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Category Archives: Health

Foods For Pregnant Woman

Foods in Pregnancy: आप ने ये जरूर सुना होगा कि प्रेगनेंसी के समय आपकी खाने की आदतें बदल सकती हैं। आपको ऐसे खाद्य पदार्थ मिलेंगे जो आपके फेवेरिट होंगे और जो आपके और आपके बच्चे दोनों के लिए हेल्दी होंगे। पौष्टिक आहार खाने से आपको अपनी प्रेगनेंसी और अपने शरीर में होने वाले नए बदलावों को समर्थन करने में सहाता मिलेगी। प्रेगनेंसी के वक्त हेल्थी खाने में यह जानना आवश्यक है कि कितना खाना है और कौन सा आहार जरूरी है।

इसमें आपके बच्चे के विकास के लिए पर्याप्त पोषक तत्व लेने और आपके साथ-साथ बच्चे के स्वास्थ्य के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखने के लिए बैलेंस बनाना भी शामिल है। पोषक तत्व शरीर के निर्माण खंड हैं जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा। आइये जानते हैं कि आपको प्रेगनेंसी में कौन से खाद्य आहार लेने चाहिए-

प्रेगनेंसी में किन खाद्य पदार्थों का सेवन करना है जरूरी, जानते हैं एक्सपर्ट से-

सबसे पहले जाने प्रेगनेंसी के दौरान लिए जाने वाले जरूरी पोषक तत्व

Why the demand for this new process increased to prevent unwanted pregnancy

फोलिक एसिड– फोलिक एसिड मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के कुछ जन्म दोषों को रोकने में मदद करता है।

आयरन– आयरन आपके बच्चे के विकास में मदद करता है और कई महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त आयरन नहीं मिलता है। इसके लिए डॉक्टर आपको कुछ दवाई भी देते है।

आयोडीन– आयोडीन आपके बच्चे के मस्तिष्क के लिए अहम है। अगर आप घर पर नमक का इस्तेमाल करते हैं, तो सुनिश्चित करें कि यह आयोडीन युक्त नमक हो।

कोलीन– कोलीन आपके बच्चे के मस्तिष्क के लिए भी महत्वपूर्ण है। कोलीन युक्त खाद्य पदार्थ चुनें – जैसे कम वसा और वसा रहित डेयरी, अंडे, लीन मांस, सी फूड, बीन्स और दालें।

प्रेगनेंसी में करें इन खाद्य पदार्थों का सेवन

These symptoms of pregnancy start appearing only 3 to 4 days after conceiving, pregnancy is confirmed even before the period is missed

दालें

अगर आप नॉनवेज खाते है या नहीं आपको दालों से प्रोटीन जरूर लेना चाहिए। एक कप पकी हुई दाल में लगभग 17 ग्राम प्रोटीन और लगभग 7 मिलीग्राम आयरन होता है।

दालें बी विटामिन होता हैं, जो आपके बच्चे के मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है और स्पाइना बिफिडा जैसे न्यूरल-ट्यूब डिफेक्ट के खिलाफ एक शक्तिशाली सुरक्षात्मक प्रभाव है, एक जन्म विकार जिसमें रीढ़ ठीक से नहीं बनती है।

नट्स

नट्स छोटे जरूर दिख सकते है लेकिन ये बहुत ताकतवर होचे है। इसमें मैग्नीशियम, जिंक, पोटैशियम और विटामिन ई जैसे महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं, साथ ही प्रोटीन, फाइबर और स्वस्थ वसा भी होते हैं। इन्हें आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे ये गर्भावस्था के दौरान खाने के लिए आदर्श स्नैक बन जाते हैं।

एवोकाडो

क्रीम जैसा हरा फल फोलेट से भरपूर होता है, साथ ही इसमें विटामिन बी6 भी होता है, जो बच्चे के लिए स्वस्थ ऊतक और मस्तिष्क के विकास को बढ़ावा देता है और ये आपको मॉर्निंग सिकनेस से निजात दिलाने में भी सहायक हो सकता है।

यह स्वस्थ मोनोअनसैचुरेटेड फैट का भी एक स्वादिष्ट स्रोत है, जो आपके शरीर को फलों और सब्जियों में पाए जाने वाले कई विटामिनों को बेहतर तरीके से अवशोषित करने में मदद करता है।

अंडे
आप शायद जानते होंगे कि अंडे प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत है। ये पकाने में आसान में आसान होते है और एक बड़ा अंडा 6 ग्राम प्रोटीन देता है। अंडे विटामिन डी के कुछ खाद्य स्रोतों में से एक हैं। विटामिन डी आपके बच्चे की हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में मदद करने के साथ-साथ आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाए रखने में बहुत मदद करते है।

ओट्स

फाइबर आपको लंबे समय भूख महसूस होने नहीं देता है और गर्भावस्था के दौरान होने वाली असहज कब्ज से बचने में मदद मिल सकती है। ओट्स फाइबर का बेहतरीन स्रोत है। फाइबर के साथ साथ एक कप ओट्स आपके रोजाना मैग्नीशियम का 30 फीसदी से ज़्यादा प्रदान करता है, ये आपके बच्चे को स्वस्थ हड्डियों और दांतों के निर्माण में मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

फोटो सौजन्य- गूगल

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

Electronic Gadget का इस्तेमाल और देर रात तक जगे रहने से सुबह उठना काफी मुश्किल हो जाता है। नींद की कमी आलस की मुख्य वजह होती है जिसका कुप्रभाव वर्कआउट रूटीन पर भी पड़ता है। ऐसे में ज्यादातर लोग वर्कआउट रूटीन को स्किप करने लगते हैं जिसका निगेटिव असर उनके स्वास्थ्य पर भी दिखने लगता है। ऐसे में बॉडी को हेल्दी और एक्टिव बनाए रखने के लिए वर्कआउट से पहले महसूस होने वाले आलस्य को दूर करना जरूरी है।

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

इसे लेकर एक्सपर्ट का कहना है कि नियमित रूप से वर्कआउट में शामिल ना होना आलस्य को काफी बढ़ावा देता है। इसके कारण वर्कआउट रूटीन को नियमित बनाए रखने नामुमकिन लगने लगता है। इससे बचने के लिए सुबह उठते ही गैजेट्स के इस्तेमाल से बचें और बेड पर ही लेग स्ट्रेचिंग योगाभ्यास करें। इससे आलस्य को दूर भगाने में मदद मिलती है। अलावा इसके दूसरे दोस्तों के साथ एक्सरसाइज करने से कॉम्पीटिशन की भावना बढ़ने लगती है।

इन टिप्स की मदद से सुस्ती को दूर किया जा सकता है

1. फिटनेस गोल्स करें सेट

वर्कआउट रूटीन को कामयाब बनाने के लिए सबसे पहले गोल्स को सेट करना बहुत ज़रूरी है। इससे व्यायाम से पहले बढ़ने वाला आलस्य और नींद की समस्या को दूर करने में मदद मिलती है। इसके लिए स्वयं वर्कआउट चैलेंज तय करें और उसे पूरा करने के लिए खुद को प्रोत्साहित करते रहें। समय-समय पर गोल्स सेट करते हैं और उन्हें अचीव करते हुए आगे बढ़ें।

2. आसान एक्सरसाइज़ से करें शुरुआत

If laziness has made a home in your fitness journey then don't panic

वेट लिफ्टिंग और हाई इंटैसिटी एक्सरसाइज़ शुरूआत में थकान का कारण बनने लगते है। इससे शारीरिक तनाव की समस्या बढ़ने लगती है। लेकिन तन और मन दोनों के लिए ही फायदेमंद साबित होती है। ऐसे में व्यायाम को नियमित बनाए रखने के लिए आसान एक्सरसाइज़ को अपने रूटीन का हिस्सा बनाएं और फिर धीरे धीरे उसें बदलाव लेकर आएं। इससे शरीर को न केवल थकान से बचने में मदद मिलती है बल्कि बॉडी फिश्र रहती है।

3. स्ट्रेचिंग से होगा आलस्य दूर

सुबह उठने के बाद आलस्य की समस्या को दूर करने के लिए कुछ देर स्ट्रेचिंग करें। इससे शरीर का ब्लड सर्कुलेशन नियमित हो जाता है और लेज़ीनेस दूर होने लगती है। टांगों की स्ट्रेच करने से लेकर बाजूओं और कमर की स्ट्रेचिंग आवश्यक है। इससे शारीरिक अंगों में महसूस होने वाली स्टिफनेस से बचा जा सकता है और ऑक्सीज़न का फ्लो भी उचित बना रहता है।

4. दोस्तों के साथ करें वर्कआउट प्लान

अपनी फिटनेस जर्नी को रेगुलर बनाए रखने के लिए वर्कआउट पार्टनर चुनें। इससे फिटनेस रूटीन को पूरा करने के लिए कॉपिटिशन की भावना बढ़ने लगती है, जिससे आलस्य की समस्या से राहत मिलती है और सेल्फ मोटिवेशन की भावना काफी हद तक बढ़ जाती है।

5. सोने और उठने का समय तय करें

बहुत बार नींद पूरी ना होना भी लेज़ीनेस को बढ़ा देता है। ऐसे में वर्कआउट से पहले आलस्य को दूर करने के लिए रोज़ाना एक नियमित समय पर सोएं और उठें। इससे न केवल स्वास्थ्य संबधी समस्याओं से बचा जा सकता है बल्कि नींद की गुणवत्ता भी बढ़ने लगती है और शरीर एक्टिव बना रहता है। खुद को वर्कआउट के लिए तैयार करने से पहले 06 से 08 घंटे की नींद रोज़ाना लें और समय से उठें।

फोटो सौजन्य- गूगल

Government's alert on the havoc of heat

गर्मी का कहर दिनों दिन बढ़ रहा है और इसी वजह से दिल्ली का तापमान 48 डिग्री तक जा पहुंचा है। यहां कई इलाकों में हद से ज्यादा गर्मी बढ़ने से लू के कारण रेड अलर्ट घोषित किया गया है। चिलचिलाती गर्मी जहां निर्जलीकरण का कारण बनती है। वहीं, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में तेज़ धूप और गर्मी के कारण सिरदर्द और डायरिया का जोखिम बढ़ रहा है। जानते हैं हीट एग्जॉर्शन के नुकसान और इससे बचने के उपाय।

सेहत के लिए नुकसानदेह है गर्मी का बढ़ना

अत्याधिक गर्मी के संपर्क में रहने से शरीर में हीट स्ट्रोक का खतरा बना रहता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक गर्मी का प्रभाव बढ़ने से पैरों में क्रैंप्स, चक्कर आना, सिरदर्द और डिज़िनेस बढ़ने लगती है। इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट के मुताबिक हीट स्ट्रोक के कारण अक्सर बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को थकान महसूस होना, अत्यधिक पसीना और हीट क्रैप्स का सामना करना पड़ता है।

इस बारे में फिजीशियन बताती हैं कि तापमान बढ़ने के चलते शरीर का थर्मोरेग्यूलेशन असंतुलित होने लगता है। जिससे हीटस्ट्रोक की समस्या का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में गर्भवती महिलाओं, हृदय रोगियों, बच्चों और बुजुर्गों को इस समस्या से बचने के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

हीट एग्जॉर्शन से बचने के लिए शरीर में इलेक्‍ट्रोलाइटस की मात्रा को बनाए रखना ज़रूरी है। इससे शरीर हाइड्रेट रहता है।

जानते हैं हीट स्ट्रोक से बचने के कुछ खास उपाय

1. सिर को अच्छे से ढकें

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक धूप के संपर्क में आने से सिर, आंखों, स्किन, बालों और होठों पर बुरा असर नज़र आने लगता है। ऐसे में तेज़ गर्मी से बचने के लिए स्कार्फ, कैप, हैट और छाते का प्रयोग करें। अलावा इसके आंखों को प्रोटेक्ट करने के लिए काला चश्मा ज़रूर पहनें। साथ ही दोपहर के समय बाहर निकलने से भी बचना चाहिए।

2. बाहरी एक्टीविटी से बचें

Government's alert on the havoc of heat

लू से शरीर को बचाने के लिए आउटडोर खेलों से बचें। इससे शरीर में निर्जलीकरण का जोखिम कम हो जाता है। लगातार बढ़ते तापमान को देखते हुए इनडेर खेलों में हिस्सा लें और शरीर को ठंडा रखने की कोशिश करें। अन्यथा थकान, चक्कर आने और बेहोशी का सामना करना पड़ सकता है।

3. ठंडे शरबत का सेवन करें

आहार में नींबू पानी, नारियल पानी, बेल का शरबत और सत्तू जैसे नेचुरल ड्रिंक्स को अपने रूटीन में शामिल करें। इससे शरीर में इलेक्‍ट्रोलाइटस का नियमित स्तर बना रहता है। इसके अलावा मौसमी फलों और सब्जियों का सेवन करनें इससे डाइजेशन बूसट करने में मदद मिलती है।

4. बाहर का खाना खाने से करें परहेज़

फ्रेस और घर का पका खाना खाने से शरीर नॉज़िया, सिरदर्द डायरिया के खतरे से बचा रहता है। ऐसे में मसालेदार और ऑयली खाना खाने की जगह हल्का खाना खाएं और घर का पका खाना आहार में शामिल करे। इसके अलावा किसी भी मील को स्किप करने से बचें। इससे शरीर में एनर्जी की कमी को सामना करना पड़ता है। साथ ही कमज़ोरी और थकान बढ़ने लगती है।

गर्मी में बुजुर्गों का इस प्रकार से रखें ख्याल

तेज़ धूप में बाहर निकलने से अक्सर बचें। इससे शरीर में थकान बढ़ने लगती है और शरीर का संतुलन खोने लगता है। इससे चक्कर आने की संभावना बनी रहती है।
बासी खाना खाने से बचें और घर का पका ताज़ा और हल्का खाना अपने आहार में शामिल करें।
ज्यादा मात्रा में चाय और कॉफी का सवेन करने से बचें। इससे शरीर में निर्जलीकरण का खतरा बना रहता है।
कमरे का तापमान गर्म न रहने दें। शरीर का ठंडा रखने के लिए एयर कंडीशनर, कूलर और पंखे के सामने बैठें।
हल्के रंगों और ब्रीथएबल फ्रब्रिक यानि कॉटन के कपड़े पहनें। इससे शरीर गर्मी के प्रकोप से दूर रहता है।

बच्चों का गर्मी में ऐसे रखें ख्याल

  • धूप में निकलने से बचें। इससे बच्चों में डिहाइड्रेशन का खतरा बना रहता है। घर से बाहर निकलने से पहने पानी की बोतल अपने साथ रखें।
  • गर्मी में लगातार खेलने से बच्चो में थकान बढ़ने लगती है। ऐसे में दिन में कुछ देर उनके आराम के लिए समय निकालें। इससे बच्चे के शरीर में एनर्जी बनी रहती है।
  • शाम के समय आउटडोर एक्टीविटीज़ के लिए जाएं। उस समय तापमान कम होने लगता है, जिससे शरीर में लू का खतरा कम हो जाता है।
  • प्रोसेस्ड फूड और शुगरी पेय पदार्थों का सेवन करने से बचें। इसकी जगह प्राकृतिक पेय पदार्थ पीएं और हेल्दी मील लें।

फोटो सौजन्य- गूगल

To uplift your breasts and give them the right shape

Breast Uplift: सही ब्रा का इस्तेमाल नहीं करना, गलत पोश्चर, ब्रेस्ट फीडिंग और मेनोपॉज के बाद अक्सर महिलाओं को सैगी ब्रैस्ट की समस्या से दो-चार होना पड़ता है। हार्मोन में आने वाली चैंजिंग ब्रेस्ट की मसल्स को प्रभावित करने लगते हैं। इसके कारण महिलाओं को सैगी ब्रेस्ट की समस्या का सामना करना पड़ता है। ब्रेस्ट के मसल्स में कसावट लाने के लिए आहार में थोड़ा बदलाव के अलावा कुछ समय एक्सरसाइज करना महत्वपूर्ण है। आइये जानते हैं ब्रेस्ट को अपलिफ्ट करने में मददगार 4 अहम एक्सरसाइज-

महिलाओं को क्यों करना पड़ता है सैगी ब्रेस्ट का-

इस बारे में एक्सपर्ट का कहना हैं कि सही पोश्चर में ना बैठने से मसल्स और लिगामेंटस पर उसका असर दिखने लगता है। इससे मसल्स की कसावट कम होने लगती है। इसका असर ब्रेस्ट की आकार पर पड़ने लगता है। इससे ब्रेस्ट धीरे धीरे लटकने लगती है। ब्रेस्ट के नीचे पाए जाने वाले पेक्टोरलिस मेजर और पेक्टोरेलिस माइनर मसल्स मौजूद होते हैं। इनकी मज़बूती को बनाए रखने के लिए दिनभर में कुछ समय मॉफडरेट एक्सरसाइज़ के लिए निकालने से फायदा मिलता है।

ब्रेस्ट को अपलिफ्ट करने वाली 4 एक्सरसाइज़

To uplift your breasts and give them the right shape

1. पुशअप्स

मसल्स को मज़बूत बनाने के लिए पुशअप्स का अभ्यास करना चाहिए। इसके करने से शरीर का वज़न कंधों पर आने लगता है, जिससे अपर बॉडी मसल्स में कसावट आने लगती है और सैगी ब्रेस्ट की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

जानें करने की विधि-

इसे करने के लिए जमीनपर पेट के बल लेट जाएं। अब अपने दोनों हाथों को कंधो के पास लेकर आएं। बाजूओं को कंधों से ज्यादा चौड़ाई पर खोलें। अब शरीर के उपर हिस्से को उपर की ओर उठाएं। इससे शरीर का वज़न कंधों पर आने लगता है। इसके बाद पैरों की उंगलियों को जमीन पर टिकाएं। शरीर को उपर की ओर लेकर जाएं और फिर नीचे लेकर आएं। 10 से 15 बार इस एक्सरसाइज़ को 2 से 3 सेट्स में करें।

2. डंबबैल फ्लाई

पेक्टोरल मसल्स की मज़बूती के लिए डंबबैल फ्लाई एक आसान एक्सरसाइज़ है। इसे करने से शरीर में स्टेमिना बिल्ड होने लगता है और ब्रेस्ट में कसावट आने लगती है। डेली इस एक्सरसाइज़ का अभ्यास करने से शरीर में बढ़ने वाली स्टिफनेस को दूर करने में मदद मिलती है।

जानें इसे करने की विधि

इसे करने के लिए सीधे बैंच लेट जाएं और टांगों को जमीन पर टिकाकर रखें। अब दोनों हाथों में वज़न को उठाएं और उपर ले जाने की जगह दोनों हाथों को फैलाएं और फिर एक स्थान पर ले आएं। इस एक्सरसाइज़ को 08 से 10 बार दोहराएं।

3. केबल क्रासओवर

चेस्ट मसल्स को हेल्दी बनाए रखने के लिए केबल क्रासओवर एक्सरसाइज़ का एक्सरसाइज करना जरूरी है। इसे नियमित रूप से करने से शरीर के पोश्चर में सुधार आने लगता है और शरीर में एनर्जी का लेवल भी बढ़ने लगता है।

जानें इसे करने की विधि

इस अभ्यास को करने के लिए सीधे खड़े हो जाएं और दोनों हाथों से रस्सी को अपनी ओर खीचें। इससे मसल्स स्ट्रेच होते हैं और ब्रेस्ट की मांसपेशियों में कसावट आने लगती है। इसके अलावा शरीर में जमा अतिरिक्त कैलोरीज़ को बर्न करने में भी मदद मिलती है।

4. डंबबेल चेस्ट प्रैस

अपर बॉडी को हेल्दी और टोन बनाए रखने के लिए डंबबेल चेस्ट प्रैस बेहद फायदेमंद है। इसे करने ये चेस्ट पर जमा चर्बी को बर्न करने के अलावा ब्रेस्ट अपलिफ्ट करने में भी मदद मिलती है। नियमित रूप से इसका अभ्यास करने से बॉडी में ब्लड का सर्कुलेशन नियमित बना रहता है।

जानें इसे करने की विधि

इसे करने के लिए किसी बेंच के एक कोने पर बॉडी के उपर हिस्से को टिका लें। अब अपनी क्षमता के अनुसार डंबबेल को हाथों में पकड लें। इस दौरान घुटनों को मोड़कर रखें और पैरों को मज़बूती से जमीन पर टिका लें। अब डंबबेल को नीचे लाएं और फिर उपर की ओर लेकर जाएं। इससे चेस्ट मसल्स को पूरी मज़बूती मिलती है।

फोटो सौजन्य- गूगल

If you don't want to invite diseases then stop using sodium immediately

Sodium: शरीर को हेल्दी रखने के लिए संतुलित आहार का होना अहम है। इसके लिए सभी न्यूट्रिएंट्स का होना जरूरी है। किसी भी एक न्यूट्रिएंट की कमी या ज्यादा कई तरह के स्वास्थ्य प्रोब्लम्स को आमंत्रित करता है। ऐसा ही एक पोषक तत्व सोडियम है। सोडियम का इजाफा कई बीमारियों की वजह बन सकती है। यह हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का कारण भी बन सकता है। इसलिए हमें इसके इस्तेमाल पर पूरा ध्यान देन की जरूरत है।

कितना सोडियम हेल्द के लिए ठीक है, डॉक्टर से यह सलाह आवश्य लें-

  • 14 साल और उससे अधिक उम्र के व्यक्ति : प्रतिदिन 2,300 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 9 से 13 साल की आयु के बच्चे:                     प्रतिदिन 1,800 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 4 से 8 साल की आयु के बच्चे:                      प्रतिदिन 1,500 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं
  • 1 से 3 साल की आयु के बच्चे:                       प्रतिदिन 1,200 मिलीग्राम से ज़्यादा नहीं

जानें भोजन में सोडियम को कम करने के तरीके

If you don't want to invite diseases then stop using sodium immediately

1. कम सोडियम वाले भोजन

हम जो सोडियम खाते हैं, उसका ज़्यादातर हिस्सा हमारे नमक के डिब्बे से नहीं आता। सोडियम लगभग सभी प्रोसेस्ड और तैयार खाद्य पदार्थों में होता है, जिन्हें हम खरीदते हैं। यहां तक कि ऐसे खाद्य पदार्थ भी, जिनका स्वाद नमकीन नहीं होता, उनमें भी सोडियम मौजूद होता है। जैसे ब्रेड या टॉर्टिला।
जब आप खरीदारी कर रही हैं, तो इन खाद्य पदार्थों को सीमित करें। जिनमें सोडियम की मात्रा ज़्यादा होती है, उन्हें एवॉइड करें। प्रोसेस्ड मीट, सॉसेज, पेपरोनी, सॉस, ड्रेसिंग, इंस्टेंट फ्लेवर्ड फ़ूड, जैसे फ्लेवर्ड चावल और नूडल्स खरीदना कम कर कर दें। उनके स्थान पर लो सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की तलाश करें।

2. लेबल की जांच करें

खाद्य पदार्थों में सोडियम की मात्रा की जांच करने और विभिन्न विकल्पों की तुलना करने के लिए न्यूट्रिशन फैक्ट लेबल का उपयोग करें।”कम सोडियम” या “नमक नहीं मिलाया गया” लेबल वाले खाद्य पदार्थों की तलाश करें।

ध्यान रखें कि कुछ सोडियम वाले खाद्य पदार्थों पर ये लेबल भी नहीं होते हैं। इसलिए सुनिश्चित करने के लिए न्यूट्रिशन फैक्ट लेबल की जांच करनी होगी। सोडियम की जांच करने के लिए पोषण तथ्य लेबल का उपयोग करना सीखें।

3. हेल्दी विकल्प चुनें

If you don't want to invite diseases then stop using sodium immediately

अधिक सोडियम वाले खाद्य पदार्थों को स्वस्थ विकल्पों से बदलें। नमकीन प्रेट्ज़ेल या चिप्स की बजाय बिना नमक वाले नट्स खाएं।
डेली मीट या सॉसेज खरीदने की बजाय ताज़ा चिकन, लीन मीट या सी फ़ूड पकाने का प्रयास करें। ताज़ी सब्जियां, सॉस के बिना फ्रोजेन सब्जी या कम सोडियम वाली डिब्बाबंद सब्जियां खाएं।

4. घर का खाना ज़्यादा खाएं

अपना भोजन खुद बनाना सोडियम कम खाने का एक बढ़िया तरीका है। आप अपने भोजन में क्या डालती हैं, इस पर आपका नियंत्रण होता है। खाना बनाते वक्त कुछ बातों को ध्यान में रख सकती हैं।

अगर कैन फ़ूड का उपयोग करती हैं, तो खाने या पकाने से पहले उन्हें धो लें। इससे नमक की कुछ मात्रा निकल जाएगी। ऐसे मसाले और स्प्रेड चुनें, जो बिना नमक वाले हों या जिनमें सोडियम कम हो। अगर आप नियमित स्प्रेड का उपयोग करती हैं, तो कम इस्तेमाल करें। अपने भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक की जगह अदरक या लहसुन जैसी अलग-अलग हर्ब और मसाले काम में लाएं।

5. बाहर खाने पर लो सोडियम फूड का चुनाव

अगर किसी रेस्तरां में खाना खाने आई हैं, तो पूछें कि मेनू में कोई कम सोडियम वाला व्यंजन है या नहीं। जब आप ऑर्डर करें, तो उनसे बोले कि वे आपके खाने में नमक ना डालें। ड्रेसिंग और सॉस अलग से लें ताकि आप ज़रूरत के हिसाब से ही नमक डालें।

6. आहार में अधिक पोटैशियम शामिल करें

हाई सोडियम वाले खाद्य पदार्थों की जगह हाई पोटेशियम वाले खाद्य पदार्थ लें। पोटेशियम युक्त खाद्य पदार्थ खाने से ब्लड प्रेशर कम करने में मदद मिल सकती है।

पोटैशियम के अच्छे स्रोतों में शामिल हैं-

आलू
खरबूजा
केला
बीन्स
दूध
दही

फोटो सौजन्य- गूगल

Fertility Rate: If you want to plan a baby

Fertility Rate (फर्टिलिटी रेट) में कमी आना कई वजहों से आ सकती है। कुछ माइक्रो न्यूट्रिएंट फर्टिलिटी रेट बढ़ा सकते हैं। ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं जो माइक्रो न्यूट्रिएंट से भरपूर होने के साथ-साथ फर्टिलिटी रेट में भी इजाफा कर सकते हैं।

आखिर आजकल क्यों ज्यादा हो रही है इमफर्टिलिटी

Fertility Rate: If you want to plan a baby

लोगों में बदलती जीवनशैली, स्मोकिंग और नशा का सेवन, मोटापा, अनियमित पीरियड्स, लो सपर्म काउंट जैसे कई कारण इमफर्टिलिटी के लिए जिम्मेदार हैं। कुछ माइक्रोन्यूट्रिएंट फर्टिलिटी रेट बढ़ा सकते हैं। ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं, जो माइक्रो न्यूट्रिएंट से भरपूर होते हैं और फर्टिलिटी रेट भी बढ़ा सकते हैं।

एग क्वालिटी बढ़ाता है फोलेट

फोलेट को विटामिन B-9 के रूप में भी जाना जाता है। यह शरीर को रेड ब्लड सेल्स बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फोलेट लेवल अंडे की गुणवत्ता, परिपक्वता, निषेचन और प्रत्यारोपण के लिए अहम है। फोलेट की कमी गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। फोलेट स्वाभाविक रूप से बीन्स, नट और सीड्स, अंडे, ताजा पत्तेदार साग, चुकंदर, संतरे, नींबू और अंगूर जैसे खट्टे फल, ब्रसेल्स स्प्राउट्स, ब्रोकोली, केल और एवोकाडो जैसे खाद्य पदार्थों में भी पाया जाता है।

ओव्यूलेशन में अहम भूमिका निभाता है जिंक

जिंक ओव्यूलेशन और पीरियड में महत्वपूर्ण रोल अदा करता है। यह स्पर्म क्वालिटी और स्पर्म मोबिलिटी में सुधार करने में मदद करता है। यह सूजन बढ़ाने वाले एजेंटों के खिलाफ कार्य करता है। हार्मोनबैलेंसर के रूप में जिंक टेस्टोस्टेरोन और प्रोजेस्टेरोन को संतुलित करता है। यह महिला और पुरुष दोनों के यौन स्वास्थ्य को मजबूती देता है। रेड मीट जिंक का एक बढ़िया सोर्स है। कद्दू के बीज, हैम्प सीड्स, तिल के बीज और अलसी के बीज में भारी मात्रा में जिंक पाया जाता है। डेयरी प्रोडक्ट्स, सब्जियां, नट्स, डार्क चॉकलेट भी इसके स्रोत हैं।

फीटस डेवलपमेंट में मदद करता है Vit- A

पर्याप्त विटामिन- A का स्तर अंडे की गुणवत्ता और भ्रूण के विकास में मदद करता है। यह स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली को बनाए रखने, विकास और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है। इसकी कमीसे फर्टिलाइज़ेशन नहीं हो पाता है और फीटस में विकृति आ सकती है। अच्छे स्रोत प्रदान करने वाले खाद्य पदार्थों में बीफ़ लिवर, कॉड लिवर आयल, शकरकंद, गाजर और कई अन्य फल और सब्जियां शामिल हैं।

ल्यूटियल फेज के लिए सेलेनियम

Fertility Rate: If you want to plan a baby

फर्टिलिटी के लिए सेलेनियम एक एसेंशियल ट्रेस मिनरल है, जिसका उपयोग प्रोटीन बनाने के लिए किया जाता है। यह एक एंटीऑक्सीडेंट भी है, जो प्रजनन क्षमता में भूमिका निभा सकता है। सेलेनियम ल्यूटियल फेज में अहम भूमिका निभाता है। ल्यूटियल फेज की कमी से अपर्याप्त प्रोजेस्टेरोन सीक्रेशन और लो एंडोमेट्रियम हो सकता है। जिन खाद्य पदार्थों में सेलेनियम होता है, उनमें ब्राजील नट्स, सी फूड्स, पोल्ट्री, ब्राउन राइस और होल व्हीट ब्रेड भी शामिल हैं।

प्रजनन क्षमता बढ़ा सकता है Vit- D

विटामिन-D रिसेप्टर्स पूरे प्रजनन टीशू में वितरित होते हैं। प्रजनन क्षमता में विटामिन-D की अहम भूमिका होती है। विटामिन-D ट्रीटमेंट से टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ सकता है। इससे फर्टिलिटी रेट भी बढ़ सकती है। सूर्य की किरण के अलावा, विटामिन-D गाय के दूध, सोया मिल्क, संतरे के रस में भी पाया जाता है।

फोटो सौजन्य- गूगल

Prepare yourself before becoming a mother

Pregnancy: अगर आप प्रेग्रेंट हैं और बार-बार उल्टियां आ रही है? आपके वजन में भी कमी आ रही है? हो सकता है कि आप मॉर्निंग सिकनेस की शिकार हैं। अब आपके दिमाग में यह सवाल लाज़मी है कि आपको तो यह समस्या दिन के किसी भी पहर में हो जाती है। तो क्या ऐसा होना मुमकिन है। यह समस्या किसी भी वक्त आपकी परेशानी का सबब बन सकती है।यहां सवाल है पैदा होता है कि भला यह समस्या होती कब है? इसे लेकर डॉक्टर का कहना है कि प्रेग्रेनेंसी के दौरान एक महिला के बॉडी में हार्मोन का बदलाव या असंतुलन होना आम बात है।

खासतौर पर एस्ट्रोजन हार्मोन का बढ़ना, जिसका नतीजा हो सकती है मॉर्निंग सिकनेस। यह समस्या 16 से 20 हफ्तों में खत्म हो जाती है। अध्ययन बताते हैं कि लगभग 75 फीसदी गर्भवती महिलाएं इससे जूझती हैं। यह समस्या तनाव, अधिक काम करने, कुछ खाद्य पदार्थो को खाने आदि के कारण भी हो सकती है। यह समस्या इनके अलावा ब्लड शुगर के कम स्तर के कारण भी हो सकती है। थायरॉइड और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी इसका कारण बन सकती हैं। लिहाजा, बेहतर होगा कि आप अपनी इस समस्या का कारण जानें और उसके हिसाब से इससे निपटने की रणनीति तय करें। जरुरत होने पर मेडिकल परामर्श लें।

क्या है लक्ष्ण

सबसे पहले तो यह समझ लेना होगा कि आखिर है क्या मॉर्निंग सिकनेस? दिन में कई बार उल्टी होना, शरीर में पानी की कमी होना (जिसका अंदाजा पेशाब के रंग से लगता है), खड़े होने पर चक्कर आना, वजन कम होना, किसी तरह की खास महक, खाने-पीने की चीजों के स्वाद के प्रति संवेदनशील हो जाना और उसके कारण उल्टी होना, बुखार, बार-बार सिर दर्द, धड़कन का तेज होना आदि मॉर्निंग सिकनेस के लक्षण हैं।

इन बातों का रखें ध्यान

If you are troubled by vomiting during pregnancy then don't panic

कुछ बातों का ख्याल रखकर मॉर्निंग सिकनेस को काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है। इस बाबत आहार सलाहाकार के मुताबिक रात के खाने और सुबह के नाश्ते के बीच का अंतराल लंबा हो जाता है। ऐसे में यह समस्या और बढ़ सकती है। लिहाजा, इस बात का ख्याल रखें। इसके लिए आपको अपने रात के खाने को देर से करने की जरूरत नहीं है बल्कि आप उसे जितना जल्दी और हल्का लेंगी, उतना ही अच्छा होगा। मुमकिन हो तो सोने के कुछ देर पहले दूध को अपनी खुराक में जगह दें। उसमें आप पिसे हुए मेवे भी मिला सकती हैं। सुबह उठते ही काम में जुटने से बचें।

डॉक्टर के अनुसार समस्या के दौरान खुद को समझें यानी आपको किन चीजों से परेशानी हो रही है, उस पर जरूर गौर करें। साथ ही इस सोच से दूर रहे कि आपको दो लोगों के हिस्से की खुराक लेनी है। अपने पोषण में बढ़ोतरी करें खुराक में नहीं। ज्यादा खाना भी शरीर में भारीपन और थकान का कारण बन सकता है। नीबू पानी का सेवन करें। नारियल पानी पोटैशियम का अच्छा स्रोत है। इसे भी खुराक में शामिल करें। एकमुश्त खाने की जगह आपको 2-2 घंटे के अंतराल में कम-कम मात्रा में कुछ-न-कुछ खाना चाहिए। ये छोटे-छोटे ब्रेक न सिर्फ आपको जलन से बचाएंगे बल्कि गैस से भी निजात मिलेगी।

भारी खाने के बाद 30 मिनट तक बलबलगम चबाना आपके पाचन को सुधारने में सहायक रहता है। इससे लार ग्रंथियां उत्तेजित होती हैं और लार अधिक बनती है, जो कि पेट के एसिड कम करने का काम करता है। अदरक का सेवन करें। यह शुगर स्तर को भी नियंत्रित रखेगी। अदरक सुबह की थकान से भी निजात देती है। हल्दी जलन कम करने में तो कारगर है ही, साथ ही यह दर्द कम करती है। यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करती है। वहीं, कालीमिर्च में यह क्रोमियम सर्वोत्तम श्रोत है। यह ब्लड शुगर को ठीक रखती है। इसे रोज 30 एमसीजी खाना चाहिए। इलाइची खाने से आपका जी नहीं मिचलाएगा।

कब होती है समस्या?

आमतौर पर महिलाओं का मॉर्निंग सिकनेस की यह समस्या गर्भावस्था के दौरान हो सकती है। अलावा इसके यह समय शरीर में ब्लड शुगर के स्तर में कमी आने पर भी होती है। थायरॉइड और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी मॉर्निंग सिकनेस की वजह बन सकती हैं। समस्या होने पर अपने डॉक्टर से राय जरूर लें।

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can have a negative effect on your health

Magnesium: पूरे शरीर के लिए पोषक तत्व बेहद जरूरी होता है। ये पोषक तत्व विटामिन, मिनरल के रूप में मौजूद होते हैं। मिनरल के रूप में मैग्नीशियम हेल्थ के लिए अहम है। ये हमारे शरीर में दिल-दिमाग और दूसरे अंगों के लिए जरूरी होते हैं। अगर इसकी कमी हो जाती है तो कई तरह के स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ सकता है, साथ-साथ शरीर में इसकी मात्रा का इजाफा सही नहीं होता। इसलिए सही मात्रा में मैग्नीशियम का इस्तेमाल सबसे ज्यादा आवश्यक है।

सबसे पहले जाने मैग्नीशियम के बारे में-

जानकारी की कमी के कारण हम मैग्नीशियम के महत्व को समझ नहीं पाते हैं। 07 एसेंशियल मिनरल में से एक है मैग्नीशियम। यह शरीर के फंक्शन में मदद करता है और बेहतर हेल्थ बनाए रखने में अहम रोल निभाता है। मैग्नीशियम की कमी से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। मैग्नीशियम 300 से ज्यादा एंजाइम की एक्चिविटी में मौजूद होता है। यह हमारे शरीर में बायोलॉजिकल केमिकल एंजाइम्स को संतुलित करने में सहायता करता है।

यहां हैं मैग्नीशियम से पहुंचने वाले फायदे

1. दिल और दिमाग के लिए फायदेमंद

WHO warning: Long working hours increase the risk of heart disease and heart attack

हर्ट मसल्स सहित मैग्नीशियम नर्व और मसल्स फंक्शन को रेगुलेट करने में मदद करता है। मैग्नीशियम हृदय को स्वस्थ बनाये रखने में मदद करता है। यह ब्लड प्रेशर को रेगुलेट करने और कोलेस्ट्रॉल प्रोडक्शन में शामिल होता है।

2. बोन हेल्थ के लिए है खास

स्केलेटल फंक्शन के लिए मैग्नीशियम जरूरी है। यह बोन स्ट्रक्चर (bone structure) और उम्र बढ़ने के साथ बोन डेंसिटी बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

3. ब्लड शुगर बैलेंस करने में मदद

यह एसिड और प्रोटीन के पाचन को बनाए रखता है और ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद करता है।

4. अच्छी नींद में मददगार

good sleep

मैग्नीशियम कुछ न्यूरोट्रांसमीटर की गहराई तक जाकर आरामदेह नींद लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह नर्वस सिस्टम को शांत करता है और ब्रेन को आरामदायक स्थिति में लाने में मदद करता है।

5. स्ट्रेस का प्रबंधन

शरीर मेंस्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल लेवल को कम करने में मदद करता है जिससे कि स्ट्रेस लेवल मेंटेन रहता है।

शरीर को कितनी चाहिए मैग्नीशियम-

शरीर में मैग्नीशियम का उत्पादन नहीं होता है। इसलिए इसे बाहरी तत्वों से मिलना चाहिए। यह या तो खाये जाने वाले भोजन से मिलना चाहिए या सप्लीमेंट से।

  • 19-51 वर्ष की महिलाओं के लिए- 310-320 एलपीजी प्रति दिन
  • 19-51 वर्ष की आयु पुरुषों के लिए – 400-420 एलपीजी प्रति दिन
  • गर्भवती महिलाओं के लिए – 350-360 एलपीजी प्रति दिन
  • 51 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को अपने लिंग के अनुसार हाई सीमा का लक्ष्य रखना चाहिए

मैग्नीशियम लेवल के लिए खाद्य पदार्थ

ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं, जिनहीं भोजन में शामिल करने से ज्यादा मैग्नीशियम लेवल पाया जा सकता है। सबसे अधिक मैग्नीशियम युक्त खाद्य पदार्थ में शामिल हैं:

ब्राज़ील नट्स – 250 मिली ग्राम आधा कप साबुत
पालक – 157 मिली ग्राम
कद्दू के बीज – 150 मिली ग्राम
ब्लैक बीन्स – 120 मिली ग्राम
बादाम – 80 मिली ग्राम
काजू – 72 मिली ग्राम

डार्क चॉकलेट – 64 मिली ग्राम
एवोकाडो – 58 मिली ग्राम
टोफू – 53 मिली ग्राम
सैल्मन – 53 मिली ग्राम
केला – 37 मिली ग्राम
रास्पबेरी/ब्लैकबेरी – 28 मिली ग्राम

ज्यादा मैग्नीशियम लेना है नुकसानदायक

बहुत ज्यादा मैग्नीशियम मतली, दस्त, उल्टी और पेट में ऐंठन की वजह बन सकता है। गंभीर मामलों में यह सांस लेने में परेशानी, तेज़ या अनियमित दिल की धड़कन, ट्रॉमा और कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकता है। याद रखना जरूरी है कि ना सिर्फ मैग्नीशियम की कमी, बल्कि मैग्नीशियम की अधिक मात्रा भी शरीर के लिए हानिकारक है।

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4 fitness exercises in your routine to burn armpit fat

Armpit Fat: गर्मी के मौसम में ज्यादातर लोग स्लीवलेस लिबास पहनना पसंद करते हैं लेकिन आर्मपिट पर नजर आने वाला फैट उनकी समस्या की वजह बनने लगता है। शरीर में जमा होने वाले कैलोरीज बाहों और आर्मपिट पर जमा फैट्स का कारण होते हैं। इससे राहत पाने के लिए लोग कई तरह की हाई इंटैंसिटी एक्सरसाइज करने लगते हैं। जानिए आर्मपिट फैट से जुड़ी समस्या के निदान के लिए कुछ जरूरी 4 एक्सरसाइज के बारे में-

इस बारे में जिम सर्टिफाइड फिटनेस ट्रेनर बताते हैं कि आर्मपिट में उम्र के साथ बढ़ने वाले फैटस और स्टिफनेस को दूर करने के लिए एक्सरसाइज़ बहुत ज़रूरी है। उम्र के साथ आर्मपिट के नज़दीक की स्किन लटकने लगती है। इस समस्या को दूर करने के लिए दिनभर में जब भी समय मिले तो आर्म सर्कल और बाहों की स्ट्रेचिंग समेत कुछ आसान एक्सरसाइज़ से बाजूओं और बगल में बढ़ने वाले फैट्स को बर्न करने में काफी मदद मिलती है। साथ ही चेस्ट और कंधों के मसल्स को भी मज़बूती मिलती है।

जानें आर्मपिट फैट बर्न करने के लिए एक्सरसाइज़

आर्म सर्कल एक्सरसाइज

4 fitness exercises in your routine to burn armpit fat

बाहों पर जमी चर्बी को दूर करने के लिए एक्सरसाइज़ बेहद फायदेमंद है। इससे बाहों की मांसपेशियों को मज़बूती मिलती है और बाहों में बढ़ने वाला दर्द भी कम होने लगता है।

जानें कैसे करें-

इसके लिए बैड पर बैठ जाएं और दोनों टांगों को जमीन पर टिका लें। अब अपनी दोनों बाजूओं को कोहनी से मोड़ लें और बाजूओं को आगे से पीछे की ओर लेकर जाएं और राउंड शेप में घुमाएं। आर्म सर्कल को तीन सेट में 15 से 20 बार करें।

माउनटेन क्लाइंबर्स एक्सरसाइज

4 fitness exercises in your routine to burn armpit fat

बदन की मांसपेशियों को मज़बूती प्रदान करने के लिए एक्सरसाइज़ बेहद आवश्यक है। इससे पेट की चर्बी के अलावा बाजूओं पर जमा फैट्स से भी मुक्ति मिल जाती है। नियमित तौर पर माउनटेन क्लाइंबर्स का एक्सरसाइज बाजूओं को मज़बूत बनाता है।

जानें कैसे करें-

इस एक्सरसाइज़ को करने के लिए मैट पर घुटनों के बल बैठ जाएं और दोनों बाजूओं को जमीन पर टिका लें। अब शरीर को ऊपर की ओर उठाएं और पैरों को सीधा कर लें। पैरों और बाजूओं के मध्य शोल्डर्स से अधिक दूरी बनाकर रखें। अब दाईं टांग को आगे करें और बाएं घुटने को मोड़ते हुए चेस्ट के पास लेकर आएं। फिर बाई टांग से भी आसन दोहराएं।

ऐसे करें पुश अप्स

कंधों और बाहों में बढ़ने वाली स्टिफनेस को दूर करने के लिए पुश अप्स बेहद फायदेमंद साबित होते हैं। इससे बाजूओं के दर्द से राहत मिलती है और अतिरिक्त चर्बी की समस्या भी दूर होने लगती है। इसके अनियमित अभ्यास से शरीर के पोश्चर में सुधार आने लगता है। रोज़ाना पुश अप्स एक्सरसाइज करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन नियमित बना रहता है।

जानें कैसे करें-

पेट के बल मैट पर लेट जाएं। अब दोनों हाथों को मज़बूती से जमीन पर टिका लें। इसके बाद पैरों को सीधा कर लें और दोनों बाजूओं को कंधे की चौड़ाई से ज्यादा फैलाएं। इससे पुश अप्स करने में आसानी होती है। पुश अप्स को दो सेट में 15 से 20 बार दिन में तीन बार दोहराएं। इससे बाजूओं और गर्दन पर बढ़ने वाली हंप की समस्या से राहत मिल जाती है।

जंपिग जैक्स एक्सरसाइज

शरीर की मांसपेशियों में बढ़ने वाली ऐंठन को दूर करने के लिए जंपिग जैक्स बेहद कारगर एक्सरसाइज़ है। इसे करने से कंधों, बाहों और टांगों में बढ़ने वाले फैट्स को बर्न करने में मदद मिलती है। शरीर स्वस्थ रहता है और स्टेमिना बूस्ट होने लगता है।

जानें कैसे करें-

जंपिग जैक्स के लिए दोनों पैरों के मध्य गैप मेंटेप कर लें और एकदम सीधे खड़े हो जाएं। अब टांगों और बाजूओं को खोलें और फिर एक साथ ले आएं। इस दौरान सांस पर ध्यान अवश्य केंद्रित करें। 02 से 03 सेट्स में 15 बार जंपिग जैक्स को दोहराने से वेटलॉस में मदद मिलती है।

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Because not everyone is big hearted.

Women’s Health: महिलाओं की जिंदगी में उम्र का हर दौर एक नया बदलाव के साथ आता है जो उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करता है। शारीरिक रूप से भी कई बदलाव देखने को मिलते हैं। देखा जाए तो बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ रही बच्ची बहुत कुछ फिजिकली बदलाव बर्दाश्त करती हैं। उसी तरह जब शरीर 35 की उम्र पार करता है तब भी बहुत से चेंजेज दिखाई देने लगते हैं। ये चेंजेज उन्हें मानसिक तो प्रभावित करते ही हैं उनकी शादीशुदा जीवन पर भी असर पड़ता है। अगर इस उम्र की देहलीज को पार आपको भी लगता है कि आप कुछ बदल रही हैं तो उसकी वजह कुछ और नहीं आपकी उम्र ही है। बताते चलें कि किस किस तरह से ये उम्र चेंजेज लेकर आता है।

35 की उम्र के बाद होने वाले बदलाव

पेल्विक स्वास्थ्य पर पड़ता है असर

आपकी उम्र 35 पार और 40 के नजदीक पहुंचते पहुंचते मैरेज लाइफ पर कुछ असर दिखने लगता है क्योंकि इस समय तक फिजिकल रिलेशन बनाने की इच्छा पहले जैसी नहीं रह जाती। प्राइवेट पार्ट में भी बहुत से चेंजेज दिखने लगते हैं। सबसे पहला चेंजेज यौन इच्छा में कमी आना ही होता है। अलावा इसके वजाइना में ज्यादा ड्राइनेस और कई बार खुजली भी होने लगती है। वजाइना के अपीयरेंस में भी बदलाव आने लगता है। मेनोपॉज के दौरान अलग-अलग अनुभव होते हैं। कुछ महिलाओं को ड्राईनेस तो कुछ को इन्फ्लेमेशन की शिकायत हो सकती है। बता दें कि इस उम्र में यूरिनरी ट्रैक इंफेक्शन (UTI) जैसी प्रॉब्लम भीबढ़ सकती है।

अन्य शारीरिक बदलाव

These foods play an important role in controlling hormones

अलावा इसके ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना। स्किन पहले से ज्यादा ड्राई रहना, ऑस्टियोपोरोसिस, बालों के टेक्सचर में अंतर और रिंकल आने लगते हैं। और भी बहुत से हार्मोनल चेंजेज भी होते हैं।

मानसिक बदलाव की समस्या

शारीरिक रूप से ना सिर्फ बल्कि मानसिक रूप से भी कई तरह के चैंजेज का सामना करना पड़ता है। कई महिलाएं इस उम्र में डिप्रेशन के करीब पहुंच जाती हैं। कई महिलाओं में एंग्जाइटी बढ़ जाती है। सबसे अधिक रात में नींद उचटने लगती है और साथ में इनसोमनिया की शिकायत बढ़ जाती है।