य को दूर करना जरूरी है।

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

इसे लेकर एक्सपर्ट का कहना है कि नियमित रूप से वर्कआउट में शामिल ना होना आलस्य को काफी बढ़ावा देता है। इसके कारण वर्कआउट रूटीन को नियमित बनाए रखने नामुमकिन लगने लगता है। इससे बचने के लिए सुबह उठते ही गैजेट्स के इस्तेमाल से बचें और बेड पर ही लेग स्ट्रेचिंग योगाभ्यास करें। इससे आलस्य को दूर भगाने में मदद मिलती है। अलावा इसके दूसरे दोस्तों के साथ एक्सरसाइज करने से कॉम्पीटिशन की भावना बढ़ने लगती है।

इन टिप्स की मदद से सुस्ती को दूर किया जा सकता है

1. फिटनेस गोल्स करें सेट

वर्कआउट रूटीन को कामयाब बनाने के लिए सबसे पहले गोल्स को सेट करना बहुत ज़रूरी है। इससे व्यायाम से पहले बढ़ने वाला आलस्य और नींद की समस्या को दूर करने में मदद मिलती है। इसके लिए स्वयं वर्कआउट चैलेंज तय करें और उसे पूरा करने के लिए खुद को प्रोत्साहित करते रहें। समय-समय पर गोल्स सेट करते हैं और उन्हें अचीव करते हुए आगे बढ़ें।

2. आसान एक्सरसाइज़ से करें शुरुआत

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

वेट लिफ्टिंग और हाई इंटैसिटी एक्सरसाइज़ शुरूआत में थकान का कारण बनने लगते है। इससे शारीरिक तनाव की समस्या बढ़ने लगती है। लेकिन तन और मन दोनों के लिए ही फायदेमंद साबित होती है। ऐसे में व्यायाम को नियमित बनाए रखने के लिए आसान एक्सरसाइज़ को अपने रूटीन का हिस्सा बनाएं और फिर धीरे धीरे उसें बदलाव लेकर आएं। इससे शरीर को न केवल थकान से बचने में मदद मिलती है बल्कि बॉडी फिश्र रहती है।

3. स्ट्रेचिंग से होगा आलस्य दूर

सुबह उठने के बाद आलस्य की समस्या को दूर करने के लिए कुछ देर स्ट्रेचिंग करें। इससे शरीर का ब्लड सर्कुलेशन नियमित हो जाता है और लेज़ीनेस दूर होने लगती है। टांगों की स्ट्रेच करने से लेकर बाजूओं और कमर की स्ट्रेचिंग आवश्यक है। इससे शारीरिक अंगों में महसूस होने वाली स्टिफनेस से बचा जा सकता है और ऑक्सीज़न का फ्लो भी उचित बना रहता है।

4. दोस्तों के साथ करें वर्कआउट प्लान

अपनी फिटनेस जर्नी को रेगुलर बनाए रखने के लिए वर्कआउट पार्टनर चुनें। इससे फिटनेस रूटीन को पूरा करने के लिए कॉपिटिशन की भावना बढ़ने लगती है, जिससे आलस्य की समस्या से राहत मिलती है और सेल्फ मोटिवेशन की भावना काफी हद तक बढ़ जाती है।

5. सोने और उठने का समय तय करें

बहुत बार नींद पूरी ना होना भी लेज़ीनेस को बढ़ा देता है। ऐसे में वर्कआउट से पहले आलस्य को दूर करने के लिए रोज़ाना एक नियमित समय पर सोएं और उठें। इससे न केवल स्वास्थ्य संबधी समस्याओं से बचा जा सकता है बल्कि नींद की गुणवत्ता भी बढ़ने लगती है और शरीर एक्टिव बना रहता है। खुद को वर्कआउट के लिए तैयार करने से पहले 06 से 08 घंटे की नींद रोज़ाना लें और समय से उठें।

फोटो सौजन्य- गूगल

7 common life mistakes that can ruin your sex life

आप भी अपने Partner से जुदा-जुदा रहती हैं क्या? कभी-कभी ऐसा फील होता है क्या कि रिश्ते में कटास आ गई है? आप अगर अपने रिश्ते को परवान चढ़ाते हुए लंबा ले जाने का रास्ता तलाश रही हैं तो आप एकदम सटीक जगह पर हैं। हकीकत में तेज रफ्तार लाइफ में जितनी तेजी से रिश्ते बनते हैं उनके टूटने का भय भी उतना ही अधिक रहता है। खासतौर से लंबे रिलेशनशिप में रहना किसी के लिए भी इमोशनल अत्याचार बन सकता है। जिससे आप मुहब्बत करती हैं उससे इतने लंबे वक्त तक दूर रहना आपको एक इमोशनल रोलरकोस्टर राइड पर ले जाने के लिए काफी है। जिसमें एक समय खुशी और दूसरे समय गम के गुबार हो सकते हैं। इसलिए ऐसे मसले में आपको अपनी भावनाओं और अपने रिश्ते को काफी प्यार और देखभाल के साथ संभालने की आवश्यकता है।

यह सुनिश्चित करना भी बहुत जरूरी है कि आपके बीच की शारीरिक दूरी भावनात्मक दूरी और गलतफहमी में ना तब्दील हो जाए। लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में आप दोनों अलग-अलग वक्त पर चीजें करते हैं क्योंकि कई जगहों पर समय का भी अंतराल होता है। ऐसे में एक दूसरे से संपर्क में रहना भी मुश्किल हो जाता है। तो चलिए जानते हैं कि आप अपने लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप को कैसे बेहतर बना सकते है।

आईये जानें कैसे लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप को मजबूत और आनंददायक बनाया जा सकता है-

1. रोमांटिक वर्चुअल डेट नाइट्स का करें प्लान

सिर्फ जन्मदिन या सालगिरह पर कभी-कभार डेट करने के बजाय, अक्सर अपने प्यार का जश्न मनाए। एक वर्चुअल डेट रखें। ऐसा दिन और समय चुनें जो आप दोनों के लिए सुविधाजनक हो और अपना खास ध्यान अपने विशेष व्यक्ति पर उसी तरह लगाएं जैसे आप फिजिकल डेट पर करते हैं। थोड़े से प्रयास से वर्चुअल डेट को खास बनाया जा सकता है।

सुनिश्चित करें कि आपका इंटरनेट कनेक्शन अच्छा है ताकि आपकी डेट नाइट में कोई बाधा ना आ सके। क्योंकि बाधा आप दोनों के मूड को चेंज कर सकती है।

2. इंटिमेट मैसेज से उन पल का लें मजा

Some Natural Ways To Spice Up Your Sex Life

अगर आप अपने प्यार का इज़हार आपस में जुड़े होठों और आपस में उलझी उंगलियों से नहीं कर सकते तो निराश न हों। इंटिमेट मेसेज भेजना उन चीज़ों को महसूस करने में आपकी मदद करता है।

अपने पिछले इंटिमेट अनुभव पर बात कर सकते हैं और उसे फिर से जी सकते हैं, धीरे-धीरे अपना ध्यान अपनी कल्पनाओं पर फोकस कर सकते हैं।

3. एक सरप्राइज विजिट प्लान कर सकते हैं

आप अपने पार्टनर से मिलने के लिए एक सरप्राइज़ यात्रा कर सकते हैं उन्हें बिना बताए आप उन्हें मिलने के लिए उनके घर पहुँच सकते हैं। जिससे देख कर वह काफ़ी ख़ुश हो सकते हैं। इसके लिए आप एक योजना बनाएं जिसमें आपके पार्टनर को ये पता न चले कि आप उनसे मिलने आ रही है।

इस तरह के सरप्राइज़ आपके पार्टनर को यह महसूस करा सकते हैं कि वे आपके लिए ज़रूरी है कि इससे उन्हें खास फ़ील करने में भी मदद मिल सकती है। क्योंकि आप एक दूसरे से काफ़ी समय से दूर हैं जिसकी वजह से इमोशनल कनेक्शन ख़त्म हो सकता है। इस तरह के सरप्राइज़ विज़िट उन्हें फिर से इमोशन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

4. उन्हें सरप्राइज़ देने के लिए कोई स्किल सीखें

आप गिटार पर एक रोमांटिक गाने की दिल को गुनगना देने वाली धुन बजाना सीख सकते हैं और अपने अगले वीडियो कॉल पर अपने पार्टनर को सरप्राइज़ कर सकते हैं। एक नृत्य, एक पेंटिंग, या एक स्केच भी आपको उनकी आँखों में चमक देखने में मदद कर सकता है। अपने साथी को बताएं कि वे आपके लिए एक प्यारी आदत की तरह हैं और आप उनसे कितना प्यार करते है।

5. एक-दूसरे से बातें शेयर करते रहें

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लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में रहने पर ये समझना बहुत ज़रूरी है कि आप एक दूसरे से अपनी हर एक बात शेयर करें क्योंकि आप एक दूसरे के साथ नहीं रह रहे हैं या समय समय पर एक दूसरे से नहीं मिल रहे हैं। इसलिए पार्टनर ख़ुद देख कर उसके मूड का पता नहीं लगा सकता हैं। इसलिए लॉन्ग डिस्टेंस में रहने पर एक दूसरे से बातें शेयर करना और उन्हें ये बताना कि आप ख़ुश हैं या या नहीं है बहुत ज़रूरी है।

जब आप पार्टनर के साथ होते हैं तो ये अपेक्षाएं कर सकते हैं कि वो आपको देखकर समझ जाएं कि आपको कोई बात परेशान कर रही है या नहीं, लेकिन जब दूर होते हैं तो आपको ये समझना चाहिए कि वो आप ख़ुद देख नहीं पा रहे हैं और न ही मिल पा रही है जिससे वो आपके मूड को खुद नहीं समझ पाएंगे उसके लिए आपको उन्हें बताना ही होगा।

6. छोटी बातों को तूल न दें

जब आप लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में रहते हैं तो छोटी छोटी बातों को ज़्यादा तूल देने से या बड़ा बनाने से बचना चाहिए। ऐसी लड़ाई से बचना चाहिए जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि जब आप दूर रहते हैं तो गलतफहमियां अधिक हो सकती है क्योंकि उस समय न आप एक दूसरे से मिलते हैं और न ही बहुत ज़्यादा बात हो पाती है।

7. इसे समझने की कोशिश करें कि आप वाकई दूर हैं

इस बात को एक्सेप्ट और समझना बहुत ज़रूरी है कि आप लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में है इसलिए वो चीज़ें आपके रिश्ते में नहीं हो सकती जो साथ में रहते हुए एक रिलेशनशिप में हो सकती है। इसलिए उन चीज़ों को लेकर शिकायतें करने से बचना चाहिए जो लॉग डिस्टेंस रिलेशनशिप में संभव नहीं है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Government's alert on the havoc of heat

गर्मी का कहर दिनों दिन बढ़ रहा है और इसी वजह से दिल्ली का तापमान 48 डिग्री तक जा पहुंचा है। यहां कई इलाकों में हद से ज्यादा गर्मी बढ़ने से लू के कारण रेड अलर्ट घोषित किया गया है। चिलचिलाती गर्मी जहां निर्जलीकरण का कारण बनती है। वहीं, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में तेज़ धूप और गर्मी के कारण सिरदर्द और डायरिया का जोखिम बढ़ रहा है। जानते हैं हीट एग्जॉर्शन के नुकसान और इससे बचने के उपाय।

सेहत के लिए नुकसानदेह है गर्मी का बढ़ना

अत्याधिक गर्मी के संपर्क में रहने से शरीर में हीट स्ट्रोक का खतरा बना रहता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक गर्मी का प्रभाव बढ़ने से पैरों में क्रैंप्स, चक्कर आना, सिरदर्द और डिज़िनेस बढ़ने लगती है। इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट के मुताबिक हीट स्ट्रोक के कारण अक्सर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को थकान महसूस होना, अत्यधिक पसीना और हीट क्रैप्स का सामना करना पड़ता है।

इस बारे में फिजीशियन बताती हैं कि तापमान बढ़ने के चलते शरीर का थर्मोरेग्यूलेशन असंतुलित होने लगता है। जिससे हीटस्ट्रोक की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में गर्भवती महिलाओं, हृदय रोगियों, बच्चों और बुजुर्गों को इस समस्या से बचने के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

हीट एग्जॉर्शन से बचने के लिए शरीर में इलेक्‍ट्रोलाइटस की मात्रा को बनाए रखना ज़रूरी है। इससे शरीर हाइड्रेट रहता है।

जानते हैं हीट स्ट्रोक से बचने के कुछ खास उपाय

1. सिर को अच्छे से ढकें

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक धूप के संपर्क में आने से सिर, आंखों, स्किन, बालों और होठों पर बुरा असर नज़र आने लगता है। ऐसे में तेज़ गर्मी से बचने के लिए स्कार्फ, कैप, हैट और छाते का प्रयोग करें। अलावा इसके आंखों को प्रोटेक्ट करने के लिए काला चश्मा ज़रूर पहनें। साथ ही दोपहर के समय बाहर निकलने से भी बचना चाहिए।

2. बाहरी एक्टीविटी से बचें

Government's alert on the havoc of heat

लू से शरीर को बचाने के लिए आउटडोर खेलों से बचें। इससे शरीर में निर्जलीकरण का जोखिम कम हो जाता है। लगातार बढ़ते तापमान को देखते हुए इनडेर खेलों में हिस्सा लें और शरीर को ठंडा रखने की कोशिश करें। अन्यथा थकान, चक्कर आने और बेहोशी का सामना करना पड़ सकता है।

3. ठंडे शरबत का सेवन करें

आहार में नींबू पानी, नारियल पानी, बेल का शरबत और सत्तू जैसे नेचुरल ड्रिंक्स को अपने रूटीन में शामिल करें। इससे शरीर में इलेक्‍ट्रोलाइटस का नियमित स्तर बना रहता है। इसके अलावा मौसमी फलों और सब्जियों का सेवन करनें इससे डाइजेशन बूसट करने में मदद मिलती है।

4. बाहर का खाना खाने से करें परहेज़

फ्रेस और घर का पका खाना खाने से शरीर नॉज़िया, सिरदर्द डायरिया के खतरे से बचा रहता है। ऐसे में मसालेदार और ऑयली खाना खाने की जगह हल्का खाना खाएं और घर का पका खाना आहार में शामिल करे। इसके अलावा किसी भी मील को स्किप करने से बचें। इससे शरीर में एनर्जी की कमी को सामना करना पड़ता है। साथ ही कमज़ोरी और थकान बढ़ने लगती है।

गर्मी में बुजुर्गों का इस प्रकार से रखें ख्याल

तेज़ धूप में बाहर निकलने से अक्सर बचें। इससे शरीर में थकान बढ़ने लगती है और शरीर का संतुलन खोने लगता है। इससे चक्कर आने की संभावना बनी रहती है।
बासी खाना खाने से बचें और घर का पका ताज़ा और हल्का खाना अपने आहार में शामिल करें।
ज्यादा मात्रा में चाय और कॉफी का सवेन करने से बचें। इससे शरीर में निर्जलीकरण का खतरा बना रहता है।
कमरे का तापमान गर्म न रहने दें। शरीर का ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशनर, कूलर और पंखे के सामने बैठें।
हल्के रंगों और ब्रीथएबल फ्रब्रिक यानि कॉटन के कपड़े पहनें। इससे शरीर गर्मी के प्रकोप से दूर रहता है।

बच्चों का गर्मी में ऐसे रखें ख्याल

  • धूप में निकलने से बचें। इससे बच्चों में डिहाइड्रेशन का खतरा बना रहता है। घर से बाहर निकलने से पहने पानी की बोतल अपने साथ रखें।
  • गर्मी में लगातार खेलने से बच्चो में थकान बढ़ने लगती है। ऐसे में दिन में कुछ देर उनके आराम के लिए समय निकालें। इससे बच्चे के शरीर में एनर्जी बनी रहती है।
  • शाम के समय आउटडोर एक्टीविटीज़ के लिए जाएं। उस समय तापमान कम होने लगता है, जिससे शरीर में लू का खतरा कम हो जाता है।
  • प्रोसेस्ड फूड और शुगरी पेय पदार्थों का सेवन करने से बचें। इसकी जगह प्राकृतिक पेय पदार्थ पीएं और हेल्दी मील लें।

फोटो सौजन्य- गूगल

Sleep Separation: Separation of bedroom for a long time causes distance in relationships

Sleep Separation: आजकल शादीशुदा जिंदगी में एक ‘आदत’ काफी तेजी से फैल रहा है वो है स्लीप सेपरेशन या स्लीप डाईवोर्स। हम जानते है कि शादी के बाद कपल्स कई दिनों तक एक-दूसरे के साथ हर जगह स्पेस साझा करते हैं फिर चाहे वो बेड हो, किचन हो या आउट डोर। अगर वो अचानक एक दिन अपने बेडरूम अलग करने लगते हैं और ‘मी टाइम’ की तलाश में रहते हैं जिसे स्लीप सेपरेशन या स्लीप डाइवोर्स कहा जाता है। सुकून की नींद, आराम और पर्सनल स्पेस के लिए बहुत सारे लोग इस फॉर्मूला को अपना रहे हैं। इस स्थिति में दोनों पार्टनर अलग-अलग कमरों में सोते हैं। जिन लोगों को देर रात तक काम करना होता है, वे लोग भी पार्टनर की सहुलियत के लिए ऐसा करना चुनते हैं। लेकिन इसके सिर्फ फायदे ही नहीं हैं, कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं। जिसका पता आपको काफी देर से लगता है।

पहले जानें स्लीप डाइवोर्स है क्या?

Sleep Separation: Separation of bedroom for a long time causes distance in relationships

जब दो लोग किन्हीं कारणों से अपने बेडरूम अलग अलग कर लें, तो उस परिस्थिति को स्लीप डाइवोर्स कहा जाता है। कोई लाइट जलाकर सोना चाहता है, तो कोई देर तक काम करने का आदी है। ऐसे में दूसरा व्यक्ति हर बार अपनी नींद से समझौता करने लगता है। पर लंबे वक्त इस समस्या से दो चार होने के बाद अक्सर पार्टनर नींद की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए अलग सोने का फैसला करते हैं। अब वे अपने लिए अलग बेडरूम की तलाश करते हैं, जिसे स्लीप डाइवोर्स कहा जाता है।

वहीं, इंटरनेशनल हाउसवेयर एसोसिएशन के मुताबिक शादी या रिलेशन के कुछ सालों बाद हर 05 में से 01 कपल अलग-अलग सोने लगता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई लोग घर खरीदने से पहले दोहरे मास्टर बेडरूम की तलाश करते हैं। अलग-अलग सोना कुछ समय के लिए तो फायदेमंद है लेकिन लंबे वक्त तक अगर इसी रूटीन को फॉलो किया जाए, तो इसका खामियाजा आपके रिश्तों को उठाना पड़ सकता है।

आखिर क्यों बढ़ने लगे हैं स्लीप डाइवोर्स के केस

इस बारे में एक्सपर्ट का कहना है कि नींद हमारे मानसिक स्वास्थ्य की बुनियाद है। नींद की गुणवत्ता में सुधार लाने से व्यक्ति तनाव, चिंता और डिप्रेशन से बचा रहता है। अगर आप पूरी नींद लेते हैं, तो उससे पार्टनर के साथ व्यवहार में भी बदलाव आने लगता है। न केवल कम्यूनिकेशन बेहतर होने लगता है बल्कि व्यक्ति को पर्सनल स्पेस मिलने लगता है। मगर कहीं न कहीं इससे रिलेशनशिप में चेंजिज़ आने लगते हैं। जहां सेक्सुअल लाइफ पर विराम लग जाता है, तो वहीं इमोशनल कनेक्शन लॉस होने लगता है। व्यक्ति इनसिक्योर फील करने लगता है।

जानें स्लीप डाइवोर्स के साइड इफे्क्टस

1 आपस में इमोशनल कनेक्शन का लॉस होना

Sleep Separation: Separation of bedroom for a long time causes distance in relationships

बढ़िया नींद पाने के लिए स्‍लीप डिवोर्स इन दिनों खूब ट्रेंड में हैं लेकिन दिनभर की दौड़भाग के बाद व्यक्ति अपने पार्टनर से अपनी दिनचर्या को साझा करता है और अपने अनुभव भी शेयर करता है। अकेले सोने से व्यक्ति उन सभी चीजों से वंचित रह जाता है। दरअसल, आपको सुनने वाला व्यक्ति आपके आसपास नहीं रहता है। इससे दो लोगों के मध्य बनने वाला इमोशनल कनेक्शन लॉस होने लगता है।

2 रिश्तों में इंटिमेसी की कमी

टचिंग, किसिंग, कडलिंग और स्पूनिंग पार्टनर के साथ रिश्ते को मज़बूत बनाते हैं। सेपरेट स्लीप के दौरान व्यक्ति पहले पहल पार्टनर को मिस करने लगता है और फिर उसी रूटीन को फॉलो करने लगता है। इससे सेक्सुअल लाइफ प्रभावित होती है, जिससे कुछ लोग तनाव का सामना करने लगते हैं।

3 अकेलेपन में इजाफा

स्लीप क्वालिटी को बढ़ाने के लिए अक्सर कपल्स स्लीप डाइवोर्स को अपनाते हैं। मगर दूर दूर सोने से व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करने लगता है। इससे संबधों में दूरियां बढ़ने लगती है और ये मिसअंडरस्टैंडिग का कारण भी बन जाता है। दरअसल, स्लीप डाइवोर्स में लोग खुद को इनसिक्योर समझने लगते हैं।

4 टूट भी सकता है रिश्ता

कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि जो जोड़े एक साथ बिस्तर शेयर करते हैं, उनमें मनमुटाव या विवाद के सुलझने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं। जबकि अलग-अलग सोने वाले जोड़े एक ही मुद्दे पर लंबे समय तक झगड़ते रह सकते हैं। ऐसे में रिश्ता टूटने या किसी एक या दोनों के कहीं ओर स्पेस तलाशने का जोखिम ज्यादा बढ़ जाता है।

अच्छी नींद और कम्फर्ट के लिए अलग सो रहे हैं, तो इन बातों का रखें खास ध्यान

  • एक साथ समय कब बिताना है, इस बारे में जरूर बात करें और उस रुटीन को फॉलो करें।
  • मी टाइम के साथ-साथ वी टाइम के महत्व को समझते हुए उसे साथ बिताने के बारे में भी प्लान करें। इससे साथ का अहसास बना रहता है।
  • वीकेण्ड पर स्लीप डाइवोर्स से ब्रेक लें। इससे रिश्तों में संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलती है और फिज़िकल इंटिमेसी बनी रहती है।
  • अलग-अलग कमरों में सोते हैं और किसी मसले पर विवाद है, तो उस पर बात करने का समय निकालें। उसे जल्द से जल्द सुलझाने का प्रयास करें।
  • गैजेट्स को बेडरूम से बाहर रखें। यह आपकी नींद और रिश्ते दोनों के लिए ही अच्छा है।
If you don't want to invite diseases then stop using sodium immediately

Sodium: शरीर को हेल्दी रखने के लिए संतुलित आहार का होना अहम है। इसके लिए सभी न्यूट्रिएंट्स का होना जरूरी है। किसी भी एक न्यूट्रिएंट की कमी या ज्यादा कई तरह के स्वास्थ्य प्रोब्लम्स को आमंत्रित करता है। ऐसा ही एक पोषक तत्व सोडियम है। सोडियम का इजाफा कई बीमारियों की वजह बन सकती है। यह हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का कारण भी बन सकता है। इसलिए हमें इसके इस्तेमाल पर पूरा ध्यान देन की जरूरत है।

कितना सोडियम हेल्द के लिए ठीक है, डॉक्टर से यह सलाह आवश्य लें-

  • 14 साल और उससे अधिक उम्र के व्यक्ति : प्रतिदिन 2,300 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 9 से 13 साल की आयु के बच्चे:                     प्रतिदिन 1,800 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 4 से 8 साल की आयु के बच्चे:                      प्रतिदिन 1,500 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 1 से 3 साल की आयु के बच्चे:                       प्रतिदिन 1,200 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं

जानें भोजन में सोडियम को कम करने के तरीके

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1. कम सोडियम वाले भोजन

हम जो सोडियम खाते हैं, उसका ज़्यादातर हिस्सा हमारे नमक के डिब्बे से नहीं आता। सोडियम लगभग सभी प्रोसेस्ड और तैयार खाद्य पदार्थों में होता है, जिन्हें हम खरीदते हैं। यहां तक कि ऐसे खाद्य पदार्थ भी, जिनका स्वाद नमकीन नहीं होता, उनमें भी सोडियम मौजूद होता है। जैसे ब्रेड या टॉर्टिला।
जब आप खरीदारी कर रही हैं, तो इन खाद्य पदार्थों को सीमित करें। जिनमें सोडियम की मात्रा ज़्यादा होती है, उन्हें एवॉइड करें। प्रोसेस्ड मीट, सॉसेज, पेपरोनी, सॉस, ड्रेसिंग, इंस्टेंट फ्लेवर्ड फ़ूड, जैसे फ्लेवर्ड चावल और नूडल्स खरीदना कम कर कर दें। उनके स्थान पर लो सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की तलाश करें।

2. लेबल की जांच करें

खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा की जांच करने और विभिन्न विकल्पों की तुलना करने के लिए न्यूट्रिशन फैक्ट लेबल का उपयोग करें।”कम सोडियम” या “नमक नहीं मिलाया गया” लेबल वाले खाद्य पदार्थों की तलाश करें।

ध्यान रखें कि कुछ सोडियम वाले खाद्य पदार्थों पर ये लेबल भी नहीं होते हैं। इसलिए सुनिश्चित करने के लिए न्यूट्रिशन फैक्ट लेबल की जांच करनी होगी। सोडियम की जांच करने के लिए पोषण तथ्य लेबल का उपयोग करना सीखें।

3. हेल्दी विकल्प चुनें

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अधिक सोडियम वाले खाद्य पदार्थों को स्वस्थ विकल्पों से बदलें। नमकीन प्रेट्ज़ेल या चिप्स की बजाय बिना नमक वाले नट्स खाएं।
डेली मीट या सॉसेज खरीदने की बजाय ताज़ा चिकन, लीन मीट या सी फ़ूड पकाने का प्रयास करें। ताज़ी सब्जियां, सॉस के बिना फ्रोजेन सब्जी या कम सोडियम वाली डिब्बाबंद सब्जियां खाएं।

4. घर का खाना ज़्यादा खाएं

अपना भोजन खुद बनाना सोडियम कम खाने का एक बढ़िया तरीका है। आप अपने भोजन में क्या डालती हैं, इस पर आपका नियंत्रण होता है। खाना बनाते वक्त कुछ बातों को ध्यान में रख सकती हैं।

अगर कैन फ़ूड का उपयोग करती हैं, तो खाने या पकाने से पहले उन्हें धो लें। इससे नमक की कुछ मात्रा निकल जाएगी। ऐसे मसाले और स्प्रेड चुनें, जो बिना नमक वाले हों या जिनमें सोडियम कम हो। अगर आप नियमित स्प्रेड का उपयोग करती हैं, तो कम इस्तेमाल करें। अपने भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक की जगह अदरक या लहसुन जैसी अलग-अलग हर्ब और मसाले काम में लाएं।

5. बाहर खाने पर लो सोडियम फूड का चुनाव

अगर किसी रेस्तरां में खाना खाने आई हैं, तो पूछें कि मेनू में कोई कम सोडियम वाला व्यंजन है या नहीं। जब आप ऑर्डर करें, तो उनसे बोले कि वे आपके खाने में नमक ना डालें। ड्रेसिंग और सॉस अलग से लें ताकि आप ज़रूरत के हिसाब से ही नमक डालें।

6. आहार में अधिक पोटैशियम शामिल करें

हाई सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की जगह हाई पोटेशियम वाले खाद्य पदार्थ लें। पोटेशियम युक्त खाद्य पदार्थ खाने से ब्लड प्रेशर कम करने में मदद मिल सकती है।

पोटैशियम के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं-

आलू
खरबूजा
केला
बीन्स
दूध
दही

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Surya Tilak

Surya Tilak: आयोध्या में रामलला विराजमान हो चुके हैं। जनवरी महीने से ही भक्तों का भीड़ उमड़ रही है। आयोध्या में राम मंदिर तैयार होने के बाद पहली बार श्री रामनवमी धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर रामलला का सूर्याभिषेक किया गया। रामलला के माथे पर करीब 04 मिनट तक सूर्य की किरणें उन्हें चूमती रहीं। इस खास नजारे को देखकर हर कोई अचंभित था। देखा जाए तो वैज्ञानिक तरीके से उनका सूर्य तिलक किया गया। इस मौके पर करीब 10 वैज्ञानिकों की टीम मंदिर परिसर में मौजूद रही।

सूर्य की किरणें जैसे ही रामलला के माथे पर पड़ी तो उनकी मूर्ति रोशनी से जगमगा गई। यह सूर्य तिलक करीब 2 से 2.50 मिनट तक चला। भगवान राम का सूर्य तिलक करने के लिए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों की टीम को शामिल किया गया था। इस भव्य, दिव्य और अलौकिक सूर्य तिलक का 100 एलईडी स्क्रीन से पूरे अयोध्या में लाइव टेलिकास्ट हुआ। इस अद्भुत नजारे का पूरा वीडियो सामने आया है।

रामलला का हुआ सूर्य तिलक

दरअसल, IIT की टीम ने दर्पण और लेंस से युक्त एक विशेष उपकरण बनाया है। ताकि सूर्य की किरणों को सीधे रामलला के माथे पर पड़ें। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस सूर्य किरण को ऑप्टोमैकेनिकल सिस्टम के तहत इसे अंजाम दिया गया है। मंदिर की तीसरी मंजिल पर ऑप्टो मैकेनिकल सिस्टम स्थापित किया गया। फिर हाई क्वालिटी मिरर, एक लेंस और खास कोणों पर लगे लेंस के साथ वर्टिकल पाइपिंग लगाए गए। मंदिर के ग्राउंड फ्लोर पर दो मिरर और एक लेंस फिट किए गए। तीसरे फ्लोर पर जरूरी उपकरण लगाए गए। सूर्य की रोशनी तीसरे फ्लोर पर लगे पहले दर्पण पर गिरी। फिर तीन लेंस और दो अन्य मिरर से होते हुए सीधे ग्राउंड फ्लोर पर लगे आखिरी मिरर पर पड़ी। इससे रामलला की मूर्ति के मस्तक पर सूर्य किरणों का एक तिलक होने लगा।

वहीं, पाइप के भीतरी सतह को काले पाउडर से रंगा गया ताकि सूर्य की किरणें बिखरने ना पाएं। सूर्य की गर्मी को रोकने के लिए इन्फ्रारेड फिल्टर ग्लास का भी प्रयोग किया गया है। सूर्य अभिषेक के रामनवमी के दिन सफल बनाने के लिए इसका ट्रायल भी किया गया था।

क्योंकि भगवान श्रीराम सूर्यवंशी थे..

CSIR-CBRI रुड़की के वैज्ञानिक ने कहा कि हर साल इस दिन आकाश पर सूर्य की स्थिति बदलती है। उन्‍होंने कहा कि विस्तृत गणना से पता चलता है कि श्री रामनवमी की तिथि हर 19 साल में दोहरायी जाती है। बता दें कि पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीराम सूर्यवंशी थे, इसलिए उन्हें सूर्य तिलक किए जाने की परंपरा है।