Eid Ul Adha: इस बार 28 मई को ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार पूरे देश और दुनिया में मुस्लिम मना रहे हैं। बकरीद इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार है जिसमें अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास और आत्मत्याग के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। बकरीद के दिन सुबह मुस्लिम समुदाय के लोग नए कपड़े पहनकर मस्जिद या ईदगाह में विशेष नमाज़ अदा करते हैं। इसके बाद एक-दूसरे के गले मिलकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है। नमाज़ के बाद जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे बकरे की कुर्बानी देते हैं और इसके गोश्त को गरीबों और रिश्तोदारों में बांटते हैं। सिर्फ तीसरा हिस्सा खुद के लिए रखते हैं। इस तरह समाज का हर तबका त्योहार की खुशियों और दावतों में शामिल होता है। आपको जानकर हैरानी होगी बकरीद की शुरुआत इस्लाम के आने के बहुत पहले से ही अरब जगत में मनाया जाता था। आइए इसके पूरे इतिहास और इससे जुड़ी कहानियों के बारे में जानते हैं।
ऐसे हुई बकरीद की शुरुआत

बकरीद या ईद-उल-अजहा की शुरुआत पैगंबर हजरत इब्राहिम (अ.स) के दौर में आज से करीब 4,000 वर्ष पहले हुई थी। यह त्योहार मुख्य रूप से अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण, अटूट विश्वास और त्याग का ऐतिहासिक प्रतीक है। इस त्योहार के पीछे हजरत इब्राहिम के जीवन से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सपने में आकर उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी। इब्राहिम को अपनी ढलती उम्र में मिले इकलौते बेटे, हजरत इस्माइल सबसे ज्यादा प्रिय थे। लेकिन अल्लाह का हुक्म मानकर हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। जब उन्होंने बेटे को इसके बारे में बताया, तो बेटे इस्माइल ने भी अल्लाह की राह में समर्पित होने की रज़ामंदी दे दी इब्राहिम अपने बेटे को लेकर मक्का के पास मीना के मैदान की ओर बढ़े। रास्ते में शैतान ने उन्हें इस परीक्षा से डिगाने और भटकाने का प्रयास किया पर उन्होंने उसे कंकड़ मारकर दूर भगा दिया। इसी याद में हज के दौरान आज भी शैतान को कंकड़ मारे जाते हैं। हलांकि, यह अलग कहानी है। बहरहाल, मीना पहुंचकर जब इब्राहिम ने अपनी आंखों पर पट्टी बांधी और बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, तो अल्लाह ने उनके इस सर्वोच्च समर्पण और नीयत को स्वीकार कर लिया और ठीक उसी वक्त अल्लाह ने अपने फरिश्ते जिब्राइल के जरिए जन्नत से एक दुम्बा (भेड़) वहां भेज दिया गया और इस्माइल की जगह उस दुम्बे की कुर्बानी हो गई। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में हर वर्ष इस्लामी महीने जुल-हिज्जा की 10 तारीख को दुनिया भर के मुस्लिम सक्षम लोग पशु (बकरा, भेड़, या ऊंट) की कुर्बानी देते हैं। इस पर्व का मूल उद्देश्य सिर्फ खून बहाना नहीं, बल्कि इंसान के भीतर मौजूद अहंकार, स्वार्थ और बुराई को अल्लाह की राह में कुर्बान करना है। इसके गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटकर गरीबों, रिश्तेदारों और खुद के लिए रखने का सामाजिक नियम है।
सबसे पहले बकरीद की शुरुआत कैसे हुई
ईद-उल-अजहा का इतिहास करीब 4,000 साल पुराना माना जाता है। इस घटना का जिक्र सबसे पहले हिब्रु बाइबिल में लिखा गया है। इसमें हजरत इब्राहिम को अब्राह्म के नाम से जाना जाता है जबकि अब्राह्म के बेटे को इसहाक नाम से जाना जाता है। वहीं, फरिश्ता को एंजिल कहकर पुकारा जाता है। ऐतिहासिक और सामाजिक मान्यताओं के मुताबिक यह घटना मक्का की है लेकिन एक सालाना इस्लामी त्योहार के रूप में ईद-उल-अज़हा को आधिकारिक तौर पर सबसे पहले मदीना में मनाया गया था। दरअसल, 622 ईस्वी में जब पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना हिजरत की, तब उन्होंने देखा कि मदीना के लोग पहले से चले आ रहे कुछ पारंपरिक फारसी त्योहार जैसे नौरोज़ और मेहरजान को मनाते थे। पैगंबर साहब ने उन त्योहारों की जगह इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित सिर्फ दो पवित्र दिन तय किए: ईद-उल-फितर यानी मीठी ईद और ईद-उल-अज़हा यानी बकरीद। इस तरह मदीना वह पहला स्थान बना जहां व्यवस्थित रूप से इस त्योहार की और सामूहिक नमाज़ की शुरुआत हुई।
Eid Ul Adha का सांस्कृतिक महत्व
बकरीद का पर्व अहंकार और स्वार्थ का त्याग करने के लिए मनाया जाता है। इसका मूल संदेश सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना नहीं है बल्कि इंसान के भीतर छिपे स्वार्थ, लालच और अहंकार की कुर्बानी देना है. इससे समानता और सामाजिक सद्भाव की भावना भी प्रकट होती है। इसमें कुर्बानी के मांस को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों व दोस्तों के लिए और तीसरा हिस्सा गरीबों व जरूरतमंदों के लिए है। यह व्यवस्था समाज में आर्थिक असमानता को भुलाकर हर तबके को खुशी में शामिल करने का संदेश देती है।
बकरीद के दिन की शुरुआत
बकरीद के दिन मुसलमान सुबह में जल्दी उठ जाते हैं। सबसे पहले फज्र की नमाज अता करते हैं। इसके बाद घर की साफ-सफाई और स्नान किया जाता है, फिर नए या सबसे साफ कपड़े पहने जाते हैं।
इस दिन आमतौर पर सुबह 8 से 10 बजे के बीच ईद-उल-अजहा की दो रकात विशेष नमाज़ और खुतबा (धार्मिक उपदेश) होता है. नमाज़ खत्म होते ही लोग आपस में गले मिलकर एक-दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं। दुश्मनी भूलकर गले मिलने का यह सबसे भावुक पल होता है। मीठी ईद के उलट बकरीद की सुबह नमाज़ बिना कुछ खाए पढ़ी जाती है। नमाज़ के बाद ही लोग पहला निवाला लेते हैं। ईदगाह से लौटने के बाद ही कुर्बानी का सिलसिला शुरू होता है। नमाज़ से पहले दी गई कुर्बानी मान्य नहीं होती। धार्मिक नियमों के तहत बकरे, भेड़ या अन्य स्वीकृत पशु की कुर्बानी दी जाती है। फिर रसोई में गोश्त पकाया जाता है फिर पारंपरिक पकवानों के साथ एक साथ बैठकर परिवार के सदस्य भोजन करते हैं। शाम के वक्त बड़े-बुजुर्ग बच्चों को प्यार से ईदी देते हैं। नए कपड़े पहने बच्चे घर-घर जाकर अपनी ईदी जमा करते हैं। शाम के समय लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और हिंदू-मुस्लिम भाइयों के घर ईद मिलने जाते हैं। घरों में मेहमानों को शीर-खुरमा और मटन के पकवान परोसे जाते हैं। इस दिन का समापन इस संतोष के साथ होता है कि समाज का कोई भी गरीब परिवार आज के दिन भूखा नहीं सोय। आज के दिन लोग रात में शांति व बरकत की दुआ के साथ दिन का समापन करते हैं।
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