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Tag Archives: Masakalii

KK lost his life due to non-functioning of heart, post-mortem report cleared

लोकप्रिय और हर दिल अजीज गायक KK की मौत दिल के सही तरीके से काम ना करने के कारण हुई थी। इस बात का खुलासा पोस्टमार्टम रिपोर्ट से हुआ। ऐसे हालत को मेडिकल की भाषा में ‘मायोकार्डियल इनफार्कसन’ के नाम से जाना जाता है। मीडिया खबरों के अनुसार पोस्टमार्टम में मौत से कुछ वक्त पहले केके का दिल ब्लड को पर्याप्त मात्रा में पंप नहीं कर पा रहा था, जिसकी वजह से शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल रहा था।

पर्याप्त बल्ड पंप नहीं कर पाने के कारण केके को पहले से दिल संबंधी समस्याएं थीं। उनकी धमनियों में पीली-सफेज पट्टिया या वसा जम गई थी। कोलेस्ट्राल जमने की वजह से पोस्टेरियर इंटरवेंट्रिकुलर धमनी का खतरनाक रूप से संकुचन हुआ था। बाईं कोरोनरी धमनी के कई हिस्सों में एथेरोस्क्लेरोसिस या फैट्स जमा होने के कारण रुकावट देखा गया। न्यू मार्केट थाने की पुलिस ने अस्वाभाविक मौत का केस दर्ज किया था, हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इसे खारिज कर दिया है। खबर है कि केके को लंबे वक्त से गैस की समस्या थी। वह अक्सर इसकी मेडिसीन लिया करते थे। 30 मई को उन्होंने अपनी पत्नी से फोन पर बात की थी और उन्हें अपने कंधे और हाथ में दर्द होने की बात बताई थी।

वहीं, दूसरी तरफ कोलकाता पुलिस ने नजरुल मंच में केके की जिंदगी के आखिरी कंसर्ट के दौरान दिखी अव्यवस्था के मद्देनजर कॉलेज के रंगारंग प्रोग्राम के आयोजन पर अतिरिक्त शर्ते लागू करने का फैसला किया है। एक पुलिस अफसर ने कहा कि पहली और प्राथमिक शर्त ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन के समय ऑडिटोरियम परिसर में कम से कम एक एबुंलेंस और एक्सपर्ट डॉक्टर की व्यवस्था करने की होगी ताकि अचानक बीमार पड़े व्यक्ति को फौरन पास के अस्पताल भेजा जा सके।

दूसरी शर्त यह है- ऑडिटोरियम के अंदर व बाहर पंजीकृत सुरक्षा एजेंसी के सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करनी होगी। देखा जाता है कि छात्र संघ भीड़ को संभालने का जिम्मा कॉलेज के ही छात्रों को वोलेंटियर बनाकर सौंपता है। उन लोगों को भीड़ संभालने का कोई प्रशिक्षण मिला नहीं होता है।

तीसरी शर्त यह होगी- कार्यक्रम का आयोजन करने वाले छात्र संघ को पुलिस को यह सूचित करना होगा कि वे किस कलाकार को ला रहे हैं और उनके साथ कितने लोग होंगे। चौथी व आखिरी शर्त यह है कि कार्यक्रम के आयोजकों को लिखित तौर पर यह बताना होगा कि कार्यक्रम के लिए फ्री पास होंगे या उसके लिए भुगतान करना होगा। आयोजकों को बांटे जाने वाले पास की संख्या भी बतानी होगी।

फोटो सौजन्य- गूगल

The world is in awe of Monkey Pox, how it is making humans its prey, understand

कोरोना अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है कि अब नई बीमारी Monkey Pox के आने से लोगों को एक नए खतरे का सामना करना पड़ रहा है। मंकी पॉक्स एक ऐसा वायरस है जो इन्सान से इन्सान में फैलता है। अगर कोई किसी संक्रमित के संपर्क में आता है तो उसे भी तुरंत पकड़ लेता है। मंकी पॉक्स ने केंद्र और राज्यों की चिंता काफी बढ़ा दी है। कई स्टेट में तो सरकारों ने खास गाइडलाइंस भी जारी कर दी है। अफ्रीका और यूरोप देशों से इसके बहुत ज्यादा मामले सामने आए हैं। यह काफी डेंजरस वायरस बताया जा रहा है जो फैल जाए तो कोरोना जैसी महामारी लोगों को देखने को मिल सकती है। चार स्टेज में फैलता है इसका वायरस और अलग-अलग लक्षण देखने को मिलते हैं।

आइये समझते हैं इसके स्टेज को-

स्टेज 1- पहले स्टेज पर कोई इन्सान अगर संक्रमित होता है तो उसमें लक्षण नजर आने लगते हैं। लक्षण अपर रेस्पिरेटरी सिस्टम से जुड़े होते हैं और काफी हद तक बुखार जैसे लगते हैं। पहले स्टेज के लक्षणों में बुखार, शरीर में दर्द और टायडनेस फील हो सकती है।

स्टेज 2- मंकी पॉक्स की दूसरी स्टेज में बुखार जैसे लक्षण तो रहते ही हैं, साथ ही त्वचा पर थोड़ी संख्या में कुछ गांठ दिखने लगती हैं।

स्टेज 3- मंकी पॉक्स की तीसरी स्टेज पर लिम्फैडेनोपैथी हाथों, पैरों, चेहरे, मुंह या प्राइवेट पार्ट्स पर होने वाले दानों या चकत्ते में बदल सकती है।

स्टेज 4- मंकी पॉक्स की चौथी यानी लास्ट स्टेज पर ये दाने या चकत्ते उभर कर बडे़ दाने हो जाते हैं या कुछ ऐसे पस्ट्यूल में बदल जाते हैं जिनमें मवाद जमा होती है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने समझाया-

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, मंकी पॉक्स एक ऐसा वायरस है जो चेचक की तरह फैलता है। चेचक की तरह इसके भी हल्के लक्षण होते हैं। यह बीमारी जानवरों से मनुष्यों में फैलती है। फिर लोगों ने दूसरे लोगों तक फैलती हुई चली जाती है। हालांकि, बीमारी लंबे समय तक नहीं रहती लेकिन खौफनाक जरूर होती है।

We live in an era where 'innocence' is called stupidity

कभी कभी यूंही बैठे-बैठे हम याद का हाथ थामे बहुत पीछे चले जाते हैं… जहां ज़िंदगी बहुत हसीन हुआ करती थी।
आज यूंही वो समय याद आ गया जब हम उस दौर को जिया करते थे, जिसमें लोग एक दूसरे की मदद के लिए हर समय तैयार रहते थे, एक का दर्द दूसरे के आसूं निकलवाने के लिए काफी होता था, एक की खुशी सब को नचाने के लिए काफी होती थी, एक का हक कभी दूसरा लेने की कोशिश नहीं करता था। वो ढेर सारा अपनापन, वो एक साथ चलने वाले संस्कार, वो किसी को नीचा ना दिखाने वाली सोच… कितने खुशनुमा सफ़र में थे हम..! मैं जानती हूं और आप सब लोग भी जानते है कि परिवर्तन संसार का नियम है। कुछ समय बाद हालात बदल ही जाते हैं लेकिन एक सच ये भी है कि कुछ परिवर्तन हम स्वीकार नहीं कर पाते। पर कुछ भी हमारे लिए नहीं रुकता और वो दौर भी बीत गया जहां ‘मासूमियत’ सिर्फ ‘मासूमियत’ हुआ करती थी। कभी कभी लगता है कि हम कहां से कहां आ गए, ऐसा क्या पाना था हमें जो वो मासूमियत भरा दौर हमें पीछे छोड़ना पड़ा और आज जब हम सब पीछे छोड़ ही आए है तो फिर क्यों दुबारा उसी दौर में मन बार-बार जाना चाहता है।

दरअसल, दिल तो आज भी बच्चा है जिसे सिर्फ अपनापन, प्यार, ढेर सारे अपनापन वाले रिश्ते और उस दौर वाली मासूमियत ही समझ आती है.. आज इस दौर को ये दिल समझ ही नही पाता.. जिसमें सिर्फ और सिर्फ मतलब छुपा है। ..तो चलिए फिर कुछ पंक्तियां के माध्यम से जान लेते है कि ये दिल क्यों बार बार उस दौर को याद करता है और इस दौर से निकल जाना चाहता है-

आजकल कौन किसको बेवजह गले लगाता है,
मतलब निकल जाए तो हर शख्स बदल जाता है,
तुम कौन से भ्रम में हो जनाब,
हम उस दौर में जी रहे है, जहां “मासूमियत” को बेवकूफी कहा जाता है।

अपनी बेपरवाहियों को बड़ी आसानी से मजबूरियों का नाम दे दिया जाता है,
किसी के कुछ हसीन किस्सों को बेवजह ही कहानियों में बदल दिया जाता है,
तुम तो चीज़ ही क्या हो जनाब, यहां दुआएं पूरी न होने पर भगवान तक को बदल दिया जाता है,
यकीनन, हम उस दौर में जी रहे है, जहां “मासूमियत” को बेवकूफी कहा जाता है।

किसी से कुछ लेकर उसे कहां वापिस लौटाया जाता है,
प्यार की आड़ में यहां दिलो से खिलवाड़ किया जाता है,
किसी की आपबितियों को यहां खामोशियों के हवाले कर दिया जाता है,
यकीनन, हम उस दौर में जी रहे है, जहां “मासूमियत” को बेवकूफी कहा जाता है।

किसी की मेहरबानियो को, चालाकियों से नोच लिया जाता है,
झूठों की इस दुनियां में, सच बेचारा कहीं दब कर रह जाता है,
उड़कर कोई चाहे अगर, उस नीले आसमान को छूना, तो उसके अपनों द्वारा ही उसके पंखों को कतरा जाता है,
यकीनन, हम उस दौर में जी रहे है, जहां “मासूमियत” को बेवकूफी कहा जाता है।

कोई छूले आसमान अपनी जिद से तो, उसको बड़ी तेज़ी से नीचे खींच लिया जाता है,
फिर उसकी रात दिन की मेहनत को, क़िस्मत के हवाले कर दिया जाता है,
दोबारा कभी वो उठ खड़ा ना हो, इसके लिए उसे सबकी नज़रों से गिराया जाता है,
तुम कौन से भ्रम में हो जनाब,
यकीनन, हम उस दौर में जी रहे है, जहां मासूमियत को बेवकूफी कहा जाता है।

Life wants to run me according to its own accord and heart at its own pace

पिछले कुछ सालों से याद ही नहीं कि कब मैं सुकून के दो पल बैठकर महसूस कर पाई हूं। बस भागती जा रही हूं.. ना तो ये पता है कि रास्ता सही भी है और ना ये पता है कि रास्ता अब और  कितना बचा है। ये भी नहीं पता कि खुद के लिए भाग रही हूं या जिंदगी मुझे भगा रही है। जब स्कूल में थे तो दिल करता था कि जल्दी से जल्दी बड़े हो जाए। अपने फैसले खुद ले पाएं लेकिन जब से बड़े हुए है जिंदगी सिर्फ भगाए जा रही है।

दरअसल, जिंदगी और इस जिद्दी दिल की ठनी हुई है, जिंदगी मुझे अपने हिसाब से चलाना चाहती है और दिल अपने हिसाब से।
सच में वो बचपन वाली जिंदगी बहुत हसीन हुआ करती थी। जो दिल करता था वो किया करते थे। जब भी कोई दिक्कत परेशानी हुआ करती थी तो मां हुआ करती थी पास, बस एक बार प्यार से सिर पर हाथ रख देती थी तो लगता था कि पूरी दुनिया बस हमारे ही इर्द गिर्द घूम रही है।
और कभी प्यार से गोदी में उठाकर माथा चूम लेती थी तो ये दिल सातवें आसमान पर होता था।
उस समय समझ नहीं थी फिर भी सुकून था। आज इस समझदारी ने सारा चैन छीन लिया है।
बड़े हो गए, शादी हो गई, सेटल हो गए लेकिन ये दिल आज भी उन पुराने दिनों में लौटना चाहता है, जहां मां और उसका ढेर सारा प्यार बिना मांगे मिलता था।

काफी समय बीत गया उस घर से विदा हुए,
काफी समय बीत गया नई दुनिया बसाए हुए
पर ना जाने क्यों शाम ढलते ही ये दिल उस घर पहुंच जाता है
मां की आवाज़ सुनने को ये दिल यूंही मचल जाता है
महक वो मां के खाने की महसूस करना चाहता है
वो हर त्यौहार उनका बहुत चाव से मनाना,
वो हर रोज सुबह जल्दी उठ जाना,
हम सब को खिलाकर फिर खुद खाना,
शाम को पापा के ऑफिस से आने का इंतजार करना,
हर जन्मदिन पर हमें नए कपड़े दिलाना,
और खुद कई त्यौहार उसी पुरानी लाल साड़ी में बिताना,
हमारे बीमार पड़ने पर उनका वो रात भर जागना,
हर बार पापा की डांट से हमें बचा लेना,
हमारी तकलीफ में खुद आंसू बहाना,
बहुत याद आता है वो घर जहां सिर्फ और सिर्फ अपनापन की ही बहार थी।

बहुत मुश्किल से दिल को समझाती हूं कि वो दिन बीत गए, अब उन दिनों को तुम सपने में जी लिया करो।

उन दिनों को याद कर मैं कुछ इस तरह जी पाती हूं,
आज भी मां से किए वो सारे वादे निभाती हूं,
सबको खुश रखने कि कोशिश में मैं खुद को भूल जाती हूं।
मैं भी अब मां की तरह सब को खिलाकर फिर खुद खाती हूं,
चाहे कितना ही लेट सोना हो फिर भी प्रात: काल उठ जाती हूं,
अपने अरमानों को अब में दिल के किसी कोने में दफनाती हूं,
कभी कभी मां की ही तरह मैं हालात से समझौते भी कर जाती हूं।

जानती हूं कि वो दिन अब लौट कर नहीं आयेंगे,
इसलिए मैं इस अड़ियल दिल को कई बार समझाती हूं,
जानती हूं कि वो सिर्फ मां नहीं भगवान है मेरी,
इसलिए अब भी तकलीफ होने पर सिर्फ उनको ही बताती हूं।।

 

Why the demand for this new process increased to prevent unwanted pregnancy

मां बनना किसी भी महिला के लिए सुखद एहसास से कम नहीं होता है पर अगर आप प्रेग्नेंसी नहीं चाहती तो फिर आपकी परेशानियां काफी बढ़ जाती हैं। प्रेग्नेंसी ना चाहने वाली महिलाओं के लिए बाजार में कई तरह की गर्भ निरोधक मेडिसिन उपलब्ध हैं। इन सारी मेडिसिन का सेवन महिलाओं को इंटरकोर्स के बाद करना होता है लेकिन सोचिए कि कोई ऐसी बर्थ कंट्रोल मेडिसिन हो जिससे सेक्स से पहले खाया जाए और जिससे आने वाले 03 से 05 दिनों में प्रेग्नेंसी को रोका जा सके। एक नए अध्ययन के मुताबिक आने वाले दिनों में यह संभावना हकीकत का अमलीजामा पहन सकती है।

इमरजेंसी के लिए गर्भ निरोधक दवाइयों में अभी यूलिप्रिस्टल एसीटेट ट्रस्टेड सोर्स (UA) लेवोनोजेस्ट्रेल और साइक्लो-ऑक्सीगैनीज- 2 (COX- 2) का इस्तेमाल होता है, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए हालिया क्लीनिकल ट्रायल के दौरान यूए और मेलॉक्सिकैम से बनी नई गर्भनिरोधक मेडिसिन को सुरक्षित और कारगर पाया गया है। ये स्टडी ‘बीएमजे सेक्सुअल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित हुई है।

पारंपरिक गर्भनिरोधक मेडिसिन की बात करें तो इसका सेवन डेली करना पड़ता है जबकि इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स का सेवन सेक्स के बाद किया जाता है। अभी तक प्रेग्नेंसी रोकने की ऐसी कोई दवाई नहीं है जिसे सेक्स के दौरान खाया जाए। इस एक्सपेरिमेंटल गर्भनिरोधक में शामिल यूलीप्रिस्टल एसीटेट और मेलोक्सीकैम उस समय ओव्यूलेशन को रोकता है जब गर्भधारण की संभावना सबसे ज्यादा होती है।

इस अध्ययन की ऑथर और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रसूति-स्त्री रोग एक्सपर्ट डॉ. एरिका काहिल ने कहा कि ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी कॉन्ट्रासेप्टिव जरूरतें पूरी नहीं हो पाती। कई महिलाएं चाहती हैं कि वो जब सेक्सुअली एक्टिव हों तभी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल करना पड़े। उन्हें डेली गर्भनिरोधक मेडिसिन ना लेनी पड़े।

महिलाओं पर की कई स्टडी को लेकर डॉ. कहिला ने कहा कि ऑन-डिमांड कॉन्ट्रासेप्शन की सख्त जरूरत है। लोग पहले से ही पेरिकोइटल कॉन्ट्रासेप्शन जैसी इमरजेंसी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, बहुत से लोग ऐसे उपायों में भी रुचि ले रहे हैं जिसमें उन्हें इंजेक्शन और इंप्लांट प्लेसमेंट के लिए क्लिनिक बार-बार ना जाना पड़े। अध्ययन के मुताबिक ऑन-डिमांड कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स प्रेग्नेंसी को रोकने में काफा उपयोगी साबित हो सकती है लेकिन इसके लिए और भी शोध किए जाने की आवश्यकता है।

Ranveer was stunned at Deepika's bedroom reply, revealed many secrets of Ranveer

हम सभी जानते हैं कि बॉलीवुड का सबसे प्यारा कपल रणवीर सिंह और Deepika Padukone शादी कर अपना घर बसा चुके हैं लेकिन क्या दीपिका और रणवीर एक खास सीक्रेट जानते हैं जिसे खुद दीपिका पादुकोण ने शेयर किया था।

मालूम हो दोनों की शादी इटली में हुई थी। शादी की चर्चाएं साल 2018 की सबसे बड़ी न्यूज में से एक था। शादी के बाद रणवीर की भी लाइफ सेट हो चुकी थी। क्योंकि वो अब एक पति जो बन गए हैं। दीपिका और रणवीर शादी के बाद एक दूसरे को लेकर खुलकर बातें करते दिखाई देते हैं। दीपिका ने वाइफ के तौर पर कैसी हैं ये सारी चीज शेयर की हैं। दीपिका ने इसके साथ वो बातें भी साझा की हैं जो अक्सर लोग साझा करने में हिचकिचाते हैं।

असल में यह बेहद लोकप्रिय कपल एक कार्यक्रम में पहुंचा था। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि जहां ये दोनों जाएं और इन पर सवालों की बौछार ना हो। क्योंकि हर कोई जानता है कि शादी के बाद दोनों की लाइफ कितनी बदली है। अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने रणवीर सिंह के बेडरूम के कई ऐसे राज खोले हैं जिन्हें जानने के बाद आपकी रणवीर के प्रति राय बदल जाएगी।

इवेंट में एक सवाल का जवाब देते हुए दीपिका ने वो कह दिया जिसे सुन स्वयं रणवीर सिंह हैरान रह गए थे। दीपिका से जब रणवीर के स्टाइल और समार्टनेस के सीक्रेट के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि रणवीर काफी देर तक शॉवर लेते हैं और टॉयलेट में भी लंबा समय बिताते हैं। फिर दीपिका ने कहा कि वो बेड पर भी काफी समय देते हैं। अब जब लोगों ने दीपिका के मुंह से यह लाइन सुनी तो दंग रह गए। हर किसी को लग रहा था कि अरे दीपिका ने यह क्या कह दिया।

 

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ऐसे में खुद रणवीर दीपिका की ओर अचंभित होकर देखने लगे। फिर दीपिका ने अपनी बातों पर लगाम लगाते हुए कहा कि मेरा कहने का मतलब है कि रणवीर बिस्तर पर सोने के लिए जाने पर भी काफी समय लगाते हैं। अब जो भी हो लोगों को इनकी यह बात बाखूबी मालूम गई है। पिछले दिनों रणवीर ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि उनके दिन की शुरुआत उनकी पहली चाय से होती है। वर्क फ्रंट की बात करें तो दीपिका पादुकोण फिल्म गहराइयां, फाइटर और पठान में नजर आएंगी। दूसरी तरफ रणवीर सिंह फिल्म जयेशभाई जोरदार और सर्कस में दिखाई देंगे।

Even today in this male dominated society woman is the only object of consumption..!

हाज़िर हूं जिंदगी से जुड़ी कुछ बेहतरीन बातों औ सच्चाई के साथ। जी हां, कुछ ऐसा जो कड़वा है लेकिन सच है। हो सकता है आप सभी मेरी बात से सहमत ना हो लेकिन आज जो मैं आपके लिए लाई हूं वो एक वर्ग की रोज़ की कहानी है जहां आज भी पुरुष प्रधान समाज का ही राज है। आज भी उस समाज में औरतों को सिर्फ घर संभालने वाली समझा जाता है। आज भी उस समाज में औरतें अपने अस्तित्व ढूंढते हुए अपनी उम्र गुजार देती है। आज भी उस समाज में औरतों को सिर्फ उपभोग की वस्तु समझा जाता है।

कड़वा है लेकिन सच है:

‘दम घुट रहा है, शायद औरत होने की सजा है’

आप लोगों ने तो सिर्फ सुना है एक औरत तो रोज इन परिस्थतियों से रोज़ दो चार होती है, कभी सोचा है उसे कैसा लगता होगा। बचपन से सिखाना शुरू कर दिया जाता है कि अच्छी लड़की वहीं होती है जो सब का अच्छा सोचकर चले। अपने से पहले अपनों का सोचे। लेकिन कभी किसी ने उसके बारे में सोचा? पहले मां-बाप के घर उनके अनुसार रहे, जैसा वो बोले वैसा किया, फिर शादी के बाद तो ये नौबत आ जाती है कि अगर अपने पैरेंट्स से मिलना है तो पहले घर में सबसे आज्ञा लो फिर जाओ।

आज लड़कियां किसी काम में पीछे नहीं है, वो घर और ऑफिस दोनों आराम से चला रही है लेकीन कोई इस पुरुष प्रधान समाज से पूछे कि क्या किसी पुरुष ने ऑफिस से आकर एक ग्लास पानी भी खुद से लिया है। तो जब आज भी लड़कियों के लिए ये समाज पहले जैसा ही है तो ये बराबर के हक़ देने का डोंग क्यों? इससे अच्छा ये है कि आप एक औरत की खूबियों में से उसकी कमियां निकालना बन्द करें और अपनी कमियों पर ध्यान दें।

वैसे, अपनी कमियां खुद निकालना बहुत मुश्किल काम है, इसलिए अगर आपसे ये ना हो तो फिर छोड़ दीजिए औरतों को उनके हाल पर, क्योंकि वो अपने लिए कल भी सक्षम थी, आज भी है, और कल भी होगी।

बस गलती उसकी ये है कि वो आप लोगो की तरह जता नहीं पाई, की आप उसके बिना अधूरे हो और आप लोग तो साहब है, खुद से कभी ये बात समझ नहीं पाओगे। औरतों के लिए कुछ बदल तो नहीं पाया अब तक लेकिन वो अपने आप को बदल सकती है, तो मेरी कोशिश है उन्हें थोड़ा समझाने की…ज़रा गौर फरमइएगा:-

हां, मान लिया अब तुम अपनी जगह बनाना जानती हो,
हां, मान लिया की कढ़ाई में कलछी चलाने के साथ अब तुम लैपटॉप चलना भी जानती हो,
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।।
दो मीठे बोल बोले जाए तुम्हें, तो तुम फूल सी खिल उठती हो,
जो भी दिया जाए तुम्हें, तुम हमेशा उसका डबल ही देती हो,
सब कर लोगी तुम, बात फिर भले ही चार काम एक साथ करने की हो,
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।।
बीमार हो जाए अगर घर में कोई अपना, तो तुम उसका पूरा ख्याल रखती हो,
फिर होती हो अगर कभी खुद बीमार, तो किसी के स्नेह भरे हाथ को अपने माथे पर ढूंढती हो,
एक जोड़ी पायल गिफ्ट में पा लेने पर, तुम दिन भर ठुमकती हो,
इस दिखावटी प्यार के जाल में, तुम हर बार फंसती हो,
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।।
किसी का वंश आगे बढ़ाने की तुम सिर्फ एक कड़ी हो,
वारिस दोगी उन्हे तुम, इसलिए उस घर से जुड़ी हो,
इतने सारे काम के बदले सिर्फ दो रोटी ही तो खाती हो,
उसपर भी कोई कहे की ” सारा दिन क्या किया” तो तुम बिना कुछ कहे सब सुन लेती हो,
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।।
सुबह उठ कर पांच बजे तुम रात ग्यारह बजे तक लगी रहती हो,
अपने परिवार के आस पास अपनी पूरी दुनिया बसा लेती हो,
तुम्हारी भी एक ज़िन्दगी है, हर बार ना जाने तुम ये कैसे भूल जाती हो,
सबकी खुशी की खातिर तुम अपना सर्वस्व दांव पर लगा देती हो
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।
अपने अंदर भावनाओं को ज़िंदा रखने के लिए तुम रोज खुद को झूठी तसल्ली भी देती हो,
उन सड़े गले रिश्तों के बिना तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं तुम ये मान कर बैठी हो,
उड़ सकती हो खुले आसमान में, तो क्यों तुम खुली हवाओं से कतराती हो,
एक दिन वो दिया खुद के लिए भी रोशन करो, जो रोज तुम दूसरों के अंधेरे मिटाने के लिए जलाती हो।।
लेकिन पगली तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।
लगाकर मेंहदी हाथों में उसपर तुम लाल चूड़ा सजाती हो,
किसी की लंबी उम्र के लिए तुम करवाचौथ भी रखती हो,
बड़ी बिंदी पसंद ना हो उसे, तो उसके लिए तुम छोटी लगाती हो,
लेकिन मौका मिले तो उससे भी पूछ लो कभी कि उसकी ज़िन्दगी में तुम क्या अहमियत रखती हो।।
मानो मेरी बात कुछ अपने लिए भी करो खास,
क्योंकि तुम भूल गई हो शायद कि,
सब करने के बाद भी तुम, इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी सिर्फ एक उपभोग की वस्तु हो।।

फोटो सौजन्य- गूगल

...but even after lakhs of efforts, we could not get anyone's 'Ji-huzoori'.

दोस्तों, आज मैं आपकी होस्ट और दोस्त आपके लिए लेकर आई हूं जिंदगी से जुड़ी अनछुए पहलू जो उन पलों से जुड़ा हुआ जब हम अचानक बड़े हो जाते है और महसूस करते है कि जो दिखता है अक्सर उसके उल्ट होता है। वो बचपन में परिवार, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से सीखी हुई रिश्तों की A, B, C.. अचानक से हम भूलने लगते है। ऐसा लगता है मानो जो जिंदगी हमने पहले जी है वो अब वाली जिंदगी से तो मेल ही नहीं खाती। तो क्या जो पहले सीखा वो सब बेबुनियाद था? क्यों उस वक्त किसी ने ये नहीं सिखाया कि आगे की जिंदगी सिर्फ और सिर्फ समझौते से भरी होगी।

कभी-कभी हम ज़िन्दगी के उस मोड़ पर होते है, जहां ठहरना कुछ ज़रूरी सा हो जाता है और उस वक्त हमारे पास यह मौका होता है जब हम अपनी आंखों पर बंधी पट्टियां उतार सकते है, अपने आपको झूठी तसल्लीयों की जो घुट्टी पिलाई होती है, उनको बाहर निकाल कर सकते है, दूसरों की अच्छाइयों की जो परतें खुद पर चढ़ाई हैं उन्हें धो सकते है।

दरअसल, आजकल हर चीज़ में मिलावट हो गई है, यहां तक कि लोगो ने रिश्तों को भी नहीं छोड़ा। अब ये बात हम सब को पता है लेकिन हम इसे हज़म नहीं कर पाते, हां भई, करें भी तो कैसे? रिश्ते तो सबको चाहिए अब कोई अकेले कैसे जी सकता है। बस, यही से शुरू होता वो दौर खुद को झूठी तसल्ली देने का, अगर किसी ने दिल दुखाया तो हम सेकंड नहीं लगाते खुद को ये बात समझाने में कि…उसने जान बूझ कर नहीं किया।

कोई धोखा दे …तो उसकी कोई मजबूरी रही होगी।
कोई फायदा उठाए… तो कोई नहीं अगली बार नहीं करेगा।
कोई बर्बाद करने पर भी उतारू हो.. तो कोई नहीं, भगवान देख रहा है।
फिर जब कभी इन सब से थक कर, किसी अंधेरी रात में किसी कोने में खुद को अकेला पाते है तब समझ आता है इन गलतफहमियों के साथ से तो अकेला रहना ज्यादा अच्छा है। तब समझ आता है जब मन ऊपर तक भर जाए और बहुत अकेला महसूस हो, तो खुद को दी गई झुठी तसल्ली भी कोई राहत नहीं पहुंचा सकती…उस रात को जो समझ आता है, उस पर ज़रा ग़ौर फरमाए:-

ज़िन्दगी तेरे रंगों से रंगदारी ना हो पायी,
लम्हा-लम्हा कोशिश की हमने, मगर यारी ना हो पायी,
गुनाह तो किए बहुत दूसरों को आबाद करने के,
मगर अफसोस कि किसी भी गुनाह से गिरफ्तारी ना हो पायी,
खुशियां हमने भी बेशुमार लुटाई सब पर,
पर गलती से भी वो खुशियां हमारी ना हो पायी,
लम्हा लम्हा कोशिश की हमने, मगर यारी ना हो पायी।।

इम्तहान बहुत दिए हमने, मगर कभी वो कामयाबी हासिल ना हो पायी,
ज़िन्दगी के इन मुश्किल इम्तहानों की हमसे कभी तैयारी ना हो पायी,
मौके बहुत दिए कुछ शातिर दिमाग़ लोगों ने, हमें पास कराने के,
लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी हमसे किसी की ‘जी- हुजूरी’ ना हो पायी,
लम्हा लम्हा कोशिश की हमने, मगर यारी ना हो पायी।।
अपने उसूलों पर जिए हम, इसलिए किसी से गद्दारी ना हो पायी,
लोगों की तरह ‘बाहर से कुछ अंदर से कुछ’ जैसी अदाकारी ना हो पायी,
जानते हैं जनाब, बहुत मुफलिसी में गुजारे है दिन हमने,
मगर फिर भी गुलाबी नोटों के लिए हमसे, किसी की गुलामी ना हो पायी,
लम्हा लम्हा कोशिश की हमनें मगर यारी ना हो पायी।

एक बार टूट जाने के बाद वो सुनहरे सपनों की कड़ी हमसे ना जुड़ पायी,
ओस की तरह गिर तो गए किसी के लिए, मगर फिर भी ये ज़िन्दगी चमकता मोती ना हो पायी,
हां, कभी सूखे पत्तों की तरह ठंड मिटाने को किसी की, जला तो दिया खुद को,
लेकिन चाह कर भी किसी के दिए की बाती ना बन पायी,
लम्हा लम्हा कोशिश की हमने मगर यारी ना हो पायी।।
दूसरों को मुस्कुराने की वजह देते देते, ये ज़िन्दगी कभी अपनी गिरेबान में ना झांक पायी,
उस चांद को पाने की चाह में ये आंखें ठीक से कभी सो ना पायी,
सोचा था कभी कि एक दिन अपने लिए भी सब सहेज लूंगी,
लेकिन आज ज़रा ठहरी हूं कुछ पल के लिए तो समझ आया कि अपने लिए तो मैं कभी कुछ कर ही नहीं पायी,
लम्हा लम्हा कोशिश की हमने मगर यारी ना हो पायी।।

What is the opinion of people on sex before and after marriage in India, here came a shocking survey

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की नई रिपोर्ट आज कल बहुत सुर्खियों में है। इस सर्वे में भारतीयों से शादी, सेक्स और सेक्सुअल पार्टनर से जुड़े कई सवाल पूछे गए। रिपोर्ट में शादी की उम्र और पहली बार सेक्स करने की उम्र पूरी तरह अलग पाई गई। सर्वे में यह भी जानने का प्रयास किया गया कि क्या भारतीय लोग शादी से पहले सेक्स नहीं करते हैं? आंकड़ों से मालूम चलता है कि वो शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाते हैं लेकिन सभी समुदायों में इसका एक अलग पैटर्न है।

शादी से पहले कितने भारतीय करते हैं सेक्स- शादी से पहले सेक्स करने का पुरुषों का अनुपात महिलाओें के विपरीत है, जबकि वो किसी भी समुदाय के हों। सर्वे में औसतन 7.4 फीसदी पुरुषों ने और 1.5 फीसदी महिलाओं ने माना कि उन्होंने शादी से पहले शारीरिक संबंध कायम किए।

What is the opinion of people on sex before and after marriage in India, here came a shocking survey

सर्वे में लगभग 12 फीसदी सिख पुरुषों ने कहा कि उन्होंने शादी से पहले यौन संबंध बनाएं। सभी धार्मिक समुदायों में ये आंकड़ा सबसे ज्यादा है। वहीं, सिख महिलाओं में ये आंकड़ा सिर्फ 0.5 फीसदी का था, जो सबसे कम था। हिंदू पुरुषों में यह आंकड़ा 7.9 फीसदी, मुस्लिम पुरुषों में 5.4 फीसदी, ईसाई पुरुषों में 5.9 फीसदी था। महिलाओं की बात करें तो हिंदुओं में 1.5, मुस्लिमों में 1.4 फीसदी और ईसाई महिलाओं में 1.5 फीसदी ने माना कि उन्होंने शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाएं।

आर्थिक हालात को भी इस चीज से जोड़ कर देखा गया जैसे कि अमीर पुरुषों और गरीब महीलाओं में शादी से पहले सेक्स करने की सबसे ज्यादा संभावना पाई गई। शादी के बाहर किसी दूसरे शख्स के साथ शारीरिक संबंध बनाने के कारण महिला और पुरुष दोनों का एक ही व्यावहार देखने को मिला। हालांकि, महिलाएं इसे खुले तौर पर बहुत कम एक्सेप्ट करती हैं। अभी महिलाओं के औसतन सेक्सुअल पार्टनर 1.7 फीसदी हैं जबकि पुरुषों के 2.1 हैं। वर्ष 2006 में हुए NFHS के तीसरे सर्वे की बात करें तो महिलाओं में ये 1.02 और पुरुषों में 1.49 फीसदी था।

पत्नी को सेक्स से इनकार करने का राइट है क्या- शादीशुदा जीवन के अंदर सेक्स पूरी तरह पुरुष प्रधान समाज से जुड़ा हुआ है। सर्वे में 87 फीसदी महिलाओं और 83 फीसदी पुरुषों ने कहा कि पत्नियों का सेक्स से इनकार करना उचित है। हालांकि, सभी स्टेट के बीच यह प्रतिशत अलग अलग है। मेघालय अपने मातृसत्तात्मक समाज के लिए प्रसिद्ध है फिर भी यहां सिर्फ 50 फीसदी पुरुषों ने कहा कि पत्नियां सेक्स से इनकार कर सकती हैं। कई राज्यों में महिलाओं की राय भी यह है। मिसाल के तौर पर, अरुणाचल प्रदेश में लगभग 30 फीसदी महिलाओं ने कहा- जब पति सेक्स करना चाहे तो महिला का मना करना उचित नहीं है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Remember, whatever person comes in your life, he leaves only after learning something.

आपने बहुत बार सुना होगा कि
Fate choose your relations,
You choose your friends..

ये लाइनें हम सब की ज़िन्दगी में बहुत सटीक बैठती है।। रोज रोज की इस भागमभाग में हम बहुत से लोगो से मिलते हैं और ये स्वभाविक है कि वो सब अलग अलग व्यक्तित्व के होते है। लेकिन उनमें से कई हमें इतना प्रभावित करते है जिसकी हमने पहले कभी कल्पना भी नहीं की होती।

शायद आपको इस टॉपिक में कोई खास इंटरेस्ट ना आए लेकिन फिर भी मैं बोलना चाहूंगी-

हाल ही में एक ऐसी शख्सियत से सामना हुआ, जिनका Helpful Nature मुझे ये सिखाने में कामयाब रहा कि हर इनसान एक जैसा नहीं होता। अगर आप किसी नए इनसान से मिलते हो तो किसी और के बर्ताव के कारण उसे कड़वा मत बोलो। क्योंकि ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि किसी पुराने शख्स के बर्ताव से जो आपको परेशानी हुई है ,उसी तरह का बर्ताव आपको इस नए इनसान से भी मिले।

याद रखिए आपकी ज़िंदगी में जो भी इनसान आता है, आपको कुछ ना कुछ सीख देकर जाता है लेकिन वो आप पर निर्भर है कि आप उसे सकारात्मक लेते है या नकारात्मक। तो अगली बार आप किसी से मिले तो पहले उसको Observe करे, हो सकता है वो आपको जीवन जीने के तरीके और दूसरे के प्रति आपके नज़रिए को पूरी तरह बदल दे।

और हां, आप अपने आप को भी इन लोगो में शामिल कर सकते हैं, लेकिन उससे पहले कुछ बातों पर ग़ौर करना होगा:-

1. मुस्कुराए: हर इनसान की जिंदगी में परेशानियां आती ही है, और हम सब ये भी जानते है की हर टाइम एक सा नहीं रहेगा । बुरा वक्त भी बीत जाता है , इसलिए हमेशा किसी से भी मिले तो मुस्कुरा के मिले। इससे सामने वाला थोड़ा सहज महसूस करेगा।

2. अच्छा सोचें: अच्छा सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए। दरअसल, हमारी सोच पर निर्भर है कि हम अपनी जिंदगी में कितनी सफलता हासिल करेंगे और कितने अच्छे नागरिक बनेंगे। वो आपने सुना होगा ना, “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत” जी हां, ठीक ऐसा ही है आप अच्छा सोचेंगे , सकारात्मक सोचेंगे तो आपके साथ भी सब अच्छा ही होगा।

3. प्रशंसा करना सीखे: अगर किसी ने आपके लिए कुछ किया या कुछ ऐसा किया जो आपको अच्छा लगा तो बेझिझक उसकी प्रशंसा कीजिए। इससे उसको भी आत्मबल मिलेगा।

4. विन्रम रहें: आज कल लोग बहुत जल्दी अपना धैर्य खो बैठते हैं। उन्हें किसी भी बात को लेकर बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। लेकिन कई बार इसकी वजह से वो अपना ही नुकसान करवा बैठते है। इसलिए कोशिश करें कि विन्रम रहें।

5. अपना 100 प्रतिशत दें: हमेशा अपना 100 प्रतिशत देनी की कोशिश करें फिर चाहे वो रिश्ता हो, पढ़ाई हो, नौकरी हो या फिर जिंदगी। क्योंकि जब आप अपना 100 प्रतिशत देते है तो जो सुकून आपको हासिल होता है उससे बड़ा कुछ नहीं है दुनिया में।