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Tag Archives: Health Tips

Vaginal Infection: Do not ignore the problem of burning and itching in the vagina

PCOS यानी पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (Polycystic ovary syndrome) महिलाओं को होने वाला एक एंडोक्राइन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है। यह डिजीज महिलाओं को रजोनिवृत्ति से ठीक पहले के समय (प्रीमेनोपॉजल) होता है। पीसीओएस में महिलाओं के शरीर में असाधारण मात्रा में एंड्रोजन हार्मोन बनने लगता है। एंड्रोजन पुरुष हार्मोन होता है और बहुत ही कम मात्रा में महिलाओं के शरीर में पाया जाता है। पीसीओएस में एंड्रोजन बढ़ने के साथ-साथ मासिक धर्म अनियमित होना और अंडाशय पर छोटी-छोटी सिस्ट (अल्सर जैसी संरचनाएं) बनने लग जाती हैं। ओव्यूलेशन (डिंबोत्सर्जन) तब होता है, जब अंडाशय से अंडा इस प्रकार निकले की शुक्राणु उसे फर्टिलाइज कर ले। पीसीओएस से ग्रस्त महिलाओं ओव्यूलेशन के लिए जरूरी हार्मोन पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता है। ऐसी स्थिति में जब ओव्यूलेशन हो नहीं पाता है, तो अंडाशय पर छोटी-छोटी सिस्ट बनने लगती हैं। ये सिस्ट ज्यादा मात्रा में एंड्रोजन बनाती हैं, जो महिलाओं को मासिक धर्म को अनियमित करने के साथ-साथ पीसीओएस से संबंधित कई लक्षण पैदा कर देता है।

पीसीओएस के प्रकार

रॉटरडैम क्राइटेरिया के अनुसार पीसीओएस के 4 अलग-अलग प्रकार हैं –

क्लासिक पॉलिसिस्टिक ओवरी पीसीओएस – इसमें लंबे समय तक ओव्यूलेशन नहीं होता है और ओवरी में सिस्ट बनने के साथ-साथ एंड्रोजन का स्तर भी बढ़ जाता है। जिन महिलाओं को पीसीओएस का यह प्रकार होता है उनमें मेटाबॉलिक व हृदय संबंधी बीमारियां होने का काफी खतरा रहता है।
क्लासिक नोन-पॉलिसिस्टिक ओवरी पीसीओएस – इसमें ओव्यूलेशन कम होता है और एंड्रोजन का स्तर बढ़ा हुआ होता है। हालांकि, इसमें ओवरी सामान्य रहती हैं।
नोन-क्लासिक ओव्यूलेटरी पीसीओएस – इसमें ओव्यूलेशन भी होता है और मासिक धर्म भी नियमित रहते हैं। लेकिन इस दौरान एंड्रोजन का स्तर बढ़ जाता है और ओवरी पर सिस्ट भी बन जाती हैं।
नोन-क्लासिक माइल्ड पीसीओएस – पीसीओएस के इस प्रकार के ओव्यूलेशन कम हो जाता है और ओवरी पर सिस्ट भी बन जाती हैं।

पीसीओएस के लक्षण

Vaginal Infection: Do not ignore the problem of burning and itching in the vagina

पीसीओएस ऐसा रोग है जिसके कारण कई अन्य रोग भी विकसित हो सकते हैं। पीसीओएस से प्रमुख रूप से तीन समस्याएं जुड़ी होती हैं और वे हैं मासिक धर्म में अनियमितता, एंड्रोजन का स्तर बढ़ना और अंडाशय में सिस्ट बनना। रॉटरडैम के क्राइटेरिया के अनुसार यदि किसी महिला को इन तीन लक्षणों में से कोई दो महसूस हो रहे हैं, तो वह पीसीओएस से ग्रस्त है। हालांकि, पीसीओएस से होने वाले संकेत व लक्षण ग्रसित महिला की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। पीसीओएस से आमतौर पर देखे जाने वाले लक्षणों में निम्न को भी शामिल किया जा सकता है –

इनफर्टिलिटी (बांझपन)
मोटापा बढ़ना
चेहरे, छाती और पेट पर अधिक बाल उगना
ऑयली स्किन और मुंहासे होना

पीसीओएस के कारण

पीसीओएस के सटीक कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। हालांकि, यह अनुवांशिक, वातावरणीय और पारिवारिक स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। निम्न स्थितियां पीसीओएस का कारण बन सकती हैं –

वातावरणीय कारक- इन स्थितियों में संतुलित आहार न ले पाने के कारण और पर्याप्त शारीरिक गतिविधियां न कर पाने के कारण मोटापा बढ़ने लगता है। शरीर का वजन बढ़ना पीसीओएस समस्या से जुड़ा होता है। हालांकि, सामान्य वजन वाली कुछ महिलाओं को भी पीसीओएस हो सकता है। अलावा इसके किसी संक्रामक या विषाक्त चीज के संपर्क में आना भी वातावरणीय कारक के रूप में पीसीओएस का कारण बन सकता है।

पारिवारिक समस्या – जिन महिलाओं के परिवार में पहले किसी को पीसीओएस या टाइप 02 डायबिटीज हो चुका है, तो ऐसे में उन्हें भी पीसीओएस होने का खतरा बढ़ जाता है। किसी महिला में पीसीओएस के लक्षण कितने गंभीर हो सकते हैं, यह भी उसकी फैमिली हिस्ट्री पर निर्भर कर सकता है।

इंसुलिन रेजिस्टेंस – जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन पर प्रतिक्रिया न दे पाएं, तो शरीर अधिक मात्रा में इंसुलिन बनने लगता है। इस प्रकार शरीर में इंसुलिन का स्तर सामान्य न होना, एंड्रोजन का स्तर बढ़ने का कारण बन सकता है। जीवनशैली से जुड़ी खराब आदतें जैसे पौष्टिक व संतुलित आहार न लेना और शारीरिक गतिविधियां न करना भी इंसुलिन रेजिस्टेंस का कारण बन सकता है। इस कारण से भी महिलाओं का वजन बढ़ने लगता है और पीसीओएस के लक्षण गंभीर हो जाते हैं।

जोखिम कारक

पीसीओएस सिर्फ प्रजनन प्रणाली को नहीं बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों को भी प्रभावित करता है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ा देता है, जिससे जीवन भर समस्याएं हो सकती हैं। पीसीओएस के प्रमुख जोखिम कारकों में निम्न शामिल हैं –

मां या बहन को पहले से ही पीसीओएस होना
इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होना
गर्भाशय की मोटाई बढ़ने के कारण एंडोमेट्रियल कैंसर होने का खतरा बढ़ना
स्लीप एपनिया और डिप्रेशन जैसी समस्याएं होना।

पीसीओएस की रोकथाम

पीसीओएस आमतौर पर प्यूबर्टी के दौरान विकसित होता है, जिसके कारण वयस्क होने पर डायबिटीज और बांझपन की समस्याएं होने लगती हैं। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए समय रहते ही पीसीओएस की रोकथाम करना बेहद जरूरी है।

जो महिलाएं मोटापे से ग्रस्त है उन्हें अपने वजन को कम करने के लिए उपयुक्त उपाय करने चाहिए, जिससे पीसीओएस की गंभीरता को कम करने में भी मदद मिलेगी।

इंसुलिन और एंड्रोजन लेवल के स्तर पर नजर रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि ये पीसीओएस विकसित होने का कारण बन सकते हैं।

पीसीओएस का निदान

पीसीओएस में होने वाले लक्षण आमतौर पर अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं में भी हो सकते हैं। पीसीओएस की गंभीरता और उसके प्रकार का पता लगाने के लिए उचित निदान करना जरूरी होता है। पीसीओएस का निदान करने के लिए डॉक्टर मरीज की शारीरिक जांच करते हैं और साथ ही उनके स्वास्थ्य से जुड़ी पिछली जानकारियां (मेडिकल हिस्ट्री) भी लेते हैं। इसके बाद कुछ अन्य टेस्ट भी किए जाते हैं, जिनकी मदद से पीसीओएस की पुष्टि की जाती है, जैसे –

अल्ट्रासाउंड या पेल्विक एग्जाम
ब्लड टेस्ट
पीसीओएस का इलाज
पीसीओएस से होने वाली समस्याओं को ठीक करने के कई इलाज उपलब्ध हैं। पीसीओएस का इलाज आमतौर पर हर महिला को महसूस हो रहे लक्षणों, स्वास्थ्य स्थिति और वह गर्भधारण करना चाहती है या नहीं आदि के आधार पर किया जाता है।

महिला अगर गर्भधारण करना चाहती है –

जीवनशैली में बदलाव – महिला की डाइट में विशेष बदलाव किए जाते हैं और साथ ही उसे व्यायाम आदि भी करने को कहा जाता है, ताकि उसके शारीरिक वजन को नियंत्रित किया जा सके।
फर्टिलिटी की दवाएं – इस दौरान कुछ इंजेक्शन व खाने की दवाएं दी जाती हैं, जो ओवरी को अंडे निकालने में मदद करती हैं। हालांकि, इन दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं जैसे जुड़ा बच्चे होना या फिर पेल्विक में दर्द होना आदि।

यदि महिला गर्भधारण नहीं करना चाहती है –

गर्भ निरोधक गोलियां – ये दवाएं गर्भधारण रोकने के साथ-साथ मासिक धर्म को नियंत्रित करने, एंड्रोजन लेवल को कम करने, मुंहासे दूर करने और बालों के उगने की समस्या को नियंत्रित करने में भी मदद करती हैं।

डायबिटीज की दवाएं – यदि महिला को डायबिटीज है, तो उसके लिए इन दवाओं को का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, यदि महिला को डायबिटीज नहीं है, तो भी इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित करने के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। डायबिटीज की दवाएं आमतौर पर मोटापे से ग्रस्त महिलाओं को भी दी जा सकती हैं, जो शरीर का वजन कम करने और असामान्य रूप से उग रहे बालों को नियंत्रित करने में भी मदद करती है।

सप्लीमेंट्री दवाएं – इन दवाओं की मदद से भी पीसीओएस से ग्रसित महिलाओं में मोटापा, बालों का असामान्य रूप से उगना और अन्य समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है।

अलावा इसके अगर दवाओं व अन्य इलाज विकल्पों से स्थिति को नियंत्रित नहीं किया जा रहा है, तो सर्जरी भी की जा सकती है। हालांकि, अगर सर्जरी से भी इलाज संभव नहीं है तो असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) जिसकी मदद से फर्टिलिटी का इलाज किया जाता है। इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) सबसे आम प्रकार की एआरटी थेरेपी है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Micro Walk: The risks of sitting in a chair and working all day at the office

Micro Walk:

हमारे साथ रहने वाले ऐसे कई लोग करीब 10 घंटे लगातार कंप्यूटर या लौपटॉप पर अपना कार्य करते हैं। ऐसे में जब एक्सरसाइज की बात आती है तो सबसे पहले जुबान पर एक ही पंक्ति आती है, समय नहीं है पर क्या आप जानते हैं कि 10 घंटे के बीच महज कुछ मिनटों के वॉक से आप खुद को फिट रख सकते हैं। ‘माइक्रो वॉक’ लगातार डेस्क पर काम करने वालों के लिए एक शानदार एक्सरसाइज हो सकती है। सिर्फ कुछ मिनटों की एक्सरसाइज आपको कमर और गर्दन में पेन से राहत दिलाने के साथ-साथ मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम हो सकता है। आइये जानते हैं क्या मसले पर क्या है एक्सपर्ट की राय-

जानें क्या है माइक्रो वॉक-

माइक्रो वॉक यानी दिनभर में कई बार 01 से 10 मिनट तक छोटी-छोटी वॉक करना। यानी आपको जिम जाने या लंबा वर्कआउट करने की जरूरत नहीं है। हर 30 से 60 मिनट बाद अपनी कुर्सी से उठकर कुछ मिनट चलना भी माइक्रो वॉक कहलाता है।

एक्सपर्ट का कहना है कि लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है। ऐसे में दिनभर के दौरान छोटी-छोटी वॉक करने से शरीर एक्टिव रहता है और कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा कम किया जा सकता है।

लंबे समय तक बैठे रहने के नुकसान

पूरे दिन बैठे रहने से शरीर की मांसपेशियां कम सक्रिय रहती हैं। इससे ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ सकता है और शरीर की कैलोरी खर्च करने की क्षमता भी घट जाती है। इसके अलावा ब्लड शुगर कंट्रोल करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और समय के साथ हृदय रोग का खतरा भी बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी लंबे समय तक बैठे रहने को कई नॉन कम्युनीकेबल डिजीज का एक प्रमुख जोखिम कारक मानता है।

ऐसे मिलते हैं माइक्रो वॉक से फायदे-

Micro Walk: The risks of sitting in a chair and working all day at the office

विशेषज्ञ का कहना है कि हर 30 से 60 मिनट में सिर्फ 05 मिनट की वॉक भी शरीर पर पॉजिटिव असर डाल सकती है, जैसे-

1. ब्लड सर्कुलेशन होता है बेहतर

लगातार बैठे रहने से पैरों और शरीर के निचले हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो सकता है। कुछ मिनट की वॉक करने से मांसपेशियां सक्रिय होती हैं और पूरे शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। इससे थकान भी कम महसूस होती है।

2. ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद

खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलने से शरीर ग्लूकोज का बेहतर उपयोग कर पाता है। कई NCBI में छपी रिपोर्ट में पाया गया है कि नियमित माइक्रो वॉक ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है।

3. ब्लड प्रेशर हो सकता है कंट्रोल

रिसर्च बताते हैं कि हर आधे घंटे बाद कुछ मिनट पैदल चलने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। यह आदत हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक मानी जाती है।

4. मूड और फोकस हो सकता है बेहतर

लगातार स्क्रीन पर काम करने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। कुछ मिनट की वॉक दिमाग को आराम देती है और काम पर दोबारा ध्यान लगाने में मदद करती है। इससे तनाव भी कम हो सकता है और उत्पादकता बढ़ सकती है।

ऑफिस में माइक्रो वॉक को कैसे बनाएं आदत?

माइक्रो वॉक को अपनी लाइफस्टाइल में शामिल करना मुश्किल नहीं है। इसके लिए आप कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं।

  • हर 30 से 60 मिनट बाद अपनी सीट से उठें।
  • लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें।
  • किसी सहकर्मी से बात करनी हो तो उसके डेस्क तक पैदल जाएं।
  • फोन पर बात करते समय चलते-चलते बातचीत करें।
  • पानी भरने या प्रिंटर तक जाने के लिए खुद पैदल जाएं।
  • मोबाइल या कंप्यूटर में हर घंटे का रिमाइंडर लगाएं।

एक आसान तरीका है माइक्रो वॉक 

एक्सपर्ट का कहना है कि माइक्रो वॉक लंबे समय तक बैठे रहने के नुकसान को कम करने का एक आसान तरीका है, लेकिन इसे नियमित व्यायाम का ऑप्शन नहीं माना जा सकता। बेहतर हेल्थ के लिए हफ्ते में कम से कम 150 मिनट की एक्सरसाइज आवश्यक है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Vaginal Infection: Do not ignore the problem of burning and itching in the vagina

Health Tips: एक कहावत है ‘हेल्थ ही असल पूंजी है’, लेकिन अक्सर देखा गया है कि हम महिलाएं अपनी सेहत को इग्नोर कर देती हैं। वक्त की कमी, ऑफिस या घर से संबंधित तनाव, जागरूकता की कमी यौन स्वास्थ्य के बारे में बात करने में झिझकना, सभी ऐसे कारक हैं जो इसमें योगदान करते हैं। लेकिन जनरल हेल्थ समस्याओं को भी आपको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासतौर से जब वे बदलाव आपकी वजाइना या ब्रेस्ट में नजर आ रहे हों।

महिलाओं की आम शिकायतें होती हैं, जिन्हें ज्य़ादातर इग्नोर कर दिया जाता है। पर यह कुछ ज्यादा गंभीर होने का संकेत हो सकते हैं।

6 स्वास्थ्य समस्याएं जिन्हें महिलाओं को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

1. सेक्स के दौरान दर्द होना

Do we have to face the risk of UTI after sex?

महिलाएं अक्सर संभोग के दौरान दर्द के बारे में बात करने से हिचकिचाती हैं। हालांकि, दर्दनाक सेक्स एंडोमेट्रियोसिस का लक्षण भी हो सकता है। एक ऐसी स्थिति जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत गर्भाशय के बाहर जमा हो जाती है। यह पीआईडी ​​​​(पेल्विक सूजन की बीमारी) के कारण भी हो सकता है, जो अक्सर वेजाइनल डिस्चार्ज के साथ रिप्रोडक्टिव ऑर्गन का संक्रमण होता है। अपर्याप्त लुब्रिकेशन और ड्राई वेजाइना के कारण भी सेक्स दर्दनाक हो सकता है।

2. अनियमित या असामान्य माहवारी

मासिक धर्म हर 21-35 दिनों में नियमित रूप से होना चाहिए। भारी प्रवाह, मध्य-चक्र रक्तस्राव या स्पॉटिंग, लंबे समय तक पीरियड साइकिल, यह थायराइड, पीसीओडी या फाइब्रॉएड जैसे हार्मोनल रोगों के कारण हो सकता है, जो गर्भाशय के सौम्य ट्यूमर हैं। सेक्स के बाद रक्तस्राव या रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यह ओवेरियन कैंसर का संकेत हो सकता है और इसकी जांच की आवश्यकता है।

3. ब्रेस्ट में बदलाव

Breast Cancer

स्तनों में गांठ फाइब्रोएडीनोमा जैसी हानिरहित स्थितियों के कारण हो सकती है। हालांकि ब्रेस्ट में गांठ होना भी ब्रेस्ट कैंसर का संकेत हो सकता है। जागरूकता की कमी के कारण महिलाओं में स्तन कैंसर अक्सर उन्नत चरणों में पाया जाता है। स्तनों में गांठ जो स्तन के बाकी टिश्यू से सख्त और अलग लगती हैं या निप्पल से स्राव को चैक किया जाना चाहिए। महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए नियमित चेकअप करवाना चाहिए। स्तन में किसी भी परिवर्तन का शीघ्र पता लगाने के लिए ब्रेस्ट सेल्फ टेस्टिंग के तरीकों के बारे में भी पता होना चाहिए।

4. अचानक वजन घटना और बढ़ना

अचानक वजन कम होना खुशी की बात हो सकती है, लेकिन एकाएक वजन कम होना टीबी के साथ-साथ कैंसर या थायरॉयड विकारों का भी संकेत हो सकता है और इसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। अचानक वजन बढ़ना पीसीओडी या थायराइड की समस्या के कारण हो सकता है और अगर इसका पता चल जाए तो इसे बहुत अच्छी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है।

5. थकान महसूस होना

बहुत सी महिलाएं हर समय थकान महसूस करती हैं। बार-बार थकान एनीमिया, थायराइड विकार, सूक्ष्म पोषक तत्वों और विटामिन डी की कमी के कारण हो सकती है और इसकी जांच होनी चाहिए। पूरी रात की नींद के बाद भी थकान महसूस होना भी तनाव, चिंता, डिप्रेशन या ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया का कारण हो सकता है। इसलिए इसे कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

6. ब्लोटिंग

बहुत सी महिलाएं विशेष रूप से मासिक धर्म से पहले फूला हुआ या गैसी महसूस करती हैं। यह अधिक सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। हालांकि, अगर ब्लोटिंग महसूस करना बहुत बार होता है, तो इसे चैक करवाना चाहिए। यह इरिटेबल बावल सिंड्रोम, एंडोमेट्रियोसिस या यहां तक ​​कि ओवरियन कैंसर का संकेत हो सकता है। जैसा कि मिशेल ओबामा ने कहा कि समुदाय और देश और अंततः दुनिया उतनी ही मजबूत है जितनी उनकी महिलाओं का स्वास्थ्य। इसलिए देश और दुनिया की बेहतरी के लिए हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Gas After Eating

Gas after Eating: आजकल लोगों का खानपान काफी खराब होता जा रहा है, जिसका सीधा असर आपके हेल्थ पर पड़ रहा है। देखा जा रहा है कि लोगों को अक्सर खाना खाने के बाद गैस बनना, पेट में दर्द और सूजन जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि अगर आपका खानपान सही नहीं है, तो इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण अनियमित खानपान, जंक फूड का अधिक सेवन, देर रात तक जागना और मानसिक तनाव इसके प्रमुख कारणों में से एक हैं।

यह समस्या न आज केवल शारीरिक असहजता पैदा कर रही है, बल्कि डेली रूटीन को भी प्रभावित कर रही है। आप में से कई लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं, और फिर तब ध्यान देते हैं, जब समस्या काफी भयानक रूप ले लेता है। लेकिन समय रहते समस्या पर ध्यान देना जरूरी है। सही आहार, नियमित दिनचर्या और कुछ आसान उपायों से इस समस्या से राहत पाई जा सकती है। पर कुछ आसान और घरेलू ड्रिंक्स आपकी इस परेशानी को कम कर सकते हैं, जिनके बारे में हम आपको कुछ खास होममेड ड्रिंक्स के खास फायदों के बारे में बताने वाले हैं।

गुनगुना नींबू पानी

अगर आप सुबह हल्का गुनगुना पानी नहीं पीते हैं तो आज से ही पीना शुरू कर दीजिए। नींबू पानी पीने के फायदे आमतौर पर पाचन क्रिया को अच्छा बनाने के लिए सबसे ज्यादा होते हैं। क्योंकि हल्का गुनगुना और नींबू वाला पानी पाचन तंत्र को सक्रिय करने में बेहद असरदार होता है। इसमें मौजूद विटामिन-C शरीर को डिटॉक्स करते हैं और गैस व एसिडिटी को कम कर देते हैं। सुबह खाली पेट इसका सेवन करने से पेट हल्का रहता है और सूजन में कमी आती है।

अदरक का पानी

अदरक में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। यह दोनों की तत्व पेट की सूजन और गैस को कम करने में सहायता प्रदान करते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि अदरक का पानी पीने से पाचन बेहतर होता है और भोजन भी आसानी से पच जाता है। यह मतली और भारीपन की समस्या को भी दूर करने में मददगार साबित होता है।

जीरा वॉटर

Water of celery and cumin seeds makes the fat stored in the body disappear

जीरा पाचन के लिए बहुत फायदेमंद है। ऐसे में जीरा वॉटर पेट में गैस बनने की समस्या को कम कर सकता है और मेटाबॉलिज्म को तेज करता है। शोध बताते हैं कि इसमें मौजूद तत्व पाचन एंजाइम्स को सक्रिय करते हैं, जिससे पेट की सूजन और अपच में राहत मिलती है। अगर आप चाहें तो सुबह भी जीरे का पानी पी सकते हैं क्योंकि खाली पेट जीरे का पानी पीने के कई अलग-अलग फायदे भी हो सकते हैं।

अजवाइन का पानी

अजवाइन का पानी भी गैस और सूजन से राहत दिलाता है। इसमें थाइमोल नामक तत्व होता है, जो पाचन क्रिया को मजबूत करता है। अजवाइन का पानी गैस, पेट दर्द और ब्लोटिंग से फौरन राहत दिलाता है। अगर आप हैवी डाइट लेते हैं को उसके बाद इसे पीना बहुत लाभकारी साबित होता है।

शहद व पुदीने वाला पानी

Gas After Eating

शहद और पुदीने का पानी स्वादिष्ट होने के साथ ही पेट के लिए बेहद फायदेमंद होता है। पुदीना पेट को ठंडक देता है और पेट की जलन व सूजन को कम करने का काम करता है, जबकि शहद पाचन को सुधारता है। इन दोनों का मिश्रण गैस और ब्लोटिंग से राहत दिलाने का काम करता है। साथ ही शरीर को ताजगी भी देता है।

फोटो सौजन्य- गूगल

If you urinate shortly after drinking water, it could be a sign of illness

Health Care: दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती है और किडनी सही तरीके से वर्क करती है, लेकिन कई लोगों को यह समस्या होती है कि पानी पीने के कुछ ही समय बाद उन्हें बार-बार पेशाब करने की समस्या से जुझना पड़ता है।

पानी पीने के तुरंत बाद पेशाब आने की वजह

डॉक्टर का कहना है कि हम सबको सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि पानी के बाद पेशाब आना शरीर की सामान्य प्रक्रिया है। जब आप ज्यादा मात्रा में पानी या कोई भी अन्य पेय पदार्थ लेते हैं, तो इससे किडनी का काम फिल्टर करके पेशाब के जरिए बाहर निकाल देता है। अगर आप कम वक्त में बहुत ज्यादा पानी का सेवन करते हैं तो स्वाभाविक रूप से बार-बार पेशाब आ सकता है। अलावा इसके ठंड का मौसम, कैफीन का सेवन या कुछ दवाइयां भी पेशाब की मात्रा में इजाफा कर सकती है।

ओवरएक्टिव ब्लैडर- किसी कारण से अगर आपको बिना ज्यादा पानी पिए भी बार-बार पेशाब आने की परेशानी हो रही है, तो यह ओवरएक्टिव ब्लैडर का संकेत हो सकता है। इसमें मूत्राशय की कोशिकाएं अधिक एक्टिव हो जाती हैं। इससे बार-बार पेशाब आता है।

डायबिटीज– बार-बार पेशाब आना डायबिटीज का भी एक शुरुआती लक्षण हो सकता है। पानी पीने के बाद पेशाब आ रहा है और प्यास भी लग रही है तो एक बार डॉक्टर की सलाह पर डायबिटीज टेस्ट जरूर करवाएं।

यूरिन इन्फेक्शन- अगर बार-बार पेशाब आने के साथ जलन, दर्द या पेशाब में गंध की समस्या हो रही है, तो यह यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) का संकेत हो सकता है।

किडनी से जुड़ी समस्या- कुछ मामलों में किडनी से जुड़ी समस्याओं के कारण भी बार-बार पेशाब आ सकता है। किडनी शरीर में तरल पदार्थ और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखती है।

ज्यादा पेशाब आने पर डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

If you urinate shortly after drinking water, it could be a sign of illness

डॉक्टर का कहना है कि पानी पीने के बाद कुछ समय बाद ही आपको कुछ लक्षण खुद में नजर आते हैं, तो इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।

  1. हर 10- 15 मिनट में पेशाब आना
  2. पेशाब करते समय जलन या दर्द
  3. पेशाब में यूरिन के साथ खून आना
  4. पेशाब करते समय पीठ में दर्द रहना
  5. बार-बार प्यास लगना
  6. रात में कई बार पेशाब के लिए उठना

कैसे बचें बार-बार पेशाब आने की समस्या से ?

  • बार-बार पेशाब की समस्या से बचने के लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं:
  • पानी एक साथ ज्यादा मात्रा में न पिएं, बल्कि थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिएं
  • चाय और कॉफी जैसे ड्रिंक जिसमें कैफीन होता है, उसका सेवन सीमित मात्रा में करें।
  • रात को सोने से पहले ज्यादा मात्रा में पानी पीने से बचें।
  • खाने में तरल पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में करने की कोशिश करें।

फोटो सौजन्य- गूगल

Never ignore these 5 symptoms of kidney infection

Kidney इंफेक्शन के क्या हैं लक्षण-

क्या आपको मालूम है कि किडनी इंफेक्शन क्यों और कैसे होता है? आखिर इस इंफेक्शन के Symptom क्या हैं? बता दें कि किडनी संक्रमण मूत्राशय के संक्रमण से शुरू होता है और फिर एक या दोनों किडनी तक अपनी पहुंच बना लेता है। किडनी इंफेक्शन किसी भी व्यक्ति को हो सकता है लेकिन महिलाओं में किडनी इंफेक्शन सबसे आम है। जिनको भी किडनी में पथरी होती है उनमें भी किडनी इंफेक्शन खतरा अधिक रहता है। इसके कारण आपको फीवर आ सकता हैऔर ठंड लग सकता है। किडनी इंफेक्शन के कारण आपको यूरीन डिस्चार्ज करते समय जलन हो सकती है। किडनी इंफेक्शन का वक्त पर इलाज करवाना काफी अहम होता है, नहीं तो किडनी फेलियर होने का चांस बढ़ जाता है।

क्या हैं किडनी इंफेक्शन के संकेत

पेशाब करते समय जलन महसूस होना

Frequent urination at night can be a sign of serious illness, a look at the dangers

किडनी इंफेक्शन होने पर आपको पेशाब से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जब किडनी इंफेक्शन होता है, तो बार-बार पेशाब आने की समस्या हो सकती है। इतना ही नहीं, इसकी वजह से पेशाब में जलन हो सकती है और पेशाब करते वक्त दर्द महसूस हो सकता है। जब किडनी इंफेक्शन शुरू होता है तो पेशाब में झाग आ सकता है और पेशाब में खून भी निकल सकता है। किडनी इंफेक्शन के कारण पेशाब में बदबू भी आ जाती है।

किडनी इंफेक्शन होने पर आपको पेशाब से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जब किडनी इंफेक्शन होता है, तो बार-बार पेशाब आने की समस्या हो सकती है। इतना ही नहीं, इसकी वजह से पेशाब में जलन हो सकती है और पेशाब करते वक्त दर्द महसूस हो सकता है। जब किडनी इंफेक्शन शुरू होता है, तो पेशाब में झाग आ सकता है और पेशाब में खून भी निकल सकता है। किडनी इंफेक्शन के कारण पेशाब में बदबू भी आ जाती है।

अचानक से बुखार आना

एकाएक बुखार का आना और कंपकंपी फील होना भी किडनी इंफेक्शन का शुरुआती लक्षण हो सकता है। अगर आपको अचानक से बुखार आने के साथ ही, कंपकंपी भी महसूस हो तो एक बार किडनी का टेस्ट जरूर करवाएं। हालांकि, बुखार और कंपकंपी होना सिर्फ किडनी इंफेक्शन का संकेत नहीं होता है। इसलिए आपको एक बार डॉक्टर से जरूर सलाह लेना चाहिए।

पीठ और कमर में दर्द होना

Never ignore these 5 symptoms of kidney infection

किडनी इंफेक्शन की वजह से कमर और पीठ में भी दर्द हो सकता है। जब किडनी इंफेक्शन शुरू होता है, तो पीठ के निचले हिस्से या कमर में दर्द हो सकता है। यह दर्द एक तरफ या दोनों तरफ महसूस हो सकता है। इसलिए अगर आपको कमर में दर्द की समस्या रहती है, तो इस संकेत को बिल्कुल नजरअंदाज न करें। यह संकेत किडनी इंफेक्शन का हो सकता है। इसलिए अगर आपको लंबे समय से कमर या पीठ में दर्द हो रहा है, तो एक बार केएफटी जरूर कराएं।

रह रहकर जी मिचलाना

किडनी में इंफेक्शन होने पर आपको उल्टी आना और जी मिचलाने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि, कई अन्य कारणों से भी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए अगर आपको अचानक से उल्टी आ रही है या जी मिचलाने की समस्या हो रही है तो एक बार डॉक्टर से जरूर कंसल्ट करें।

थकान और कमजोरी महसूस होना

किडनी में इंफेक्शन होने पर शरीर पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं कर पाता है। इसके कारण आपको थकान और कमजोरी का अनुभव हो सकता है। किडनी इंफेक्शन की वजह से आप अनहेल्दी महसूस कर सकते हैं। आपको हर समय बीमार वाली फिलिंग्स हो सकती है।

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Heating food in a microwave can lead to serious diseases like cancer

Microwave में खाना गर्म करना सेहत के लिए नुकसानदायक

आज के टेक्नोलॉजी के इस युग में घरेलू जिंदगी में बहुत सारी सुविधाएं हो गई हैं। अब हर काम के लिए मशीनें हाजिर हैं। ऐसी ही एक मशीन है माइक्रोवेव, जिसे खाने को गर्म रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आजकल ज्यादातर घरों में माइक्रोवेव पाया जाता है पर क्या आप जानते हैं कि माइक्रोवेव में खाना गर्म करना हेल्थ के लिए भारी नुकसानदेह हो सकता है। बता दें कि माइक्रोवेव इलेक्ट्रिक होने के कारण इससे रेडिएशन निकलती है, जोकि खाने को रेडियोएक्टिव बना सकता है। माइक्रोवेव ऐसे में गर्म किए गए खाने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां होने की आशंका बनी रहती है।

माइक्रोवेव में खाना गर्म करते वक्त कभी भी ऐसी गलती ना करें

Heating food in a microwave can lead to serious diseases like cancer

वैसे माइक्रोवेव में खाना गर्म किया जा सकता है लेकिन सावधानी भी रखनी होगी। खाना सेहत को नुकसान ना पहुंचाए। रिसर्च में यह साफ हुआ है कि माइक्रोवेव से रेडिएशन केवल खाना गर्म करने को लेकर निकलता है। हालांकि, कुछ गलतियां करने से फिर भी बचना चाहिए।

माइक्रोवेव के बर्तन ही इस्तेमाल करें

अगर आप चाहते हैं कि माइक्रोवेल में खाना गर्म करने के बाद भी वह सेहत को नुकसान न पहुंचाए, तो इसके लिए माइक्रोवेव में उन बर्तनों का ही इस्तेमाल करें, तो इस मशीन के लिए बने होते हैं। प्लास्टिक के बर्तन गर्म होने पर हानिकारक केमिकल छोड़ सकते हैं। ऐसे में यह सेहत के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है।

नॉर्मल टेंपरेचर पर ही गर्म करें खाना

ऐसा तो सभी जानते हैं कि खाने को ज्यादा पकाने से पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं। ऐसे में यदि सही तापमान और सही समय तक खाने को गर्म किया जाए, तो इससे खाने को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता है। पौष्टिकता के लिहाज से यह सुरक्षित रहता है।

माइक्रोवेव में ज्यादा टाइम सेट कर खाना न करें गर्म

Heating food in a microwave can lead to serious diseases like cancer

माइक्रोवेव में खाने को ज्यादा समय तक भी गर्म नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह न सिर्फ खाने के टेस्ट को खराब करता है, बल्कि ओवन को भी खराब कर सकता है। दरअसल, ज्यादा देर तक खाना गर्म करने पर उसके पोषक तत्व भी खत्म हो जाते हैं।

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फॉयल पेपर में गर्म न करें खाना

बता दें कि ओवन में भूलकर भी एल्युमीनियन फॉयल पेपर नहीं रखना चाहिए। असल में, इससे माइक्रोवेव को तो नुकसान पहुंचता ही है, साथ ही सेहत के लिए भी यह सुरक्षित नहीं है। ऐसे में अगर आप ओवन में खाना गर्म कर रहे हैं, तो सिरेमिक या फिर कांच के बर्तनों का इस्तेमाल ही करें। माइक्रोवेव का सही से इस्तेमाल कर अपना और अपनों का ख्याल रखें।

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Mental Health: Excessive stress has a direct connection with your memory

Mental Health: आजकल हर किसी की जिंदगी में बस भागदौड़ है और किसी ना किसी बात को लेकर तनाव है। लगातार टेंशन और स्ट्रेस में रहने के कारण कई तरह की समस्याएं हो सकती है। किसी को ऑफिस का स्ट्रेस है तो किसी को घर का, हर इन्सान किसी ना किसी बात से तनावग्रस्त है। तनाव की वजह से सिर्फ मानसिक समस्याएं ही नहीं, बल्कि कई तरह की फिजिकल समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है। बता दें कि लंबे समय तक स्ट्रेस में रहना आपके दिमाग को प्रभावित कर सकता है।

डॉक्टर का कहना है कि जब आप टेंशन लेते हैं तो दिमाग से कॉर्टिसोल नाम का हार्मोन निकलता है जिसकी वजह से आपको अच्छा फील नहीं होता है। कभी कभी ऐसा होना नार्मल है लेकिन जब आप लंबे वक्त तक तनाव में रहते हैं तो दिमाग पर इसका विपरीत असर पड़ने लगता है। इसकी वजह से आपकी याददाश्त कमजोर होने लगती है और आप बातें भूलने लगते हैं।

तनाव दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?

Mental Health: Excessive stress has a direct connection with your memory

  • ज्यादा तनाव लेने से दिमाग का एक हिस्सा, हिप्पोकैम्पस, सिकुड़ जाता है। यह दिमाग का वह भाग है जहां मेमोरी होती है और जो सीखने से जुड़ा हुआ है। ज़्यादा टेंशन लेने से हमारा दिमाग़ सिर्फ थकता नहीं है, बल्कि इससे हमारी सोचने की क्षमता में भी गिरावट आ जाती है। हम अपने अंदर की क्रिएटिविटी खो देते हैं, हमें फैसले लेने में घबराहट होती है।
  • ज्यादा तनाव सेरोटोनिन और डोपामाइन के स्तर को, बिगाड़ देता है, जो दिमाग के लिए जरूरी है। इस कारण, चिंता, अवसाद और अनिद्रा की परेशानी हो सकती है।
  • ज्यादा तनाव के कारण कोर्टिसोल का स्तर बढ़ने से दिमाग और शरीर की सूजन को बढ़ जाती है, जो समय के साथ बढ़ सकती है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो अल्जाइमर या पार्किंसंस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
  • ज्यादा तनाव से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है। इसकी वजह से व्यक्ति चिड़चिड़ा, मूड स्विंग्स, अकेलापन और ओवर सेंसिटिविटी महसूस करता है।

दिमाग को तनाव से ऐसे बचाएं- 

  1. टाइम मैनेजमेंट करें – कामों की लिस्ट बनाकर प्रायोरिटी सेट करें।
  2. बॉडी को मूव करें – रोज़ाना 20–30 मिनट वॉक या एक्सरसाइज स्ट्रेस को घटाती है।
  3. नींद जरूरी है- रात में 7-8 घंटे की अच्छी नींद जरूर लें।
  4. सांस पर ध्यान दें – गहरी सांस लेने से दिमाग तुरंत रिलैक्स होता है।
  5. डिजिटल डिटॉक्स – थोड़ी देर मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर रहें।
  6. पॉजिटिव एक्टिविटी – म्यूजिक, पढ़ना, मेडिटेशन या हॉबी टेंशन घटाते हैं।
  7. लोगों से बात करें – अपनी फीलिंग्स शेयर करने से बोझ हल्का होता है।
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Women in 40: अनुभव और थकान से भरी एक ऐसी उम्र जब आप बहुत कुछ समझ चुकी होती हैं। लेकिन करने को अब भी बहुत कुछ शेष होता है। घर और बाहर की दुनिया की कई चुनौतियों को आप ने पार कर लिया है, मगर कामयाबी के कई सितारे अभी आपके कंधों पर सजने बाकी होते हैं। इस उम्र तक आते अधिकतर महिलाएं अपनी सेहत को सबसे निचले लेवल पर ला चुकी होती है। जबकि यह वही उम्र है जब आपको अपनी सेहत का सबसे अधिक ख्याल रखने की आवश्यकता होती है।

वजन, उम्र और पोजिशन कुछ ऐसी हो जाती है कि शारीरिक रूप से एक्टिव रहने का वक्त भी कम होता चला जाता है। जिसके कारण आप अपनी उम्र के पुरषों से ज्यादा बीमारियों के गिरफ्त में होते हो। अगर इन जोखिमों से बचकर, सफलता के साथ आगे बढ़ना है तो आपको खुद को शारीरिक रूप से सक्रिय रखने पर ध्यान देना होगा।

एक सीनियर साइकोलॉजिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट के मुताबिक देखने में भले ही यह सामान्य लगे लेकिन यह उम्र आपके मन के स्तर पर बहुत सारे बदलाव लेकर आती है और यह सब हॉर्मोन में हो रहे बदलाव की वजह से होता है। जो आपकी स्किन, पीरियड, मूड और वेट सभी कुछ प्रभावित करते हैं। इसलिए इस समय आपको अपना और ज्यादा ख्याल रखना जरूरी होता है।

महिलाओं में 40 की उम्र में होने वाली सबसे आम समस्याएं

1. हॉर्मोनल असंतुलन

ये उम्र उन हॉर्मोन में बदलाव की उम्र है, जो अभी तक आपके रिप्रोडक्टिव हेल्थ और बाहरी खूबसूरती के लिए जिम्मेदार थे। अनियमित माहवारी और त्वचा पर उग आने वाले बाल बताते हैं कि आपके हॉर्मोन असंतुलित हो रहे हैं। इस समय एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हॉर्मोन में गिरावट आने लगती है।

2. हेयर फॉल और स्किन में बदलाव

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एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन आपकी प्रजनन क्षमता के साथ-साथ आपके लुक को भी प्रभावित करते हैं। इनमें बाल पहले से हल्के और पतले होने लगते हैं, जबकि त्वचा में लोच और कसाव की कमी दिखाई देने लगती है। बालों का सफेद होना और त्वचा पर झुर्रियां उम्र के इसी पड़ाव पर नजर आने लगती है।

3. पाचन संबंधी समस्याएं

40 की उम्र की महिलाओं का पाचन तत्र पहले से धीमा हो जाता है, जिससे उन्हें पाचन संबंधी समस्याएं बहुत ज्यादा परेशान करने लगती हैं। अक्सर आपने महसूस किया होगा कि पहले आप जिन चीजों को बड़े दिलचस्पी के साथ खाती थीं, अब वही आपके पेट पर बोझ की तरह रहती है। अगर परहेज न किया जाए, तो गैस, एसिडिटी और बदहजमी जैसी समस्याएं इस समय ज्यादा होने लगती हैं।

4. वजन में इजाफा होना

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मेटाबॉलिज्म धीमा होने और हॉर्मोन असंतुलन होने की वजह से महिलाओं को इस उम्र में पेट के पास चर्बी बढ़ने लगती है। इस समय वजन बढ़ना जितना आसान होता है, उसे नियंत्रित करना उतना ही मुश्किल हो जाता है।

5. कमजोर होने लगती हैं हड्डियां

हालांकि 30 के बाद से ही महिलाओं की बोन डेंसिटी कम होने लगती है, इसलिए उन्हें केल्शियम पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है। मगर 40 की उम्र पार करते एस्ट्रोजन की कमी के कारण ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिए केल्शियम के साथ-साथ आपको विटामिन-D का लेवल भी चेक करते रहने की जरूरत होती है।

6 मूड स्विंग्स

हॉर्मोन सिर्फ आपकी प्रजनन क्षमता को ही नहीं, बल्कि आपके मूड को भी प्रभावित करते हैं। हॉर्मोनल असंतुलन के कारण इस समय आपको ज्यादा गुस्सा आ सकता है। ज्यादातर महिलाओं के परिवार में यह शिकायत आती है कि वे बहुत चिड़चिड़ी और गुस्सैल हो गई हैं। यह पेरिमेनोपॉज का भी एक संकेत हो सकता है। जब आपको हॉट फ्लैश और मूड स्विंग्स का सामना करना पड़ता है।

इस उम्र में कैसे रहा जाए फिट और हेल्दी

डॉक्टर के अनुसार 40 की उम्र में सक्रिय रहने के लिए तनाव को संतुलित करना, अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखना और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का दृष्टिकोण रखना आवश्यक है। तनाव ऊर्जा को समाप्त करने वाले प्रमुख कारणों में से एक है, इसलिए इसे प्रभावी ढंग से प्रबंधित रहना बेहद जरूरी है।

1. टेंशन देने वाले कारकों की पहचान करें

सबसे पहले, अपने जीवन में मौजूद तनाव के कारणों की पहचान करें, यानी यह जानें कि तनाव व्यवसायिक, व्यक्तिगत, वित्तीय या सामाजिक जीवन से आ रहा है। तनाव प्रबंधन पर सक्रिय रूप से काम करें और जरूरत पड़ने पर किसी जानकार से मार्गदर्शन लें। जितनी जल्दी कोई व्यक्ति अपने तनाव को पहचानकर किसी विशेषज्ञ से सलाह लेता है, उतने ही ज्यादा अवसर होते हैं कि वह अपने 40 के दशक में सक्रिय और ऊर्जावान रह सके। इसके साथ ही, उचित नींद लेना भी जरूरी है। अच्छी गुणवत्ता वाली नींद हमारे शरीर और दिमाग को ऊर्जावान बनाने के लिए जरूरी होती है।

2. खूब सारा पानी पीएं

हाइड्रेशन भी एक महत्वपूर्ण कारक है। पर्याप्त मात्रा में तरल पेय पीना और आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार लेना बहुत जरूरी है। इसके अतिरिक्त, संगीत सुनना, किताबें पढ़ना या रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होना मन और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बना सकता है।

3. चाय-कॉफी कम कर दें

हो सकता है कि सुबह की पहली कॉफी या चाय आपको दिन के लिए तैयार करती हो, मगर यह आपको डिहाइड्रेट भी करती है। इसलिए इन्हें कम करने और धीरे-धीरे छोड़ने की ओर ध्यान दें। साथ ही, निकोटीन, शराब या किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहना अत्यंत आवश्यक है।

4. हर रोज़ एक्सरसाइज करें

यह आपके लिए सबसे जरूरी एक्टिविटी है। डांस, जुंबा, एरोबिक्स, साइकलिंग, कार्डियो जो भी आपको पसंद है, उसकी मदद से खुद को एक्टिव रखें। हर दिन कम से कम 45 मिनट और सप्ताह में पांच दिन आपका फिजिकल एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है। इससे मेटाबॉलिज्म ठीक रहता है, वजन नियंत्रित रहता है और आपका मूड भी अच्छा रहता है और आप कम बीमार पड़ती हैं।

डॉक्टर का कहना है कि साल में कम से कम एक बार संपूर्ण स्वास्थ्य जांच कराना चाहिए। ये सुझाव किसी भी व्यक्ति को उनके 40 के दशक में सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद पहुंचा सकता है।

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How can you take care of your wife or girlfriend during periods?

Period के समय महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव देखने के मिलते हैं। यूट्रस कॉन्ट्रैक्ट के कारण जहां जांघों और कमर में दर्द बना रहता है। वहीं, हार्मोनल बदलाव मूड स्विंग की समस्या को बढ़ा देते हैं। ऐसे में अपने खानपान का ध्यान रखने के अलावा शरीर को गर्माहट प्रदान करने के लिए चाय का सेवन करती हैं। हालांकि इससे मांसपेशियों में उठने वाले दर्द कम होने लगता है। लेकिन कई बार चाय का सेवन हेल्थ को नुकसान पहुंचा सकता है। आइये जानते हैं पीरियड के दौरान चाय पीना हेल्थ के लिए कितना फायदेमंद है?

डायटीशियन के अनुसार पीरियड साइकल के दौरान महिलाओं को चाय का सेवन करने से पेट के निचले हिस्से में होने वाले दर्द से राहत मि्यालती है। असल में शरीर का तापमान को बैलेंस रखने वाली चाय से मसल्स कान्ट्रेक्शन को कम किया जा सकता है। मगर ज्यादा मात्रा में इसका सेवन करने से पेट में एसिडिटी, ब्लोटिंग और अपच का सामना करना पड़ता है। अलावा इसके ड्यूरिटिक प्रभाव होने के कारण फ्रीक्वेंट यूरिनेशन का भी सामना करना पड़ता है।

ज्यादा चाय किस तरह हेल्थ को पहुंचाता है नुकसान

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अध्ययन के मुताबिक पीरियड के दौरान चाय पीने से कैटेचिन और टैनिक एसिड की मात्रा शरीर में बढ़ जाती है जो आयरन के एबजॉर्बशन को कम करता है। इस तरह आयरन के अवशोषण में रुकावट डालने का कार्य करते हैं। ऐसे में ज्यादा चाय पीने से बचना चाहिए।

पीरियड में चाय पीने से क्या होता है-

1. यूरीन के लिए बार बार जाना

चाय में कैफीन की उच्च मात्रा पाई जाती है, जिससे उसका प्रभाव डयूरिटक होने लगता है और बॉडी में वॉटर एक्सक्रीशन की समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसके कारण फ्रीक्वेंट यूरिनेशन का सामना करना पड़ता है, जो पीरियड के दौरान परेशानी का सबब बनती है।

2. नींद में कमी आना

When there is a delay in periods, apart from pregnancy

चाय का सेवन करने से ब्रेन एक्टिव हो जाता है, जिससे अनिद्रा की समस्या बढ़ने लगती है। पीरियड साइकल के दौरान महिलाओं को क्रैम्प की शिकायत बढ़ जाती है। ऐसे में शरीर को आराम पहुंचाने के लिए हेल्दी नैप्स और भरपूर नींद की जरूरत होती है। ज्यादा चाय का सेवन नींद में बाधा उत्पन्न करने लगता है।

3. ब्लोटिंग को बढ़ाती है चाय

अधिक मात्रा में चाय का सेवन करने से गट मोटिलिटी का सामना करना पड़ता है। इसके कारण पेट फूलने लगता है और असुविधा बढ़ने लगती है। इससे वॉटर रिटेंशन का भी सामना करना पड़ता है। पीरियड के दौरान चाय पीने से ब्लोटिंग और अपच का सामना करना पड़ता है।

4. पीरियड हो सकते हैं हैवी

Say goodbye to heavy bleeding by adopting these tips during periods

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के मुताबिक कैफीन से शरीर में एस्ट्रोजन का उत्पादन बढ़ने लगता है। इससे हार्मोन असंतुलन बढ़ने लगता है। इससे प्रीमेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम, हैवी पीरियड और ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम बढ़ने लगता है। दरअसल, कैफीन एरोमाटेज एंजाइम को बाधित करने लगता है, जो एंड्रोजन को एस्ट्रोजन में परिवर्तित करने का काम करता है।

5. शरीर में पानी की कमी

ब्लीडिंग के कारण शरीर में फ्लूइड का लेवल कम होने लगता है। ऐसे में चाय का सेवन करने से यूरिनेशन बढ़ जाता है। इसके वजह से पानी की कमी शरीर में बढ़ने लगती है, जिसके कारण घबराहट, सिरदर्द और थकान का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे में चाय को पानी या फिर लेमन व ग्रीन टी से रिप्लेस कर सकते हैं।