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Why is Eid-ul-Azha celebrated and what is its importance?

Eid Ul Adha: इस बार 28 मई को ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार पूरे देश और दुनिया में मुस्लिम मना रहे हैं। बकरीद इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार है जिसमें अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास और आत्मत्याग के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। बकरीद के दिन सुबह मुस्लिम समुदाय के लोग नए कपड़े पहनकर मस्जिद या ईदगाह में विशेष नमाज़ अदा करते हैं। इसके बाद एक-दूसरे के गले मिलकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है। नमाज़ के बाद जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे बकरे की कुर्बानी देते हैं और इसके गोश्त को गरीबों और रिश्तोदारों में बांटते हैं। सिर्फ तीसरा हिस्सा खुद के लिए रखते हैं। इस तरह समाज का हर तबका त्योहार की खुशियों और दावतों में शामिल होता है। आपको जानकर हैरानी होगी बकरीद की शुरुआत इस्लाम के आने के बहुत पहले से ही अरब जगत में मनाया जाता था। आइए इसके पूरे इतिहास और इससे जुड़ी कहानियों के बारे में जानते हैं।

ऐसे हुई बकरीद की शुरुआत

बकरीद या ईद-उल-अजहा की शुरुआत पैगंबर हजरत इब्राहिम (अ.स) के दौर में आज से करीब 4,000 वर्ष पहले हुई थी। यह त्योहार मुख्य रूप से अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, अटूट विश्वास और त्याग का ऐतिहासिक प्रतीक है। इस त्योहार के पीछे हजरत इब्राहिम के जीवन से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी। इब्राहिम को अपनी ढलती उम्र में मिले इकलौते बेटे, हजरत इस्माइल सबसे ज्यादा प्रिय थे। लेकिन अल्लाह का हुक्म मानकर हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। जब उन्होंने बेटे को इसके बारे में बताया, तो बेटे इस्माइल ने भी अल्लाह की राह में समर्पित होने की रज़ामंदी दे दी  इब्राहिम अपने बेटे को लेकर मक्का के पास मीना के मैदान की ओर बढ़े। रास्ते में शैतान ने उन्हें इस परीक्षा से डिगाने और भटकाने का प्रयास किया पर उन्होंने उसे कंकड़ मारकर दूर भगा दिया। इसी याद में हज के दौरान आज भी शैतान को कंकड़ मारे जाते हैं। हलांकि, यह अलग कहानी है। बहरहाल, मीना पहुंचकर जब इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधी और बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनके इस सर्वोच्च समर्पण और नीयत को स्वीकार कर लिया और ठीक उसी वक्त अल्लाह ने अपने फरिश्ते जिब्राइल के जरिए जन्नत से एक दुम्बा (भेड़) वहां भेज दिया गया और इस्माइल की जगह उस दुम्बे की कुर्बानी हो गई। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में हर वर्ष इस्लामी महीने जुल-हिज्जा की 10 तारीख को दुनिया भर के मुस्लिम सक्षम लोग पशु (बकरा, भेड़, या ऊंट) की कुर्बानी देते हैं। इस पर्व का मूल उद्देश्य सिर्फ खून बहाना नहीं, बल्कि इंसान के भीतर मौजूद अहंकार, स्वार्थ और बुराई को अल्लाह की राह में कुर्बान करना है। इसके गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटकर गरीबों, रिश्तेदारों और खुद के लिए रखने का सामाजिक नियम है।

सबसे पहले बकरीद की शुरुआत कैसे हुई

ईद-उल-अजहा का इतिहास करीब 4,000 साल पुराना माना जाता है। इस घटना का जिक्र सबसे पहले हिब्रु बाइबिल में लिखा गया है। इसमें हजरत इब्राहिम को अब्राह्म के नाम से जाना जाता है जबकि अब्राह्म के बेटे को इसहाक नाम से जाना जाता है। वहीं, फरिश्ता को एंजिल कहकर पुकारा जाता है। ऐतिहासिक और सामाजिक मान्यताओं के मुताबिक यह घटना मक्का की है लेकिन एक सालाना इस्लामी त्योहार के रूप में ईद-उल-अज़हा को आधिकारिक तौर पर सबसे पहले मदीना में मनाया गया था। दरअसल, 622 ईस्वी में जब पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना हिजरत की, तब उन्होंने देखा कि मदीना के लोग पहले से चले आ रहे कुछ पारंपरिक फारसी त्योहार जैसे नौरोज़ और मेहरजान को मनाते थे। पैगंबर साहब ने उन त्योहारों की जगह इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित सिर्फ दो पवित्र दिन तय किए: ईद-उल-फितर यानी मीठी ईद और ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद। इस तरह मदीना वह पहला स्थान बना जहां व्यवस्थित रूप से इस त्योहार की और सामूहिक नमाज़ की शुरुआत हुई।

Eid Ul Adha का सांस्कृतिक महत्व

बकरीद का पर्व अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए मनाया जाता है। इसका मूल संदेश सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना नहीं है बल्कि इंसान के भीतर छिपे स्वार्थ, लालच और अहंकार की कुर्बानी देना है. इससे समानता और सामाजिक सद्भाव की भावना भी प्रकट होती है। इसमें कुर्बानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों व दोस्तों के लिए और तीसरा हिस्सा गरीबों व जरूरतमंदों के लिए है। यह व्यवस्था समाज में आर्थिक असमानता को भुलाकर हर तबके को खुशी में शामिल करने का संदेश देती है।

बकरीद के दिन की शुरुआत 

Bakreed

बकरीद के दिन मुसलमान सुबह में जल्दी उठ जाते हैं। सबसे पहले फज्र की नमाज अता करते हैं। इसके बाद घर की साफ-सफाई और स्नान किया जाता है, फिर नए या सबसे साफ कपड़े पहने जाते हैं।

इस दिन आमतौर पर सुबह 8 से 10 बजे के बीच ईद-उल-अजहा की दो रकात विशेष नमाज़ और खुतबा (धार्मिक उपदेश) होता है. नमाज़ खत्म होते ही लोग आपस में गले मिलकर एक-दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं। दुश्मनी भूलकर गले मिलने का यह सबसे भावुक पल होता है। मीठी ईद के उलट बकरीद की सुबह नमाज़ बिना कुछ खाए पढ़ी जाती है। नमाज़ के बाद ही लोग पहला निवाला लेते हैं। ईदगाह से लौटने के बाद ही कुर्बानी का सिलसिला शुरू होता है। नमाज़ से पहले दी गई कुर्बानी मान्य नहीं होती। धार्मिक नियमों के तहत बकरे, भेड़ या अन्य स्वीकृत पशु की कुर्बानी दी जाती है। फिर रसोई में गोश्त पकाया जाता है फिर पारंपरिक पकवानों के साथ एक साथ बैठकर परिवार के सदस्य भोजन करते हैं। शाम के वक्त बड़े-बुजुर्ग बच्चों को प्यार से ईदी देते हैं। नए कपड़े पहने बच्चे घर-घर जाकर अपनी ईदी जमा करते हैं। शाम के समय लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और हिंदू-मुस्लिम भाइयों के घर ईद मिलने जाते हैं। घरों में मेहमानों को  शीर-खुरमा और मटन के पकवान परोसे जाते हैं। इस दिन का समापन इस संतोष के साथ होता है कि समाज का कोई भी गरीब परिवार आज के दिन भूखा नहीं सोय। आज के दिन लोग रात में शांति व बरकत की दुआ के साथ दिन का समापन करते हैं।

फोटो सौजन्य- गूगल

India's first National Astrology Mahakumbh was organized in Delhi

New Delhi: “ज्योतिष विद्या हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत में गहराई से जुड़ी हुई है, लेकिन आज की आधुनिक युग में आगे बढ़ने के लिए परंपरा और विज्ञान, दोनों को संतुलित रूप से अपनाने की ज़रूरत है,” ये विचार व्यक्त किए केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने। वे शनिवार को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित ‘एस्ट्रो-कल्चरल महोत्सव कॉन्क्लेव’ को संबोधित करते हुए अपना दृष्टिकोण सामने रख रहे थे।

India's first National Astrology Mahakumbh was organized in Delhi

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि जब इस प्राचीन विद्या का उपयोग सकारात्मक सोच को प्रेरित करने और सही मार्गदर्शन देने के लिए किया जाता है, तो यह समाज के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकती है। इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए, दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने 21वीं सदी में ज्योतिष की निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित किया, और इसे उस गहन आस्था का प्रतिबिंब बताया जो मानव जीवन को ब्रह्मांड से जोड़ती है। तीव्र संचार के इस युग में, विजेंद्र गुप्ता ने एस्ट्रो कल्चरल महोत्सव की तारीफ करते हुए कहा कि पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने वाले मंच सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देने और सामुदायिक ज़िम्मेदारी को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

India's first National Astrology Mahakumbh was organized in Delhi

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्वनी चौबे ने कहा की ज्योतिष शास्त्र हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति और वेदों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विद्या है, जिसने सदियों से मानव जीवन का मार्गदर्शन किया है। इसका उपयोग सकारात्मक सोच और समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए।

भव्य एवं ऐतिहासिक “राष्ट्रीय ज्योतिष महाकुंभ-एस्ट्रो कल्चरल  महोत्सव” में देश भर के जाने-माने ज्योतिषी एक मंच पर एकत्र हुए। इस अवसर पर लाइफ डिज़ाइनर एवं वास्तु केंद्र–ज्योतिष एंड रिसर्च सेंटर के संस्थापक कुणाल कुमार ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र जीवन की समस्याओं और संभावनाओं को समझने का एक वैज्ञानिक आधारित दृष्टिकोण प्रदान करता है, न कि सिर्फ भविष्य कहने वाला एक साधन।

रियल एस्टेट की दुनिया में एक अलग पहचान बना चुके राम रतन ग्रुप के चेयरमैन विजय राम रतन ने भी ज्योतिष कॉन्क्लेव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने इस कॉन्क्लेव में रियल एस्टेट में ज्योतिष के महत्व पर चर्चा की।

ज्वेलरी की वैज्ञानिक रूप से पहचान, परीक्षण और प्रमाण पत्र देने वाली संस्था Gem Lab के डायरेक्टर दविंदर सिंह को एस्ट्रो महाकुम्भ में सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि Gem Lab का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई रत्न क्यों, कैसे और कितना वास्तविक है — ताकि खरीदार धोखे से बच सके और उसकी कीमत सही मिले।

Help U Educational and Charitable Trust के संस्थापक और प्रबंध ट्रस्टी डॉ. हर्षवर्धन अग्रवाल ने एस्ट्रो कल्चरल महोत्सव पर सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि सारे अच्छे काम नीति निर्माण और बेहतर प्रशासन से ही संभव हो सकते हैं। कोटा स्थित ALLEN Career Institute के सह-संस्थापक और निदेशक ब्रजेश महेश्वरी भी इस मौके पर सम्मानित किये गए।

India's first National Astrology Mahakumbh was organized in Delhi

डी एच डिस्कवरी इलेक्ट्रॉनिक्स के डायरेक्टर तलविंदर सिंह लाली ने एस्ट्रो कल्चरल महोत्सव कॉन्क्लेव में विशेष सहयोग दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सनातन से जुड़े हर आयोजन को वे अपने स्पीकर्स के जरिए नई पहचान देंगे। उनका उद्देश्य है- हर आध्यात्मिक आवाज को दूर-दूर तक पहुंचाना और उसे सशक्त बनाना।

एस्ट्रोलोजर एआई के जरिये ज्योतिष का ज्ञान दे रहे एस्ट्रोज एआई के सीईओ प्रतीक पाण्डेय ने एस्ट्रो की दुनिया के कई रहस्यों से पर्दा उठाया। स्प्रिचुअल एडवाइजर और क्रिएटिव Entrepreneur/Strategist केवल कपूर को इस कार्यक्रम में विशेष रूप से सम्मानित किया गया।

महोत्सव को सेलेब्रिटी एस्ट्रोलॉजर डॉ वाई राखी, जी डी वशिष्ठ, अजय भाम्बी, कुनाल वास्तु केंद्र के संस्थापक कुनाल कुमार, फादर ऑफ़ एस्ट्रोलोजी के नाम से मशहूर विवेक त्रिपाठी, अनिल वत्स, डॉ. नीति शर्मा और सारथी त्रिशला चतुर्वेदी, एस्ट्रो अंकित, आचार्य शुभेश शर्मन, कॉर्पोरेट वास्तु एक्सपर्ट मनोज जैन, रीतू सिंह, आचार्य विक्रमादित्य, प्रोफेसर (डॉक्टर) ज्योतिषाचार्य सुजाता शर्मा, ज्योतिष रतन के डॉक्टर अरविन्द कुमार, ज्योतिषाचार्य सतेंदर प्रकाश, अंक ज्योतिष के जानकार राही रामेश यादव, वास्तु एक्सपर्ट पवन भाटिया, एस्ट्रोलॉजर डॉक्टर श्वेता शर्मा ने भी संबोधित किया। कथा वाचक वर्धा नारायण, अंक ज्योतिषी अनुराग पुरी, रिद्धि सिद्धि एडवरटाइजिंग एजेंसी के सीईओ विनय धींगरा एवं संदीप कुमार के आलावा म्यूजिक वैली के डायरेक्टर योगेश शर्मा, समाजसेवक राशिद इस्माईल, सुधाकर गैसोलिन से आशी जैन, मेघदूत ग्रामो उद्योग सेवा संस्थान के डायरेक्टर विवेक शुक्ला, संअनुभूति संस्था के प्रेसिडेंट संजय गौतम मौजूद रहे।

एस्ट्रो कल्चरल महोत्सव में नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रास बिहारी, वरिष्ठ पत्रकार अशोक किंकर, दधिबल यादव, राकेश थपलियाल, खरी कसौटी नेशनल न्यूज़ पेपर के प्रधान संपादक के सी विश्नोई व वरिष्ठ पत्रकार संजय पोद्दार, वरिष्ठ पत्रकार एवं टीवी एंकर डॉ श्रीवर्धन त्रिवेदी, अनुराग मुस्कान, विकास कौशिक, प्रवीण तिवारी, हिमांशी सिंह आदि मौजूद रहे।

आखिर में कार्यक्रम के आयोजक प्रदीप श्रीवास्तव एवं फजले गुफरान ने एस्ट्रो कल्चरल महोत्सव के सफल आयोजन पर सभी अतिथियों और सहयोगियों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि अगर सरकार और एस्ट्रोलॉजी से जुड़े लोगों का सहयोग और समर्थन मिलता रहा तो एस्ट्रो महाकुंभ देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित किया जाएगा।

Dhurandhar 2 becomes the first film to cross the Rs 1,000 crore mark at the domestic box office

Dhurandhar-2 रिलीज के बाद से ही हर दिन नए रिकॉर्ड बना रही है। ये फिल्म पहले भारत में सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म साबित हुई है। इसके बाद इस फिल्म ने 1,000 करोड़ रुपये की कमाई करने का रिकॉर्ड बनाया है। आइये जानते हैं इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कितने रुपये बटोरे हैं।

‘धुरंधर 2’ की अब तक की कमाई

Dhurandhar 2 becomes the first film to cross the Rs 1,000 crore mark at the domestic box office

दूसरे हफ्ते के आखिर में ‘धुरंधर 2’ की कमाई घट गई थी। तीसरे वीकेंड पर फिल्म की कमाई में दोबारा इजाफा हुआ। रविवार को फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 28.75 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया। पहले दिन इसने 102.55 करोड़ रुपये कमाए थे। एक वीक में फिल्म का कारोबार 674.17 करोड़ रुपये रहा था। दूसरे हफ्ते में इस फिल्म ने 263.65 करोड़ रुपये कमाए। इस तरह से 18 दिनों में इसने 1013.77 करोड़ रुपये का टोटल कलेक्शन किया है। घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 1,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करने वाली यह पहली फिल्म बन गई है।

‘धुरंधर 2’ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन

Dhurandhar 2 becomes the first film to cross the Rs 1,000 crore mark at the domestic box office

‘धुरंधर 2’ जहां भारत में बेहतरीन कलेक्शन कर रही है, वहीं दुनियाभर के बॉक्स ऑफिस पर भी छाई हुई है। 18 दिनों में फिल्म ने वर्ल्डवाइड 1,605.74 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया है। नॉर्थ अमेरिका में इस फिल्म ने 25 मिलियन डॉलर की कमाई की है। यहां यह फिल्म सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई है।

जाने किन फिल्मों से अब भी है पीछे

‘धुरंधर 2’ ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर जहां सभी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है, वहीं वर्ल्डवाइड कलेक्शन के मामले में यह फिल्म अब भी ‘पुष्पा 2’, ‘बाहुबली 2’ और ‘दंगल’ से पीछे है। ‘पुष्पा 2’ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन लगभग 1,742 करोड़ रुपये है। ‘बाहुबली 2’ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन लगभग 1,788 करोड़ रुपये है। इसी तरह ‘दंगल’ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन लगभग 2,070 करोड़ रुपये है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Eid-ul-Fitra is a symbol of mutual brotherhood, love and unity

Eid-Ul-Fitra: रमजान के 30 रोजे रखने के बाद अब ईद की खुशियों का खास पल आया है। सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी देशों में ईद-उल-फितर मनाई जा रही है, जबकि भारत में 21 मार्च को ईद-उल-फितर मनाई जाएगी। इस मौके को लेकर मुस्लिमों में हर्षोल्लास का माहौल है। हर कोई ईद की तैयारियों में जुटा हुआ है। रोजेदार पूरे महीने रोजा रखने के बाद इस खास दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं। 21 मार्च को ईद-उल-फितर के दिन लोग सुबह ईदगाह या मस्जिदों में जाकर नमाज अदा करते हैं और अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं।

Eid-ul-Fitra is a symbol of mutual brotherhood, love and unity

नमाज के बाद मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो जाता है। लोग अपने घर-परिवार, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ मिलकर इस त्योहार को खुशी-खुशी मनाते हैं। ईद-उल-फितर को ‘मीठी ईद’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन घरों में खीर, सेवइयां और कई तरह के मीठे पकवान बनाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे के गले मिलकर ईद की बधाई देते हैं। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक रमजान इस्लामी कैलेंडर का 9वां महीना है।

इसी महीने में कुरान शरीफ का नाजिल (अवतरण) हुआ था, जिसे लैलतुल कद्र की पवित्र रात से जोड़ा जाता है। इसी वजह से मुस्लिम समुदाय के लोग पूरे रमजान के महीने में अल्लाह की इबादत करते हैं और रोजे रखते हैं। ईद का यह मुबारक दिन आपसी भाईचारे, मोहब्बत और एकता का प्रतीक है। इस दिन लोग गिले-शिकवे भुलाकर अपने दोस्तों, परिवार और करीबियों को ईद की मुबारकबाद देते हैं।

फोटो सौजन्य- गूगल

Why did Arijit Singh say goodbye to playback singing at the peak of his career

जब से मशहूर प्लेबैक सिंगर Arijit Singh ने फिल्मों में गायकी से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया है, जिसके बाद ये खबर लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। इस ऐलान के बाद करोड़ों फैंस का दिल टूट गया है। संगीत और फिल्म जगत में तरह-तरह के अफवाह उड़ाए जा रहे हैं। हालांकि सोशल मीडिया के जरिए अरिजीत ने स्प्षट कर दिया कि वह संगीत नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि सिर्फ फिल्मों के लिए गाना बंद कर रहे हैं। पर इस फैसले के पीछे केवल थकान ही वजह नहीं मानी जारी है।

अरिजीत ने सलमान खान की फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ में भी गाना गाया है ‘मातृभूमि’, जिसे हाल ही रिलीज किया गया। वहीं, ‘बॉर्डर 2’ में ‘घर कब आओगे’ गाना गाया। जहां फैंस भावुक हो गए, वहीं हर कोई यह भी जानना चाहता है कि आखिर अरिजीत सिंह ने क्यों प्लेबैक सिंगिंग छोड़ने और इससे संन्यास लेने का फैसला किया? ऐसी क्या वजह रही कि उन्हें इतनी कम उम्र में ही सिंगिंग से संन्यास के बारे में सोचना पड़ा?

इस साल लाइन में कई बड़े प्रोजेक्ट्स हैं और यकीनन अरिजीत सिंह के पास भी कई प्रोजेक्ट और गाने होंगे, लेकिन सिंगर ने साफ-साफ कह दिया कि वह अब और कोई प्रोजेक्ट साइन नहीं करेंगे। उन्होंने अपना फैसला अपने X अकाउंट पर 27 जनवरी को सुनाया। बाद में इंस्टाग्राम पर एक स्टेटमेंट जारी किया। अरिजीत सिंह के फैसले से लोग काफी हैरान हैं और सिंगर से अपील कर रहे हैं कि वो प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास के अपने फैसले पर दोबारा सोचें। पर साथ ही जानना चाह रहे हैं कि वो चीज क्या है, जिसके कारण अरिजीत ने ऐसा फैसला लिया?

अरिजीत सिंह ने खुद बताया क्यों लिया संन्यास

अरिजीत सिंह ने इसका जवाब अपने ट्वीट में ही दे दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि न तो यह फैसला जल्दबाजी में लिया है और ना ही यह किसी एक घटना की वजह लिया गया है। उन्होंने लिखा, ‘इसका सिर्फ एक कारण नहीं है, इसके कई पहलू हैं, और मैं काफी समय से इस पर विचार कर रहा था। आखिरकार, मैंने हिम्मत जुटा ली।’

‘मेरी दिलचस्पी जल्दी खत्म हो जाती है, मैं थक गया हूं’

अरिजीत सिंह ने आगे लिखा, ‘इसका एक कारण बहुत ही सीधा और सिंपल है, और वो ये कि मेरी दिलचस्पी जल्दी ही खत्म हो जाती है, इसीलिए मैं अकसर अपने गानों की धुन बदलता रहता हूं और उन्हें लाइव प्रेजेंट करता हूं। तो, सच्चाई यह है कि मैं थक गया हूं। मुझे आगे बढ़ने के लिए अलग-अलग तरह के म्यूजिक को आजमाना होगा।’

अरिजीत नए आर्टिस्टों को मौका देना चाहते हैं

 

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अरिजीत सिंह ने यह भी लिखा कि वह आगे आने वाले समय में नए आर्टिस्टों के लिए जगह बनाना चाहते हैं, और प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास लेने का उनका एक कारण यह भी है। उन्होंने लिखा, ‘एक और कारण यह है कि मैं नए सिंगर्स को सुनने के लिए उत्सुक हूं जो मुझे वास्तव में इंस्पायर कर सकें।’

बताता चलूं कि बहुत कम लोगों को पता है कि अरिजीत सिंह की दिलचस्पी फिल्म निर्देशन में भी है।

अरिजीत ने आगे लिखा कि इतने सालों तक आपने मुझे जो प्यार और सम्मान दिया, उसका दिल से धन्यवाद। मुझे यह बताने में बहुत खुशी हो रही है कि मैं अब प्लेबैक सिंगर के तौर पर कोई नए असाइनमेंट्स नहीं लूंगा। मैं इस चैप्टर को यहीं खत्म कर रहा हूं। ये सफर शानदार रहा।’

अरिजीत सिंह का करियर और स्टारडम

अरिजीत सिंह के करियर की बात करें, तो वह साल 1987 में पश्चिम बंगाल के जीयागंज में पैदा हुए थे। उनकी मां क्लासिकल सिंगर थीं और मौसी तबला वादक, तो इस नाते उन्हें म्यूजिक विरासत में मिला। बाद में अरिजीत ने क्लासिकल म्यूजिक की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी। फिर साल 2005 में उन्होंने रियलिटी शो ‘फेम गुरुकुल’ में हिस्सा लिया। अरिजीत सिंह यह शो नहीं जीत पाए, पर जजों और लोगों का दिल जरूर जीत लिया। फिर अरिजीत सिंह ने ’10 के 10 ले गए दिल’ जीता। अरिजीत सिंह के बॉलीवुड करियर में सबसे बड़ा ट्विस्ट ‘आशिकी 2’ के गाने ‘तुम ही हो’ के बाद आया, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

फोटो सौजन्य- गूगल

The festival of Makar Sankranti is associated with faith, tradition, social unity and health

Makar Sankranti:

मकर संक्रांति के अवसर पर पूरे देश में तिल-गुड़ और खिचड़ी खाने और खिलाने का रिवाज है। लेकिन हमारे देश में एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पर मकर संक्रांति के दिन दही-चुड़ा खाया जाता है।

मकर संक्रांति पर क्यों खाया जाता है?

भारत के हर हिस्से में मकर संक्रांति का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस साल मकर संक्रांति का त्योहार 14 और 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे उत्तरायण कहा जाता है।मकर संक्रांति के खास दिन तिल और गुड़ के लड्डू, खिचड़ी, पूरन पोली, गजक और उंधियू जैसे पकवान बहुत ही चाव से खाए जाते हैं। मकर संक्रांति के दिन तिल-गुड़ तो हर हिस्से में खाया जाता है। लेकिन भारत का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पर मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा खाया जाता है।

मिथिला में मकर संक्रांति के दिन खाया जाता है दही और चूड़ा

The festival of Makar Sankranti is associated with faith, tradition, social unity and health

मिथिला में मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आस्था, परंपरा, सामाजिक एकता और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ उत्सव है। इस दिन सबसे विशेष रूप से दही-चूड़ा खाया ही जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दही को हिंदू धर्म में शुद्ध और सात्विक माना गया है। वहीं, चावल को अन्न का राजा कहा जाता है। मकर संक्रांति पर सात्विक भोजन करने का विधान है। इसलिए मिथिला में मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा खाया जाता है।

दही -चूड़ा खाने के फायदे

आयुर्वेद के मुताबिक चूड़ा कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होता है और दही शरीर में गर्मी को बनाए रखता है। मकर संक्रांति का त्योहार सर्दियों में मनाया जाता है। दही- चूड़ा को एक साथ खाने से सर्दियों में शरीर को अंदर से गर्म बनाए रखने में मदद मिलती है। ये कॉम्बो शरीर को बीमारियों से लड़ने की ताकत अंदर से देता है।

पाचन तंत्र को करता है मजबूत

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन पर प्रकाशित रिसर्च के अनुसार दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स होते हैं। दही खाने से पेट में गुड़ बैक्टीरिया बढ़ते हैं। इससे कब्ज, गैस और अपच की परेशानी दूर होती है। वहीं, चूड़ा पचाने में आसान होता है। जब आप दही और चूड़ा को एक साथ खाते हैं तो इससे मल नरम होता है। इससे सुबह पेट अच्छे से साफ होता है और पाचन तंत्र को मजबूत बनती है।

इम्यूनिटी स्ट्रांग करता है दही-चूड़ा

दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। मकर संक्रांति के खास मौके पर दही- चूड़ा खाने से शरीर की सर्दी में कम होने वाली इम्यूनिटी बढ़ती है। इससे सर्दी, खांसी और जुकाम की समस्या घटती है। जिन लोगों की इम्यूनिटी काफी कमजोर हैं, उन्हें मकर संक्रांति के दिन दोपहर के खाने में दही- चूड़ा जरूर खाना चाहिए।

हड्डियों और दांतों के लिए फायदेमंद

बता दें कि दही में कैल्शियम और फॉस्फोरस होता है। जबकि चूड़ा आयरन, फाइबर व प्रोटीन का अच्छा सोर्स है। जब आप दही- चूड़ा को एक साथ खाते हैं तो ये शरीर की हड्डियों और दांतों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। दही-चूड़ा खाने से शरीर को कैल्शियम मिलता है। इससे हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद मिलती है।

शरीर को देता है ऊर्जा

मकर संक्रांति के दिन अक्सर लोग सुबह जल्दी स्नान आदि करके पूजा, पाठ और दान करते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाने के बाद शरीर को एनर्जी की जरूरत होती है। दही- चूड़ा खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है। खाने के बाद दही- चूड़ा तुरंत ग्लूकोज में बदल जाता है। इससे शरीर को ताजगी व एनर्जी मिलती है।

मकर संक्रांति के दिन कब खाएं दही-चूड़ा

परंपरा के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन दही -चूड़ा नाश्ते में तिलकुट, गुड़, सब्जी, अचार और चटनी के साथ खाया जाता है। कुछ लोग दोपहर के खाने में भी दही चूड़ा खाते हैं। आप अपनी हिसाब से मकर संक्रांति के दिन दही-चूड़ा खाने का मजा सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में दही-चूड़ा रात को ना खाएं।

फोटो सौजन्य- गूगल

Bollywood's King Khan also posted an emotional post remembering Dharam ji

Dharmendra:

सिनेमा जगत के हीमैन का निधन हो गया। वह 12 नवंबर को ही अस्पताल से घर लौटे थे। धर्मेंद्र को 31 अक्टूबर को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसके बाद से घर पर ही उनका इलाज डॉक्टरों की देखरेख में चल रहा था। उनका सोमवार को मुंबई के विले पार्ले में अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके अंतिम दर्शन करने के लिए शोले के जय यानी अमिताभ बच्चन, संजय दत्त, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, सलमान खान, आमिर खान, शबाना आजमी और अनिल कपूर समेत की दिग्गज सितारे पहुंचे। श्मशान घाट पर धर्मेंद्र की बेटी ईशा देओल और पोते करण देओल को काफी इमोशनल देखा गया।

Dharmendra's family has put an end to the rumours about his health after being on a ventilator

बॉलीवुड के किंग खान ने भी धरम जी को याद करते हुए पोस्ट किया है, जिसमें उन्होंने लिखा- ‘मेरे लिए आप सिर्फ एक महान कलाकार नहीं, एक पिता जैसे मार्गदर्शक थे।’

हेमा मालिनी की भी आंखें नम थीं। धर्मेंद्र और हेमा ने 1980 में शादी की थी और आखिर 45 साल बाद दोनों को साथ छूट गया। धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर, 1935 को पंजाब के साहनेवाल गांव में हुआ था। 65 साल के करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और वह हिंदी सिनेमा में सबसे ज्यादा हिट फिल्मों का रिकॉर्ड रखते हैं। धर्मेंद्र ने 1960 में ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से डेब्यू किया और साल 1960 के दशक में पॉपुलर हो गए। उनका आई मिलन की बेला, फूल और पत्थर और आए दिन बहार के.. ने उन्हें इस दशक में रातोंरात लोकप्रियता दिलाई। वहीं उन्हें हीमैन का दर्जा दिया गया, जो आज भी कायम है। उनकी फिल्में शोले से लेकर यमला पगला दीवाना तक सभी फिल्में फैंस की फेवरेट रही हैं। धर्मेंद्र ने शोले, धर्मवीर, चुपके-चुपके, मेरा गांव मेरा देश और ड्रीम गर्ल जैसी कई यादगार फिल्में दीं।

हाल ही में वो शाहिद कपूर-कृति सेनन की फिल्म ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ में नजर आए थे। अब वो जल्द ही अगस्त्य नंदा की फिल्म ‘इक्कीस’ में दिखेंगे, जो इस साल 25 दिसंबर को रिलीज होगी। इस फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो चुका है, जिसमें धर्मेंद्र को शानदार अंदाज देखने को मिला।

 

Dharmendra's family has put an end to the rumours about his health after being on a ventilator

Dharmendra Health: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की तबीयत के मद्देनजर सोशल मीडिया पर कई तरह की खबरों के बीच, उनके परिवार और सनी देओल की टीम की ओर से आई आधिकारिक जानकारी सामने आई है।

देओल परिवार के अनुसार धर्मेंद्र की तबीयत फिलहाल स्थिर है और उनकी हालत में सुधार जारी है। आइये जानते हैं कि एक्टर धर्मेंद्र के साथ अस्पताल में कौन-कौन है और उनकी तबीयत में कितना सुधार है? 89 साल की उम्र में भी धर्मेंद्र अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के लिए जाने जाते हैं और डॉक्टरों ने उनकी हालत को स्थिर बताया है। धर्मेंद्र की देखभाल एक्सपर्ट डॉक्टर की टीम की निगरानी में की जा रही है। वहीं, उनके परिवार के सभी सदस्य हेमा मालिनी सनी देओल और बॉबी दओल अस्पताल में मौजूद हैं। धर्मेंद्र के फैंस और इंडस्ट्री के साथी सितारे लगातार उनके जल्द स्वस्थ होने की दुआ कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर #GetWellSoonDharmendra ट्रेंड कर रहा है और देशभर में दुआओं का सिलसिला जारी है।

परिवार ने झूठी खबरों का किया खंडन

धर्मेंद्र के परिवार ने अफवाहों पर पूरी तरह विराम लगा दिया है। सनी देओल की टीम ने कहा कि वे रिकवर कर रहे हैं और इलाज का असर हो रहा है। आइए हम सब उनके अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करें। टीम ने यह भी बताया कि वह लगातार मीडिया से संपर्क में हैं और धर्मेंद्र की तबीयत पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने लोगों से किसी भी तरह की अफवाह पर रोक लगाने की अपील की है।

बता दें कि धर्मेंद्र की तबीयत को लेकर झूठी खबरें सोशल मीडिया पर रातोंरात फैल गई थीं। इन खबरों को देखकर कई नामी हस्तियों और राजनीतिक नेताओं ने भी श्रद्धांजलि संदेश साझा कर दिए, लेकिन कुछ ही घंटों में धर्मेंद्र के परिवार ने इन खबरों का खंडन किया और कहा कि अभिनेता का इलाज चल रहा है।

 

Chhath Puja: On Chhath, the great festival of folk faith

CHHATH PUJA: देशभर में लोक आस्था का महापर्व छठ पूरे हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। सोमवार शाम को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखांड समेत देश के कई हिस्सों में नदियों के घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।

Chhath Puja

दिल्ली में भी यमुना तट पर पारंपरिक गीतों और पूजा के बीच माहौल आस्थामय दिखा। इस अवसर पर ना सिर्फ आम लोगों के साथ ही नेतागण और भोजपुरी इंडस्‍ट्री के कलाकार भी भक्ति में लीन नजर आए। घाटों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे और प्रशासन ने व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष टीम तैनात की थी। छठ पूजा की खासियत यह रही कि लोग सुबह से ही तैयारी में जुटे रहे और शाम होते ही सूर्य को अर्घ्‍य देने के लिए घाटों पर पहुंचे। सोमवार को इस पर्व के तीसरे दिन व्रती महिलाओं ने डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया।

Importance of 'Chhath', the great festival of folk faith, from bathing to Arghya

बिहार में छठ ना सिर्फ आस्था का पर्व है, बल्कि इस बार चुनावी मौसम ने इसमें राजनीति का रंग भी जोड़ दिया है। विधानसभा चुनाव के कारण कई उम्मीदवार घाटों पर पहुंच रहे हैं और श्रद्धालुओं से जनसंपर्क करते नजर आए।

फोटो सौजन्य- गूगल

Chhath Puja: Learn the significance and method of preparation of Kharna

Chhath Puja: महापर्व छठ का आगाज 25 अक्टूबर को हो चुका है। चार दिनों तक चलने वाले छठ पर्व का समापन 29 अक्टूबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर होगा। पहले दिन नाहय-खाय और आज यानी 26 अक्टूबर को छठ पर्व के दूसरे दिन खरना मनाया जाता है। खरना का भी अपना विशेष महत्व है। छठ में सूर्य देवता के साथ ही छठी मैया की भी पूजा की जाती है। यह त्योहार बिहार का विशेष त्योहार है जिसे झारखंड, उत्तर प्रदेश में रहने वाले लोग बड़े ही आस्था के साथ मनाते हैं। खरना को लोहंडा भी कहा जाता है। खरना पर खास प्रसाद बनाया जाता है जिसका अपना अलग महत्व है। इसी खास प्रसाद को व्रती खाते हैं।

खरना पर प्रसाद में क्या बनता है?

Chhath Puja

खरना 26 अक्टूबर को है। इस दिन गुड़ वाली खीर और रोटी बनती है। यह खीर मिट्टी का नया चूल्हा बनाकर तैयार किया जाता है। वह भी आम की लकड़ी जलाकर बनाने की प्रथा है। दूसरी लकड़ी का इस्तेमाल इसमें वर्जित माना गया है। व्रती पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर इसका ही सेवन करते हैं।

खरना प्रसाद का महत्व ?

खरना वाले दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं। शाम के समय जब मिट्टी का चूल्हा बनाया जाता है, तो उस पर गुड़ की खीर, रोटी बनाई जाती है। आप इसे पीतल या मिर्टी के बर्तन में बना सकते हैं। साथ ही गेहूं की रोटी या फिर पूड़ी बनाई जाती है। शाम में सूर्य देव को पूजा-आराधना करके इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं।

आम की लकड़ी ही क्यों किया जाता है इस्तेमाल?

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आम का पेड़ छठी मइया को प्रिय है। आम की लकड़ी शुद्ध, सात्विक होता है। मान्यता है कि आम की लकड़ी पर पके भोजन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। साथ ही इसका धुआं वातावरण को शुद्ध करता है।

खरना का क्या है महत्व?

खरना छठ पर्व के दूसरे दिन पड़ता है और यहीं से 36 घंटे वाला निर्जला व्रत शुरू होता है। खीर और रोटी खाने के बाद व्रती अन्न और जल ग्रहण नहीं करते हैं। खरना के दिन बनने वाली गुड़ की खीर खाने से छठी मइया का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह सेहत, सुख-समृद्धि, संतान सुख भी देता है। व्रती जब सूर्य देव को अर्घ्य दे देते हैं तो इस प्रसाद का सेवन किया जाता है। उसके बाद ही घर के अन्य सदस्य भी इसे खाते हैं। यहां से शुरू होता है व्रती का 36 घंटे का निर्जला व्रत 27 अक्टूबर को संध्या अर्घ्य और 28 को उगते सूरज को अर्घ्य देकर पूजा का पारण होता है।

खरना प्रसाद गुड़ की खीर बनाने की विधि

इसके लिए मिट्टी या पीतल के बर्तन में दूध डालकर उबालें। इसमें चावल को तीन-चार बार साफ पानी से धोकर डालें। जब चावल पक जाए तो उसमें गुड़ डालकर पकाएं, आंच को कम ही रखें, आप इसमें थोड़ा सा शुद्ध घी भी मिला सकते हैं। अपना पसंदीदा ड्राई फ्रूट्स, इलाचयी पाउडर भी डाल दें।

फोटो सौजन्य- गूगल

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