
Benefits of coconut water: गर्मी के दिनों में राहत पाने के लिए अगर आप दिन का आगाज किसी हाइड्रेटेड ड्रिंक जैसे नारियल पानी के साथ करते हैं तो ये सेहत के मद्देनजर काफी फायदेमंद सौदा साबित होता है। बता दें कि पोषक तत्वों से भरपूर ये ड्रिंक हेल्थ के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। इससे न सिर्फ एंटीऑक्सीडेंट हासिल होती है बल्कि स्किन का लचीलापन भी बना रहता है। साथ ही फाइबर से भरपूर होने के कारण वेटलॉस में भी मददगार साबित होता है। अगर आप डेली सुबह खाली पेट नारियल पानी का इस्तेमाल करती हैं, तो इससे शरीर स्वस्थ और फ्रेस बना रहता है। जानते हैं नारियल पानी को सुबह खाली पेट पीने के अहम फायदे-
नारियल पानी है शरीर के लिए फायदेमंद-
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार नारियल पानी में 94 फीसदी पानी होता है और लो फैट्स पाए जाते है। इसके अलावा कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और पोटैशियम की मात्रा पाई जाती है। इससे शरीर में बढ़ने वाले ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करके फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से बचाया जा सकता है।
इस बारे में डायटीशियन डॉ अदिति शर्मा बताती हैं कि नारियल पानी एक बेहतरीन हाइड्रेटिंग पेय पदार्थ है। इसके सेवन से इलेक्ट्रोलाइट्स की भरपूर मात्रा पाई जाती है और दिनभर ऊर्जा का स्तर बना रहता है। इसके नियमित सेवन से शरीर को डिटॉक्स करने और त्वचा में नमी को रीस्टोर करने में भी मदद मिलती है।
नारियल पानी खाली पेट पीने के लाभ
1. वेटलॉस में अहम रोल
इस लो कैलोरी पेय पदार्थ की मदद से शरीर में जमा कैलोरी़ज़ को बर्न करने में मदद मिलती है। वे लोग जो दिन की शुरूआत चाय या कॉफी से करते हैं, तो वे इस हाइड्रेटिंग और कूलिंग ड्रिंक्स से दिन की शुरूआत कर सकते है। इससे शरीर में कैलेरी स्टोरेज को रोककर वेट लॉस जर्नी को हेल्दी बनाया जा सकता है।
2. स्किन सेल्स को करता है बूस्ट
सुबह खाली पेट नारियल पानी का सेवन करने से एंटीऑक्सीडेंट की प्राप्ति होती है। इससे शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद मिलती है, जिससे त्वचा पर बढ़ने वाली महीन रेखाओं और झुर्रियों से राहत मिलती है। इससे स्किन इलास्टीसिटी बनी रहती है और त्वचा का ग्लो बढ़ने लगता है।
3. ओवरइटिंग को कहे ना
ज्यादातर लोगों को बार बार भूख लगने की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसे में भूख को नियंत्रित करने के लिए नारियल पानी एक बेहतरीन विकल्प है। विटामिन और मिनरल से भरपूर इस पेय पदार्थ से शरीर को फाइबर की प्राप्ति होती है, जिससे भूख को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही शरीर हेल्दी रहता है।
4. डाइजेशन को करे बूस्ट
पाचन संबधी समस्याओं को हल करने के लिए नारियल पानी की मदद ली जा सकती है। इससे ब्लोटिंग, अपच, सूजन और एसिडिटी जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है। नियमित रूप से इसका सेवन इनडाइजेशन से राहत दिलाता है और शरीर को सक्रिय बनाए रखने में मदद करता है।
5. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार
नारियल पानी का सेवन करने से शरीर को विटामिन C की प्राप्ति होती है, जिससे शरीर को संक्रमण और कई तरह की बीमारियों से लड़ने में मदद मिलती है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और एंटी माइक्रोबियल गुण शरीर को स्वस्थ रखते हैं और पोषक तत्वों के अवशोषण को भी बढ़ाते हैं।
6. शरीर को रखे हाइड्रेट
डेली नारियल पानी का सेवन करने से से शरीर हाइड्रेट रहता है। इसमें मौजूद पोटेशियम, सोडियम और मैग्नीशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स शरीर को हाइड्रेट रखते हैं। इससे ओवरऑल हेल्थ को फायदा मिलता है और शरीर में निर्जलीकरण की समस्या हल हो जाती है।
7. ब्लड शुगर को करे कंट्रोल
नारियल का पानी ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसमें पाए जाने वाले बायोएक्टिव एंजाइम रक्त शर्करा के स्तर को कम करने और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करने में मदद करते हैं। सुबह खाली पेट नारियल पानी का सेवन शुगर स्वाइक के खतरे को कम करता है।
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Body Science: क्या आपको मालूम है कि इंसान के बॉडी में कुछ ऐसे अहम अंग हैं जो एक बार डैमेज हो जाए तो दोबारा से नहीं बन सकते। काम चलाने के लिए कोई दूसरा रास्ता अपना सकते हैं पर ठीक वैसे ही अंग नहीं बन सकते। कभी कभी स्थिति बिगड़ने पर इंसान की मौत भी हो सकती है। ऐसे एक नहीं बल्कि कई अंग हैं, आइये इसके बारे में जानते हैं-
बॉडी में बाहर से त्वचा में किसी भी तरह की खरोंच लग जाए तो यह दोबारा से रिपेयर हो सकती है लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि शरीर में ऐसे कई अंग हैं जो एक बार डैमेज हो जाए तो यह कभी पूरी तरह से ठीक नहीं होंगे। चाहे इसके लिए आप कोई भी मेडिसीन क्यों न खा लें, हालांकि हमारे बॉडी में ऐसे भी अंग हैं जो कितनी भी ज्यादा खराब क्यों न हो जाए यह स्वयं को दोबारा से रिजैनरेट कर लेता है।
शरीर में खुद को ठीक करने और टिशूज को मरम्मत करने की क्षमता होती है। लिवर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लिवर अपने हिस्से का अगर 05 फीसदी भी बचा है तो खुद ही बन सकता है, कुछ अपवादों को छोड़कर लेकिन दिमाग की कोशिकाएं अगर एक बार मर जाए तो वहां उसकी जगह दूसरी कोशिकाएं नहीं बन सकती है। इस तरह इंसान कोमा में चला जाता है या ब्रेन डेड हो जाता है। हम यहां ऐसे ही कुछ अंगों के बारे में बताएंगे जो दोबारा से रीजैनरेट नहीं हो सकते, इसलिए ये आज भी विज्ञान के सामने चुनौती बने हुए हैं।
हार्ट की मांसपेशियां
हार्ट हमारे शरीर में एक ही है जो पूरे शरीर में खून को पंप करता है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि हार्ट की मांसपेशीय कोशिकाएं जिसे कार्डियोमायोसाइट्स कहा जाता है, एक बार मर जाए तो यह दोबारा से रीजेनरेट नहीं हो सकता है। आप कहेंगे कि फिर इन्सान जिंदा कैसे रहता है। तो इसका जवाब है कि वह अंग जिंदगी भर के लिए कमजोर हो जाता है और उसकी जगह स्कार सेल्स यानी घाव के निशान वाली कोशिकाएं ले लेती है जो हमेशा दोयम दर्जे की ही होती है। इसकी वजह यह है कि जन्म के तुरंत बाद कार्डियोमायोसाइट्स अपनी वृद्धि बंद कर देती हैं और परमानेंट स्टेज में चली जाती हैं। सेल साइकिल स्थायी रूप से रुक जाता है जिससे नई कोशिकाएं नहीं बन पाती है।
एक्सपर्ट कहते हैं कि एक बार जब हार्ट अटैक हो जाए तो यह कार्डियोमायोसाइट्स को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाते हैं। इससे इसकी कई कोशिकाएं मर जाती है। इसकी जगह फाइब्रस स्कार टिशू भर जाते हैं लेकिन वे कभी भी हेल्दी टिशूज नहीं बनते इस कारण हार्ट को पंप करने की क्षमता में स्थायी नुकसान उठाना पड़ता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दिल पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकता। सही इलाज, कार्डियक रिहैबिलिटेशन और दवाइयां बचे हुए हार्ट की मांसपेशियों की सुरक्षा करने में सक्षम है लेकिन पहले जैसा कभी नहीं हो सकता है। इसलिए हार्ट की मांसपेशियों के बड़े हिस्से को दोबारा बनाना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
ब्रेन सेल्स रीढ़ की हड्डी का नर्व
ब्रेन सेल्स जिसे न्यूरॉन्स कहा जाता है और रीढ़ की हड्डी के नर्व्स भी अगर एक बार डैमेज हो जाए तो ये दोबारा नहीं बनते। हमारे शरीर के न्यूरॉन्स अत्यधिक विशिष्ट कोशिकाएं हैं। ये विकास के शुरुआती चरण के बाद कोशिका विभाजन की क्षमता पूरी तरह खो देती हैं। इसलिए जब एक बार डैमेज हो जाए तो नई कोशिकाएं नहीं बन पाती हैं। इसी तरह रीढ़ की हड्डी में नर्व्स कोशिकाएं होती हैं जो ब्रेन से संदेशों का आदान-प्रदान करती हैं। यह भी दोबारा नहीं बनती। चोट वाली जगह पर फाइब्रस स्कार टिश्यू बन जाता है, जो नए कनेक्शन बनने के रास्ता को ही रोक देता है। इसलिए ब्रेन और रीढ़ की हड्डी यानी स्पाइनल कॉर्ड को ठीक करना बेहद कठिन चुनौती है। इसे रेगुलर देखभाल और कई तरह के आधुनिक थेरेपी के माध्यम से थोड़ा बहुत मैनेज किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है।
एक्सपर्ट का कहना है कि न्यूरॉन्स में रीजनरेट होने की क्षमता बहुत सीमित होती है। यही वजह है कि एक बार जब उसमें चोट लग जाए तो उसमें स्थायी समस्याएं होने की आशंका रहती है। इसलिए मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी की चोट के बाद ठीक होने का मतलब यह नहीं होता कि टिश्यू दोबारा से बन जाए। इसे रिहैबिलिटेशन और आधुनिक थेरेपी के माध्यम से तंत्रिका तंत्र को ढलने और नए रास्ते बनाने में मदद मिल सकता है, भले ही मूल क्षतिग्रस्त रास्ते दोबारा न उग सकें।
कार्टिलेज का भी बनना मुश्किल
कार्टिलेज हमारे शरीर में मौजूद एक मजबूत लेकिन रबर जैसा लचीला कनेक्टिव टिश्यू है। कार्टिलेज हड्डियों से ज्यादा नरम लेकिन मांसपेशियों से ज्यादा सख्त होता है। यह जोड़ों यानी घुटने, कोहनी, कानों, नाक और रीढ़ की हड्डी में पाया जाता है। इसका काम दो हड्डियों के बीच कुशन यानी गद्दी की तरह सपोर्ट करने का है ताकि हड्डियां आपस में रगड़ नहीं खाए। यह चलने-फिरने, कूदने या झटके लगने पर हड्डियों को आपस में टकराने और घिसने से बचाता है। यह नाक और कान जैसे अंगों को एक निश्चित ढांचा और लचीलापन प्रदान करता है। अगर कार्टिलेज भी एक बार खत्म हो जाए तो यह भी दोबारा से नहीं बनते। इसका निर्माण प्रक्रिया बेहद अनोखा है। कार्टिलेज तक पोषक तत्वों को पहुंचाने के लिए डायरेक्ट ब्लड वैसल्स का नेटवर्क जुड़ा नहीं होत है। ऐसे में कार्टिलेज का पोषण डिफ्यूजन प्रोसेस से होता है यानी दूर से ब्लड वैसल्स प्रेशर के माध्यम से यहां पोषक तत्व भेजता है और वहां से इसी तरह आर्टरीज में अपशिष्ट पदार्थ बाहर होता है।
विशेषज्ञ का कहना है कि टिश्यू में पर्याप्त ब्लड सप्लाई न होने के कारण कुछ प्रकार के कार्टिलेज में ठीक होने की क्षमता बहुत कम होती है। इसलिए कार्टिलेज का नुकसान बहुत धीरे-धीरे ठीक होता है और कभी-कभी यह शरीर के संबंधित अंगों में लगातार बनी रहने वाली समस्याओं का कारण बन सकता है। यही एक कारण है कि ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी स्थितियों से जुड़ा कार्टिलेज का नुकसान स्थायी नुकसान बन जाता है।
कुछ और भी ऐसे अंग हैं जो दोबारा नहीं बनते
हार्ट की पेशीय कोशिका, कार्टिलेज, ब्रेन सेल्स, रीढ़ की हड्डी के नर्व्स के अलावा बहुत सारी हड्डियां, किडनी के नेफ्रॉन्स, फेफड़ों के एल्वियोली और आंखों की ऑप्टिक नर्व जैसे अंगों में टिशूज को दोबारा से रीजैनरेट नहीं किया जा सकता है। इन अंगों में एक बार स्थायी नुकसान होने के बाद केवल बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। उस अंग को पुरानी स्थिति में वापस नहीं लाया जा सकता।
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Breast Feeding's Importance: महिलाओं को कहा जाता है कि बच्चे को जन्म के 06 महीने तक मां का दूध पिलाना बहुत आवश्यक होता है। तो क्या उसके बाद बच्चे के लिए मां के दूध का महत्व नहीं रहता है? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिस लगभग 06 महीने तक सिर्फ स्तनपान और उसके बाद पूरक आहार के साथ 02 साल या उससे ज्यादा वक्त तक स्तनपान कराने की सलाह देते हैं।
बच्चे की जिंदगी के शुरुआती 02 साल शारीरिक विकास, दिमाग के विकास और इम्यून सिस्टम के लिए बेहद अहम होते हैं। ऐसे में मां का दूध इस पूरे समय बच्चे के पोषण और संक्रमण से बचाव में योगदान देता रहता है। आइए हम डॉक्टर से जानते हैं कि ब्रेस्टफीटिंग कैसे बच्चे की सेहत को जिंदगी भर के लिए बेहतर बनाती है।
बच्चे के लिए ब्रेस्टफीडिंग कितना अहम
डॉक्टर बताते हैं कि बच्चे की जिंदगी के शुरुआती 1000 दिन, यानी गर्भधारण से लेकर दो साल की उम्र तक का समय, उसके विकास और बढ़ने के लिए बहुत अहम होता है। इस दौरान दिमाग तेजी से विकसित होता है, शरीर के अंग मैच्योर होते हैं और इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है।
अच्छे पोषण का बच्चे की शारीरिक सेहत, सीखने की क्षमता और कुल मिलाकर उसकी भलाई पर बहुत बडा असर पड़ता है। ब्रेस्टफीडिंग से बच्चे को जरूरी पोषण मिलता है। मां का दूध बच्चों को संक्रमण से बचाता है और उनके हेल्दी डेवलपमेंट में मदद करता है।
क्या 6 महीने के बाद मां का दूध खराब हो जाता है?
डॉक्टर कहते हैं, “देखें, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। 6 महीने पूरे होने के बाद बच्चे की पोषण संबंधी जरूरतें बढ़ने लगती हैं। इसलिए इस उम्र में सिर्फ स्तनपान से बच्चे का पेट नहीं भर पाता है। बच्चे को उम्र के अनुसार सुरक्षित व पौष्टिक आहार देना जरूरी हो जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मां के दूध की जरूरत खत्म हो गई।
WHO के अनुसार, 6 से 12 महीने के बीच मां का दूध बच्चे की ऊर्जा संबंधी जरूरतों का आधा या उससे अधिक हिस्सा पूरा कर सकता है। 12 से 24 महीने की उम्र में भी यह औसतन करीब एक-तिहाई ऊर्जा की जरूरत पूरी कर सकता है। यानी 6 महीने के बाद स्तनपान खाने का विकल्प नहीं, बल्कि पौष्टिक आहार के साथ एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ब्रेस्टफीडिंग से बच्चे के शरीर को कैसे फायदा होता है?
डॉक्टर बताते हैं कि ब्रेस्टफीडिंग में प्रोटीन, हेल्दी फैट, विटामिन, मिनरल और एंटीबॉडी का सही संतुलन होता है, जिनकी बढ़ते बच्चे को जरूरत होती है। जो बच्चे ब्रेस्टफीडिंग करते हैं, उनमें डायरिया, कान के संक्रमण और सांस की बीमारियों का जोखिम कम हो सकता है। DHA और अन्य हेल्दी फैट जैसे जरूरी पोषक तत्व दिमाग और नर्वस सिस्टम के विकास में मदद करते हैं, जिससे आगे चलकर सीखने और सोचने-समझने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
ब्रेस्टफीडिंग करवाने से कई बीमारियों से बचता है बच्चा
डॉक्टर बंसल बताते हैं कि ब्रेस्टफीडिंग बच्चों की सेहत के लिए जरूरी है और यह बच्चों के बड़े होने पर मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और कुछ तरह की एलर्जी के जोखिम को कम करने में भी मदद करती है। यह बचपन में वजन को सही ढंग से बढने में मदद करती है और खाने की अच्छी आदतें विकसित करने में मदद करती है।
ब्रेस्टफीडिंग कराने से माताओं को क्या फायदे होते हैं?
ब्रेस्टफीडिंग माताओं के लिए भी फायदेमंद है। यह बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय को उसके सामान्य आकार में वापस लाने में मदद करती है, डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग कम करती है और ब्रेस्ट व ओवेरियन कैंसर के जोखिम को कम कर सकती है। ब्रेस्टफीडिंग त्वचा से त्वचा के करीबी संपर्क के जरिए बच्चे के साथ एक मजबूत भावनात्मक जुड़ाव बनाती है।
सफल ब्रेस्टफीडिंग के लिए खास टिप्स
जब भी संभव हो, जन्म के पहले घंटे के भीतर ब्रेस्टफीडिंग शुरू करें और डॉक्टर की सलाह के बिना इसे बंद न करें। शुरुआती छह महीनों तक सिर्फ स्तनपान कराएं और डॉक्टर की सलाह के बिना पानी या कोई और खाना न दें। पर्याप्त मात्रा में दूध बनने में मदद के लिए संतुलित आहार लें।
किसी सख्त रूटीन का पालन करने के बजाय, जब भी बच्चा भूख के संकेत दे, उसे जरूर खिलाएं। दूध बनने में मदद के लिए संतुलित आहार लें, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ पिएं और भरपूर आराम करें। अगर स्तनपान में कोई परेशानी आए, तो डॉक्टर या लैक्टेशन कंसल्टेंट से मदद लें। इसलिए, इन सुझावों का पालन करें और बच्चे को सही तरीके से स्तनपान कराना सुनिश्चित करें।

PCOS यानी पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (Polycystic ovary syndrome) महिलाओं को होने वाला एक एंडोक्राइन और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है। यह डिजीज महिलाओं को रजोनिवृत्ति से ठीक पहले के समय (प्रीमेनोपॉजल) होता है। पीसीओएस में महिलाओं के शरीर में असाधारण मात्रा में एंड्रोजन हार्मोन बनने लगता है। एंड्रोजन पुरुष हार्मोन होता है और बहुत ही कम मात्रा में महिलाओं के शरीर में पाया जाता है। पीसीओएस में एंड्रोजन बढ़ने के साथ-साथ मासिक धर्म अनियमित होना और अंडाशय पर छोटी-छोटी सिस्ट (अल्सर जैसी संरचनाएं) बनने लग जाती हैं। ओव्यूलेशन (डिंबोत्सर्जन) तब होता है, जब अंडाशय से अंडा इस प्रकार निकले की शुक्राणु उसे फर्टिलाइज कर ले। पीसीओएस से ग्रस्त महिलाओं ओव्यूलेशन के लिए जरूरी हार्मोन पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता है। ऐसी स्थिति में जब ओव्यूलेशन हो नहीं पाता है, तो अंडाशय पर छोटी-छोटी सिस्ट बनने लगती हैं। ये सिस्ट ज्यादा मात्रा में एंड्रोजन बनाती हैं, जो महिलाओं को मासिक धर्म को अनियमित करने के साथ-साथ पीसीओएस से संबंधित कई लक्षण पैदा कर देता है।
पीसीओएस के प्रकार
रॉटरडैम क्राइटेरिया के अनुसार पीसीओएस के 4 अलग-अलग प्रकार हैं -
क्लासिक पॉलिसिस्टिक ओवरी पीसीओएस - इसमें लंबे समय तक ओव्यूलेशन नहीं होता है और ओवरी में सिस्ट बनने के साथ-साथ एंड्रोजन का स्तर भी बढ़ जाता है। जिन महिलाओं को पीसीओएस का यह प्रकार होता है उनमें मेटाबॉलिक व हृदय संबंधी बीमारियां होने का काफी खतरा रहता है।
क्लासिक नोन-पॉलिसिस्टिक ओवरी पीसीओएस - इसमें ओव्यूलेशन कम होता है और एंड्रोजन का स्तर बढ़ा हुआ होता है। हालांकि, इसमें ओवरी सामान्य रहती हैं।
नोन-क्लासिक ओव्यूलेटरी पीसीओएस - इसमें ओव्यूलेशन भी होता है और मासिक धर्म भी नियमित रहते हैं। लेकिन इस दौरान एंड्रोजन का स्तर बढ़ जाता है और ओवरी पर सिस्ट भी बन जाती हैं।
नोन-क्लासिक माइल्ड पीसीओएस - पीसीओएस के इस प्रकार के ओव्यूलेशन कम हो जाता है और ओवरी पर सिस्ट भी बन जाती हैं।
पीसीओएस के लक्षण
पीसीओएस ऐसा रोग है जिसके कारण कई अन्य रोग भी विकसित हो सकते हैं। पीसीओएस से प्रमुख रूप से तीन समस्याएं जुड़ी होती हैं और वे हैं मासिक धर्म में अनियमितता, एंड्रोजन का स्तर बढ़ना और अंडाशय में सिस्ट बनना। रॉटरडैम के क्राइटेरिया के अनुसार यदि किसी महिला को इन तीन लक्षणों में से कोई दो महसूस हो रहे हैं, तो वह पीसीओएस से ग्रस्त है। हालांकि, पीसीओएस से होने वाले संकेत व लक्षण ग्रसित महिला की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। पीसीओएस से आमतौर पर देखे जाने वाले लक्षणों में निम्न को भी शामिल किया जा सकता है -
इनफर्टिलिटी (बांझपन)
मोटापा बढ़ना
चेहरे, छाती और पेट पर अधिक बाल उगना
ऑयली स्किन और मुंहासे होना
पीसीओएस के कारण
पीसीओएस के सटीक कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। हालांकि, यह अनुवांशिक, वातावरणीय और पारिवारिक स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। निम्न स्थितियां पीसीओएस का कारण बन सकती हैं -
वातावरणीय कारक- इन स्थितियों में संतुलित आहार न ले पाने के कारण और पर्याप्त शारीरिक गतिविधियां न कर पाने के कारण मोटापा बढ़ने लगता है। शरीर का वजन बढ़ना पीसीओएस समस्या से जुड़ा होता है। हालांकि, सामान्य वजन वाली कुछ महिलाओं को भी पीसीओएस हो सकता है। अलावा इसके किसी संक्रामक या विषाक्त चीज के संपर्क में आना भी वातावरणीय कारक के रूप में पीसीओएस का कारण बन सकता है।
पारिवारिक समस्या - जिन महिलाओं के परिवार में पहले किसी को पीसीओएस या टाइप 02 डायबिटीज हो चुका है, तो ऐसे में उन्हें भी पीसीओएस होने का खतरा बढ़ जाता है। किसी महिला में पीसीओएस के लक्षण कितने गंभीर हो सकते हैं, यह भी उसकी फैमिली हिस्ट्री पर निर्भर कर सकता है।
इंसुलिन रेजिस्टेंस - जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन पर प्रतिक्रिया न दे पाएं, तो शरीर अधिक मात्रा में इंसुलिन बनने लगता है। इस प्रकार शरीर में इंसुलिन का स्तर सामान्य न होना, एंड्रोजन का स्तर बढ़ने का कारण बन सकता है। जीवनशैली से जुड़ी खराब आदतें जैसे पौष्टिक व संतुलित आहार न लेना और शारीरिक गतिविधियां न करना भी इंसुलिन रेजिस्टेंस का कारण बन सकता है। इस कारण से भी महिलाओं का वजन बढ़ने लगता है और पीसीओएस के लक्षण गंभीर हो जाते हैं।
जोखिम कारक
पीसीओएस सिर्फ प्रजनन प्रणाली को नहीं बल्कि शरीर के अन्य हिस्सों को भी प्रभावित करता है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ा देता है, जिससे जीवन भर समस्याएं हो सकती हैं। पीसीओएस के प्रमुख जोखिम कारकों में निम्न शामिल हैं -
मां या बहन को पहले से ही पीसीओएस होना
इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या होना
गर्भाशय की मोटाई बढ़ने के कारण एंडोमेट्रियल कैंसर होने का खतरा बढ़ना
स्लीप एपनिया और डिप्रेशन जैसी समस्याएं होना।
पीसीओएस की रोकथाम
पीसीओएस आमतौर पर प्यूबर्टी के दौरान विकसित होता है, जिसके कारण वयस्क होने पर डायबिटीज और बांझपन की समस्याएं होने लगती हैं। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए समय रहते ही पीसीओएस की रोकथाम करना बेहद जरूरी है।
जो महिलाएं मोटापे से ग्रस्त है उन्हें अपने वजन को कम करने के लिए उपयुक्त उपाय करने चाहिए, जिससे पीसीओएस की गंभीरता को कम करने में भी मदद मिलेगी।
इंसुलिन और एंड्रोजन लेवल के स्तर पर नजर रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि ये पीसीओएस विकसित होने का कारण बन सकते हैं।
पीसीओएस का निदान
पीसीओएस में होने वाले लक्षण आमतौर पर अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं में भी हो सकते हैं। पीसीओएस की गंभीरता और उसके प्रकार का पता लगाने के लिए उचित निदान करना जरूरी होता है। पीसीओएस का निदान करने के लिए डॉक्टर मरीज की शारीरिक जांच करते हैं और साथ ही उनके स्वास्थ्य से जुड़ी पिछली जानकारियां (मेडिकल हिस्ट्री) भी लेते हैं। इसके बाद कुछ अन्य टेस्ट भी किए जाते हैं, जिनकी मदद से पीसीओएस की पुष्टि की जाती है, जैसे -
अल्ट्रासाउंड या पेल्विक एग्जाम
ब्लड टेस्ट
पीसीओएस का इलाज
पीसीओएस से होने वाली समस्याओं को ठीक करने के कई इलाज उपलब्ध हैं। पीसीओएस का इलाज आमतौर पर हर महिला को महसूस हो रहे लक्षणों, स्वास्थ्य स्थिति और वह गर्भधारण करना चाहती है या नहीं आदि के आधार पर किया जाता है।
महिला अगर गर्भधारण करना चाहती है -
जीवनशैली में बदलाव - महिला की डाइट में विशेष बदलाव किए जाते हैं और साथ ही उसे व्यायाम आदि भी करने को कहा जाता है, ताकि उसके शारीरिक वजन को नियंत्रित किया जा सके।
फर्टिलिटी की दवाएं - इस दौरान कुछ इंजेक्शन व खाने की दवाएं दी जाती हैं, जो ओवरी को अंडे निकालने में मदद करती हैं। हालांकि, इन दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं जैसे जुड़ा बच्चे होना या फिर पेल्विक में दर्द होना आदि।
यदि महिला गर्भधारण नहीं करना चाहती है -
गर्भ निरोधक गोलियां - ये दवाएं गर्भधारण रोकने के साथ-साथ मासिक धर्म को नियंत्रित करने, एंड्रोजन लेवल को कम करने, मुंहासे दूर करने और बालों के उगने की समस्या को नियंत्रित करने में भी मदद करती हैं।
डायबिटीज की दवाएं - यदि महिला को डायबिटीज है, तो उसके लिए इन दवाओं को का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, यदि महिला को डायबिटीज नहीं है, तो भी इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित करने के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। डायबिटीज की दवाएं आमतौर पर मोटापे से ग्रस्त महिलाओं को भी दी जा सकती हैं, जो शरीर का वजन कम करने और असामान्य रूप से उग रहे बालों को नियंत्रित करने में भी मदद करती है।
सप्लीमेंट्री दवाएं - इन दवाओं की मदद से भी पीसीओएस से ग्रसित महिलाओं में मोटापा, बालों का असामान्य रूप से उगना और अन्य समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
अलावा इसके अगर दवाओं व अन्य इलाज विकल्पों से स्थिति को नियंत्रित नहीं किया जा रहा है, तो सर्जरी भी की जा सकती है। हालांकि, अगर सर्जरी से भी इलाज संभव नहीं है तो असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) जिसकी मदद से फर्टिलिटी का इलाज किया जाता है। इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) सबसे आम प्रकार की एआरटी थेरेपी है।
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Micro Walk:
हमारे साथ रहने वाले ऐसे कई लोग करीब 10 घंटे लगातार कंप्यूटर या लौपटॉप पर अपना कार्य करते हैं। ऐसे में जब एक्सरसाइज की बात आती है तो सबसे पहले जुबान पर एक ही पंक्ति आती है, समय नहीं है पर क्या आप जानते हैं कि 10 घंटे के बीच महज कुछ मिनटों के वॉक से आप खुद को फिट रख सकते हैं। 'माइक्रो वॉक' लगातार डेस्क पर काम करने वालों के लिए एक शानदार एक्सरसाइज हो सकती है। सिर्फ कुछ मिनटों की एक्सरसाइज आपको कमर और गर्दन में पेन से राहत दिलाने के साथ-साथ मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम हो सकता है। आइये जानते हैं क्या मसले पर क्या है एक्सपर्ट की राय- जानें क्या है माइक्रो वॉक- माइक्रो वॉक यानी दिनभर में कई बार 01 से 10 मिनट तक छोटी-छोटी वॉक करना। यानी आपको जिम जाने या लंबा वर्कआउट करने की जरूरत नहीं है। हर 30 से 60 मिनट बाद अपनी कुर्सी से उठकर कुछ मिनट चलना भी माइक्रो वॉक कहलाता है। एक्सपर्ट का कहना है कि लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है। ऐसे में दिनभर के दौरान छोटी-छोटी वॉक करने से शरीर एक्टिव रहता है और कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा कम किया जा सकता है। लंबे समय तक बैठे रहने के नुकसान पूरे दिन बैठे रहने से शरीर की मांसपेशियां कम सक्रिय रहती हैं। इससे ब्लड सर्कुलेशन धीमा पड़ सकता है और शरीर की कैलोरी खर्च करने की क्षमता भी घट जाती है। इसके अलावा ब्लड शुगर कंट्रोल करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और समय के साथ हृदय रोग का खतरा भी बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी लंबे समय तक बैठे रहने को कई नॉन कम्युनीकेबल डिजीज का एक प्रमुख जोखिम कारक मानता है। ऐसे मिलते हैं माइक्रो वॉक से फायदे-
विशेषज्ञ का कहना है कि हर 30 से 60 मिनट में सिर्फ 05 मिनट की वॉक भी शरीर पर पॉजिटिव असर डाल सकती है, जैसे-
1. ब्लड सर्कुलेशन होता है बेहतर
लगातार बैठे रहने से पैरों और शरीर के निचले हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो सकता है। कुछ मिनट की वॉक करने से मांसपेशियां सक्रिय होती हैं और पूरे शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। इससे थकान भी कम महसूस होती है।
2. ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद
खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलने से शरीर ग्लूकोज का बेहतर उपयोग कर पाता है। कई NCBI में छपी रिपोर्ट में पाया गया है कि नियमित माइक्रो वॉक ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकती है।
3. ब्लड प्रेशर हो सकता है कंट्रोल
रिसर्च बताते हैं कि हर आधे घंटे बाद कुछ मिनट पैदल चलने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। यह आदत हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक मानी जाती है।
4. मूड और फोकस हो सकता है बेहतर
लगातार स्क्रीन पर काम करने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। कुछ मिनट की वॉक दिमाग को आराम देती है और काम पर दोबारा ध्यान लगाने में मदद करती है। इससे तनाव भी कम हो सकता है और उत्पादकता बढ़ सकती है।
ऑफिस में माइक्रो वॉक को कैसे बनाएं आदत?
माइक्रो वॉक को अपनी लाइफस्टाइल में शामिल करना मुश्किल नहीं है। इसके लिए आप कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं।
- हर 30 से 60 मिनट बाद अपनी सीट से उठें।
- लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें।
- किसी सहकर्मी से बात करनी हो तो उसके डेस्क तक पैदल जाएं।
- फोन पर बात करते समय चलते-चलते बातचीत करें।
- पानी भरने या प्रिंटर तक जाने के लिए खुद पैदल जाएं।
- मोबाइल या कंप्यूटर में हर घंटे का रिमाइंडर लगाएं।

Manson Infections: वैसे तो बारिश का मौसम का सभी को इंतजार होता है लेकिन ये मौसम अपने साथ कुछ संक्रमण भी लेकर आता है। बारिश आते ही गर्मी से निजात तो मिलती है पर यह मौसम हेल्थ पर बुरा असर भी डाल सकता है। खासकर प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए यही मौसम कुछ नई परिशानियों का सबब भी बन जाता है। आइये जानते हैं इस मौसम पर एक्सपर्ट की राय-
वह बताती हैं कि गर्भावस्था में शरीर की इ्मयूनिटी अपने आप कुछ हद तक कमजोर हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है ताकि शरीर भ्रूण को बाहरी तत्व समझकर रिजेक्ट न कर दे। लेकिन इसी कारण से मानसून की नमी, जगह-जगह जमा पानी और बैक्टीरिया व फंगस के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बनने पर प्रेग्नेंट महिलाएं जल्दी इंफेक्शन की चपेट में आ जाती है।
मानसून में बढ़ने लगते हैं UTI के मामले
मानसून में गर्भवति महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के मामले अचानक बढ़ जाते हैं और डॉक्टर इसकी वजह भी साफ बताती हैं। नमी वाले मौसम में पसीना और गीलापन त्वचा पर काफी देर तक बना रहता है, जो बैक्टीरिया के पनपने के लिए एकदम सही जगह बन जाता है। इसके साथ ही हार्मोनल बदलाव के चलते वेजाइनल पीएच भी बदलता रहता है। इससे यीस्ट इंफेक्शन जैसी फंगल दिक्कतें भी परेशान करने लगती हैं।
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एक्सपर्ट के मुताबिक यहां एक बात ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर UTI का समय पर इलाज न हो, तो कुछ गंभीर मामलों में यह प्रीटर्म लेबर यानी समय से पहले डिलीवरी तक की वजह बन सकता है।
ये बीमारियां भी बढ़ा सकती हैं जोखिम
विशेषज्ञ के अनुसार सिर्फ यूटीआई ही नहीं, बल्कि मानसून पानी और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का भी सीजन होता है। डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड इस मौसम में बड़ा खतरा बनकर सामने आते हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान डेंगू होने पर प्लेटलेट्स तेजी से गिर सकते हैं और भी गंभीर रूप ले सकते हैं। वहीं दूषित पानी या खाने से टाइफाइड और पेट के इंफेक्शन होने का खतरा भी बना रहता है। इनका असर सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि भ्रूण की सेहत पर भी पड़ सकता है।
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ऐसे करें बचाव?
विशेषज्ञ की सलाह बहुत सीधी है, सूती और ढीले कपड़े पहनें, इंटिमेट एरिया को सूखा-साफ रखें, और पानी खूब पिएं ताकि UTI से बचा जा सके। घर के आसपास पानी जमा न होने दें, मच्छरदानी या रिपेलेंट का इस्तेमाल करें और बाहर का या कटा हुआ खाना खाने से जितना बचा जाए उतना अच्छा। और सबसे जरूरी- बुखार, जलन, अजीब-सा डिस्चार्ज या पेट दर्द जैसी कोई भी बात नज़रअंदाज़ न करें, फौरन अपने डॉक्टर से मिलें।
ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें?
अगर मानसून में आपको ऐसा लगे कि बुखार, जननांगों में जलन, पेशाब करते समय जलन, भ्रूण की हलचल कम महसूस होना, तेज पेट दर्द, ब्लीडिंग आदि हो रहे हैं तो बिना देर किए डॉक्टर के पास जाएं। उन्हें अपनी समस्या बताएं।
फोटो सौजन्य- गूगल

Health First: ज्यादातर महिलाएं बिजी दिनचर्या, केयर संबंधी जिम्मेदारियों या अन्य समस्याओं को मामूली समझकर शुरुआती लक्षणों को दरकिनार कर देती हैं। हालांकि महिलाओं में ये अनदेखे लक्षण कभी-कभी सीरियस बीमारियों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। थकान और अनियमित मासिक धर्म से लेकर शरीर में होने वाले सूक्ष्म बदलावों तक, इन संकेतों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं की आम स्वास्थ्य समस्याओें को समझना, शुरुआती संकेतों को पहचानना और मेडिकल मदद कब लेनी चाहिए, यह जानना जटिलताओं को रोकने और लंबे हेल्थ के एहसास को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा सकता है। महिलाएं अक्सर हेल्थ रिलेटेड लक्षणों तो क्यों करती हैं नजरअंदाज- महिलाएं अक्सर अपने स्वास्थ्य की तुलना में परिवार और काम को प्राथमिकता देती हैं। इससे अक्सर निदान और उपचार में देरी होती है।
- व्यस्त जीवनशैली और एक साथ कई जिम्मेदारियों को निभाना
- असुविधा या दर्द को सामान्य मानने की प्रवृत्ति• लक्षणों के बारे में जागरूकता का अभाव
- यह मान लेना कि लक्षण अस्थायी हैं या तनाव से संबंधित हैं स्वास्थ्य संबंधी वे प्रमुख मुद्दे जिन्हें महिलाएं अक्सर नजरअंदाज कर देती हैं।
थकान महसूस होने को अक्सर तनाव या नींद की कमी बताकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
• यह एनीमिया , थायरॉइड विकार या पोषण संबंधी कमियों का संकेत हो सकता है।
• लगातार थकान महिलाओं में थकान के सबसे आम कारणों में से एक है, जिसका मूल्यांकन उन्हें करवाना चाहिए।
अनियमित मासिक धर्म
मासिक धर्म की अनियमितताओं को अक्सर सामान्य माना जाता है।
• यह हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है।
• यह पीसीओएस, थायराइड की समस्याओं या तनाव से संबंधित हो सकता है।
• अनियमित मासिक धर्म के कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण है।
बेवजह वजन परिवर्तन
जीवनशैली में बदलाव किए बिना अचानक वजन बढ़ना या घटना होना अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
• यह थायरॉइड संबंधी विकार या चयापचय संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकता है।
• हार्मोनल असंतुलन के लक्षणों से जुड़ा हुआ
बार-बार सिरदर्द
सिरदर्द को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या इसका इलाज खुद ही कर लिया जाता है।
• यह तनाव, माइग्रेन या किसी अन्य अंतर्निहित बीमारी के कारण हो सकता है।
• लगातार सिरदर्द होने पर डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक है।
स्तन में परिवर्तन
स्तन स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
• गांठें, दर्द या स्राव
• बेहतर परिणामों के लिए शीघ्र निदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रोणि में दर्द
अक्सर इसे मासिक धर्म की असुविधा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
• यह एंडोमेट्रियोसिस, संक्रमण या अंडाशय संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकता है।
• दीर्घकालिक दर्द के लिए मूल्यांकन आवश्यक है
पाचन संबंधी समस्याएं (पेट फूलना, एसिडिटी)
आमतौर पर इन्हें मामूली समस्याएं माना जाता है।
• इसका संबंध आंतों के स्वास्थ्य या हार्मोनल परिवर्तनों से हो सकता है।
• लगातार बने रहने वाले लक्षण गंभीर समस्याओं का संकेत हो सकते हैं।
नींद की समस्याएँ
नींद की कमी को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या इसे सामान्य मान लिया जाता है।
• यह तनाव, हार्मोनल असंतुलन या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से संबंधित हो सकता है।
• यह समग्र स्वास्थ्य और ऊर्जा स्तर को प्रभावित करता है।
मनोदशा में परिवर्तन और चिंता
भावनात्मक लक्षणों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
• यह हार्मोनल उतार-चढ़ाव से संबंधित हो सकता है।
• यह चिंता या अवसाद का संकेत हो सकता है।
मनोदशा में परिवर्तन और चिंता
भावनात्मक लक्षणों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।- यह हार्मोनल उतार-चढ़ाव से संबंधित हो सकता है।
- यह चिंता या अवसाद का संकेत हो सकता है।
- ऐसे लक्षण जो कुछ दिनों से अधिक समय तक बने रहते हैं
- समय के साथ बिगड़ती जाने वाली स्थितियाँ
- एक साथ कई लक्षण प्रकट होना
- शरीर में अचानक या असामान्य परिवर्तन
- गंभीर बीमारियों के निदान में देरी
- रोग की प्रगति
- जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है
- जीवन की गुणवत्ता में कमी
- लक्षण अपेक्षा से अधिक समय तक बने रहते हैं
- अचानक या गंभीर असुविधा होती है
- समस्याएँ बार-बार सामने आती रहती हैं।
- ये लक्षण दैनिक जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- स्वास्थ्य समस्याओं का शीघ्र पता लगाना
- मौजूदा स्थितियों की निगरानी
- निवारक देखभाल और स्क्रीनिंग।

बच्चों के लिए Smartphone का लत लगना नशा की तरह दिमाग पर हावी हो जाता है जिसे लेकर दुनियाभर के पेरेंट्स परेशान रहते हैं। बता दें कि जहां बच्चे दिनभर खेल-कूदते नजर आते थे और शरारतें करतें थे, अब वे चुपचाप एक कमरे के किसी कोने में घंटों वीडियो और शॉर्ट्स स्क्रॉल करने में व्यस्त दिखाई देते हैं। पेरेंट्स को अच्छे से मालूम होता है कि बच्चे अगर अधिक फोन का इस्तेमाल करेंगे तो उनकी आंखें खराब हो सकती हैं, लेकिन यहां बात आंखें खराब होने तक सीमित नहीं है बल्कि ज्यादा स्क्रीन देखने का प्रभाव बच्चों के दिमाग प र भी बहुत ज्यादा पड़ रहा है जिसे न तो अभी बच्चे नोटिस कर पा रहें हैं और ना ही पेरेंट्स। इस टॉपिक पर दुनियाभर में कई रिसर्च हो चुकी हैं और ज्यादातर में यह मिला है कि स्मार्टफोन या कोई भी डिजिटल स्क्रीन को लंबे समय तक देखना बच्चे की सिर्फ आंखों पर ही नहीं बल्कि दिमाग पर भी असर डालता है। बच्चों के दिमाग पर स्क्रीन से पड़ रहे कुप्रभाव के बारे में ये रही जानकारियां-
क्या स्मार्टफोन्स के इस्तेमाल से खोखल हो रहा बच्चों का दिमाग?
'साइंस डायरेक्ट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक Adolescent Brain Cognitive Development Study (ABCD) की एक रिसर्च में 10 से 13 साल के कई हजारों बच्चों पर अध्यन की गई। जिसमें बच्चों के सोशलमीडिया और स्मार्टफोन्स के इस्तेमाल को एनालाइज किया गया और साथ ही में इमेजिंग स्कैन्स की मदद से उनके ब्रेन की संरचना का निरीक्षण किया गया। जिसमें कुछ क्षेत्रों में पाया गया कि जो बच्चे ज्यादा स्क्रीनटाइम दे रहे हैं या समार्टफोन्स का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उनकी ब्रेन की कोर्टिकल मोटाई थोड़ी कम मिली और साथ ही ब्रेन वॉल्यूम भी अन्य बच्चों से थोड़ी कम मिली। साइंसडायरेक्ट के एक्सपर्ट्स के ब्रेन की ये दोनों चीजें दिमाग के कई जरूरी कार्यों को करने में मदद करती हैं जैसे -
- ध्यान देना या फोकस करना
- निर्णय लेना (डिसीजन मेकिंग)
- सोचना व समझना (रीजनिंग)
- याददाश्त या याद रखने की क्षमता
एक्सपर्ट के अनुसार अगर बच्चा लंबे समय तक स्मार्टफोन्स देखता या फिर उसका स्क्रीनटाइम ज्यादा है, तो उससे बच्चे की आंखों पर विपरीत असर तो पड़ता ही है, दिमाग की कार्यक्षमता और ब्रेन हेल्थ को भी काफी नुकसान पहुंचता है। रिसर्चों में भी साबित हो चुका है कि जिन बच्चों का स्क्रीनटाइम ज्यादा होता है, अन्य बच्चों की मुकाबले उनके दिमाग की क्षमता कम हो सकती है।
बच्चे की स्मार्टफोन की लत कैसे छुड़ाएं
इस समस्या को लेकर डॉक्टर ने बताया कि बच्चे का स्मार्टफोन एडिक्शन खत्म करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है उसे टाइम देना और जितना हो सके उसे फिजिकल एक्टिविटी में शामिल करना। इसमें ध्यान रखना होगा कि बच्चे को डांटकर उसकी फोन की आदत नहीं छुड़ानी है, बल्कि उसके लिए नीचे लिखी बातों का ध्यान रखना है-
- सबसे पहले बच्चे के आगे खुद फोन इस्तेमाल करना बंद कर दें।
- जितना हो सके फोन्स को बच्चों की पहुंच से दूर रखें और ताकि उन्हें फोन की याद न आए।
- बच्चे को खुद टाइम देना शुरू कीजिए उनसे बातें करें, कहानियां सुनाएं।
- बच्चे को घर के छोटे-छोटे काम करना सिखाएं जैसे अपना बैग खुद पैक करना।
- रोजाना बच्चे को आउटडोर एक्टिविटी कराएं, ऐसे स्पोर्ट्स में शामिल करें जिनमें उसकी ज्यादा रुचि हो आदि।

Blood Pressure-Diabetes: भागदौड़ भरी जिंदगी में ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की परेशानी काफी ज्यादा हो चुकी है। यह दोनों ही, सबसे तेजी से बढ़ने वाली लाइफस्टाइल डिजीज हैं। इन दोनों बीमारियों को नियंत्रित किया जा सकता है पर जब ये लंबे वक्त तक कंट्रोल में नहीं रहते, तो सबसे अधिक असर किडनी पर पड़ता है। एक डॉक्टर का कहना है कि क्रॉनिक किडनी डिजीज के प्रमुख वजहों में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर सबसे आगे है। आइये जाने किडनी पर दोनों बीमारियों का क्या असर पड़ता है-
किडनी पर डायबिटीज का क्या है असर
डायबिटीज का असर आपकी किडनी पर पड़ सकता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एंड डायजेस्टिव एंड किडनी डिजीज के मुताबिक, डायबिटीज होने पर हमारे शरीर का ब्लड शुगर लेवल लगातार बढ़ा हुआ रहता है। यह हाई शुगर धीरे-धीरे किडनी के छोटे-छोटे ब्लड वेसेल्स को नुकसान पहुंचाने लगता है। किडनी का मुख्य काम ब्लड को फिल्टर करना है। लेकिन जब ब्लड शुगर ज्यादा रहता है, तो यह फिल्टरिंग सिस्टम खराब होने लगता है और प्रोटीन जैसे जरूरी तत्व पेशाब के जरिए बाहर निकलने लगते हैं। इस स्थिति को डायबिटिक नेफ्रोपैथी कहा जाता है।
हाई ब्लड प्रेशर किडनी को कैसे नुकसान पहुंचाता है
ब्लड प्रेशर बढ़ने की स्थिति में किडनी को नुकसान हो सकता है। नेशनल किडनी फाउंडेशन के मुताबिक, हाई ब्लड प्रेशर किडनी की ब्लड वेसल्स पर अतिरिक्त दबाव डालता है। लंबे समय तक यह दबाव किडनी की फिल्टरिंग क्षमता को कमजोर कर देता है। ऐसे में धीरे-धीरे किडनी ठीक से ब्लड को फिल्टर नहीं कर पाती, जिससे शरीर में टॉक्सिस पदार्थ जमा होने लगते हैं। इसे हाइपरटेंसिव किडनी डिजीज कहा जाता है।
जब ब्लड प्रेशर और डायबिटीज साथ में हो, तो किडनी पर क्या पड़ता है असर
अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर दोनों होते हैं, तो किडनी पर डबल स्ट्रेस पड़ता है। यह स्थिति सबसे ज्यादा खतरनाक मानी जाती है, क्योंकि किडनी फंक्शन तेजी से गिरता है।इस स्थिति में प्रोटीन यूरिन में बढ़ जाता है और किडनी फेलियर का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में कई बार डायलिसिस की भी जरूरत पड़ सकती है
किडनी डैमेज होने के शुरुआती लक्षण-
किडनी डैमेज धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए शुरुआत में लक्षण हल्के हो सकते हैं। इसके कुछ शुरुआती लक्षण निम्न हैं-
- शरीर में बार-बार थकान महसूस होना
- पैरों और चेहरे पर सूजन
- पेशाब में झाग आना
- भूख कम लगना
- ब्लड प्रेशर का लगातार बढ़ा रहना
- किडनी को ऐसे हालात में कैसे रखें सुरक्षित
- ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखें।
- ब्लड प्रेशर को 120/80 के आसपास रखने की कोशिश करें।
- नमक और प्रोसेस्ड फूड कम खाएं।
- नियमित रूप से एक्सरसाइज करें।
- समय-समय पर किडनी टेस्ट कराएं।
- डॉक्टर की दवा नियमित रूप लें।

